XXX Hindi Kahani बिना झान्टो वाली बुर
07-12-2018, 01:19 PM,
#14
RE: XXX Hindi Kahani बिना झान्टो वाली बुर
इस बीच जीजाजी बुर को सहला-सहला कर उसे पनिया चुके थेआब वे मेरी टाँगो के 
बीच आ गये और अपना शिश्न मेरी यौवन गुफा में दाखिल कर दिया. मैं 
चुदाई का मज़ा लेने लगी. नीचे से चूतर उचका उचका कर चुदाई में 
भरपूर सहयोग करने लगी. "हाई मेरे चोदु सनम तुम्हारा लंड बरा जानदार है 
तीन चार बार चुद चुकी हू पर लगता है पहली बार चुद रही हूँ... मारो 
राजा धक्का... और जूऊर से पूरा पेल दो अपना लॉरा ..... आज इसे कुतिया की 
तरह बुर से निकलने नही दूँगी.. लोगा आएगे देखेंगे जीजा का लॉरा साली की बुर 
में फसा है.... जीजा ... अच्च्छा बताओ... अगर ऐसा होता तो क्या आप मुझे चोद 
पाते...." मैं थोरा बहकने लगी. जीजू मस्त हो रहे थे बोले, "चुदाई करते 
समय आगे की बात कौन सोचता है फस जाता तो फस जाता जो होना है होगा पर इस 
समय चुदाई मे ध्यान लगाओ मेरी रानी.... आज चुदाई ना होने से मन बरा बेचैन 
था उससे ज़्यादा तुम्हारा राज जानना चाहता था .... अब चुदाई का मज़ा लेने दो ले 
लो अपनी बुर में लौरे को और लो आज की चुदाई में मज़ा आ गया ... 
हाँ रानी अपनी चूत को इस लौरे के लिए हमेशा खोले रखना...लो 
मजाआआआआआआआ लो रनीईईईई" जीजा जी उपर से बोल रहे थे और मैं 
नीचे से उनका पूरा लॉरा लेने के लिए ज़ोर लगाते हुए बर्बरा रही थी, " 
ऊऊओ मेरे चुदक्कर राजा चोद दो.... अपनी बिना झांतो वाली इस बुर्र्र्र्र्र्ररर 
कूऊऊऊ और चोदूऊऊऊ फर्रर्र्र्ररर दूऊऊओ एस साली बुर को.... बरी चुदासी 
हो रही थी.... सुबह से...... जीजाजी साथ साथ गिरना .... हाँ अब... मैं आने 
वाली हूँ ..... कस.... कस.... कर दो चार धक्के और मारो चूसा दो अपनी 
मुनिया को मदनरस.... मिलने दो सुधारस को मदनरस से.... ओह जीजू आप पक्के 
चुदक्कर हूऊओ.... ना जाने कितनी बुर को अपने मदनरस से सिंचा होगा....आज 
तो रात भर चुदाई का प्रोग्राम है... तीन बुर से लोहा लेना है.. लेकिन मेरी बुर 
का तो यही बजा बजा दिया..... मारो राजा और ज़ोर से.... थक गये हो तो बताओ 
मैं उपर आ कर चोद दू..... इस भोसरी को.... ओह अब मैं 
नहियीईईईईईईईईईईईई रुक्कककककककक सकाआति ओह अहह लूऊऊ माइ 
गइईई ओह राजा तुम भी एयाया जाऊऊऊ" 

मैं नीचे से झरने के लिए बेकरार हो रही थी और जीजा जी भी उपर से दना 
डन धक्के पै धक्के मार रहे थे पूरे कमरे में चुदाई धुन बज रही थी 
मॅमी भी नीचे नही थी इस लिए और निसचिंत थी खूब गंदे गंदे शब्दों 
का आदान-प्रदान हो रहा था आज का मज़ा ही और था.. बस चुदाई ही चुदाई.. केवल 
लौरे और बुर की घिसाई ही घिसाई... जीजाजी अब झरने के करीब आ रहे थे और 
उपर से कस कस कर थक्के लगा कर बोलने लगे, "ओह्ह्ह्ह मेरी बिना झांतो वाली बुर 
की शहज़ादी तेरी बुर तो आफताभ है....चोद चोद का इसे इतना मज़ा दूँगा कि 
मुझसे चुदे बिना रह ही नही पाओगी....चुदाई के लिए सब समय बेकरार रहो 
गी....ओह रानी!!!!!! एक बार फिर साथ-साथ झरेंगे....ओह अब तुम भी 
आआअजाओ......" कहते हुए जीजू मेरी बुर की गहराई में झार गये और मैं भी 
साथ-साथ खलाश हो गयी.... जीजू मेरी छाती से चिपक गये कुछ पल तो ऐसा 
लगा की मुनिया ने उनके लौरे को फसा लिया है. 

थोरी देर इसी तरह चिपके रहे फिर मैं जीजा जी को उतारते हुए बोली, " अब 
उठिए! कामिनी के यहाँ नही चलना है क्या?" जीजू बोले, "जब अपने पास 
साफ-सुथरा लॅंडिंग प्लॅटफॉर्म है तो जंगल में एरोप्लेन उतारने की क्या ज़रूरत 
है" उनकी बात सुनकर दिल बाग-बाग हो उठा और मैने उन्हे चूमते हुए कहा, 
"जीजाजी! कामिनी के यहाँ तो चलना ही है, ज़बान दे दी है" फिर हसते हुए 
बोली, " कहीं तीन की वजह से डर तो नही रहे है" मैने उनकी मर्दानगी को 
ललकारा. "अब मेरी प्यारी साली कह रही है तो चलना ही परेगा, कुच्छ नया 
अनुभव होगा" जीजा जी उठे और हम दोनो नेबाथरूम मे जा साफ-सफाई की और कपड़ा 
पहनने लगे. तभी नीचे मैन गेट खुलने की आवाज़ आई. मैने जीजाजी से कहा 
"अब आप दीदी के कमरे मे चलिए मॅमी आ गयी हैं" जीजाजी अपने कमरे में 
चले गये. 

मैं तैयार हो कर अपने कमरे से निकली तो देखा चमेली चाय लेकर उपर आ 
रही है. हम दोनो साथ-साथ जीजा जी के कमरे में घुसे देखा जीजाजी तैयार 
होकर बैठे हैं. चमेली चहाकी, "वह! जीजाजी तो तैयार बैठे हैं, कामिनी 
दीदी से मिलने की इतनी जल्दी है?" मैने उससे कहा, "चमेली तुझे बोलने की 
कुच्छ ज़्यादा ही आदत पड़ती जा रही है, चल चाय निकाल" चमेली ने दो कप 
में चाय निकली और एक मुझे दी और एक जीजाजी को पकड़ा कर मुस्करा दी, बोली 
"जीजाजी लगता है दीदी ने ज़्यादा थका दिया है सिगरेट निकालू?" " हाँ रे 
पीला, लेकिन मेरे पकेट मे तो नही है" "अरे दीदी ने मुझसे मगवाया था यह 
लीजिए" और उसने अपने चोली से निकाल कर जीजाजी को सिगरेट पकड़ा दी" 
जीजाजी चाय पीते हुए बोले " अरे एक सुलगा कर दे ना" चमेली ने सिगरेट 
सुलगाया और एक कश लगा कर धुआँ जीजाजी के उपर उड़ाते हुए बोली "दीदी का मसाला 
लगा दूँ या सादा ही पिएगें" हमलोग उसकी दो-अर्थी बाते सुनकर हंस पड़े" मैने 
उसे डाँटते हुए कहा "चमेली तू हरदम हँसती और मज़ाक करने के मूड में क्यो 
रहती है" "क्या करूँ दीदी दुनिया में इतने गम है कि उससे झुटकारा नही मिल 
सकता खुशी के इन्ही लम्हो को याद कर इंसान अपना सारा जीवन बिता देता है" 
"अरे वह मेरी छेमिया फिलॉसफर भी है" जीजा जी बोले. चमेली के चेहरे पर 
ना जाने कहा से गमो के बदल मदराए पर जल्दी ही उरनच्छू हो गये. "जीजाजी ये 
छमिया कौन है" फिर हम सब हंस परे. 
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