Kamvasna आजाद पंछी जम के चूस.
08-27-2019, 01:24 PM,
#11
RE: Kamvasna आजाद पंछी जम के चूस.
रामु अपना सुध बुध खोया हुआ अपने सामने इस सुंदर काया को अपने हाथों का खिलोना बनाने को आजाद था वो चुचियों को तो ब्लाउज के ऊपर से सहला रहा था पर उसका मन तो उसके अंदर से छूने को था उसने दूसरे हाथ को आरती के गालों और होंठों से आजाद किया और धीरे से उसके ब्लाउज के गॅप से उसके अंदर की डाल दिया मखमल सा एहसास उसके हाथों को हुआ और वो बढ़ता ही गया

जैसे-जैसे उसका हाथ आरती के ब्लाउज के अंदर की ओर होता जा रहा था वो आरती से और भी सटता जा रहा था अब दोनों के बीच में कोई भी गॅप नहीं था आरती रामू से पूरी तरह टिकी हुई थी या कहिए अब पूरी तरह से उसके सहारे थी उसकी जाँघो से टिकी अपने पीठ पर रामू काका के लण्ड का एहसास लेती हुई आरती एक अनोखे संसार की सैर कर रही थी उसके शरीर में जो आग लगी थी अब वो धीरे-धीरे इतनी भड़क चुकी थी कि उसने अपने जीवन काल में इस तरह का एहसास नहीं किया था

वो अपने को भूलकर रामू काका को उनका हाथ अपने ब्लाउसमें घुसने में थोड़ा मदद की वो थोड़ा सा आगे की ओर हुई अपने कंधों को आगे करके ताकि रामू काका के हाथ आराम से अंदर जा सके । रामू काका की कठोर और सख्त हथेली जब उसकी स्किन से टकराई तो वो और भी सख्त हो गई उसका हाथ अपने आप उठकर अपने ब्लाउज के ऊपर से रामू काका के हाथ पर आ गया एक फिर दोनों और फिर रामू काका का हाथ ब्लाउज के अंदर रखे हुई थी वो और भी तन गई अपने चूचियां को और भी सामने की और करके वो थोड़ा सा सिटी से उठ गई थी

रामू ने भी आरती के समर्थन को पहचान लिया था वो समझ गये थे कि आरती अब ना नहीं कहेगी वो अब अपने हाथों का जोर उसके चुचियों पर बढ़ने लगे थे धीरे-धीरे रामू उसकी चुचियों को छेड़ता रहा और उसकी सुडोलता को अपने हाथों से तोलता रहा और फिर उसके उंगलियों के बीच में निपल को लेकर धीरे से दबाने लगा

उूुुुुुउऊह्ह आरति के मुख से एक लंबी सी सिसकारी निकली

आरती- ऊऊह्ह पल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्लीीआआआआअसस्स्स्स्स्स्सीईईई आआआआआह्ह

रामू को क्या पता क्या बोल गई थी आरती पर हाँ उसके दोनों हाथों के दबाब से वो यह तो समझ ही गया था कि आरती क्या चाहती थी उसने अपने दोनों हाथों को उसके ब्लाउज के अंदर घुसा दिया इस बार कोई ओपचारिकता नहीं की बस अंदर और अंदर और झट से दबाने लगा पहले धीरे फिर थोड़ा सा जोर से इतनी कोमल और नरम चीज आज तक उसके हाथ में नहीं आई थी वो अपने आप पर विश्वास नहीं कर पा रहा था वो थोड़ा सा और झुका और अपने बड़े और मोटे-मोटे होंठों को आरती के चिकने और गुलाबी गालों पर रख दिया और चूमने लगा चूमने क्या लगा सहद जैसे चाटने लगा था पागलो जैसी स्थिति थी रामू की । अपने हाथों में एक बड़े घर की बहू को वो शरीर रूप से मोलेस्ट कर रहा था और आरती उसका पूरा समर्थन दे रही थी कंधे का दर्द कहाँ गया वो तो पता नहीं हाँ पता था तो बस एक खेल की शुरूरत हो चुकी थी और वो था सेक्स का खेल्ल शारीरिक भूख का खेल एक दूसरे को संत्ुस्त करने का खेल एक दूसरे को समर्पित करने का खेल। आरती तो बस अपने आपको खो चुकी थी । रामू के झुक जाने की बजाह से उसके ब्लाउज के अंदर रामु के हाथ अब बहुत ही सख़्त से हो गये थे वो उसके ब्लाउज के ऊपर के दो तीन बाट्टों को टाफ चुले थे दोनों तरफ के ब्लाउज के साइड लगभग अब उसका साथ छोड़ चुके थी वो अब बस किसी तरह नीचे के कुछ एक दो या फिर तीन हुक के सहारे थे वो भी कब तक साथ देंगे पता नहीं पर आरती को उससे क्या वो तो बस अपने शरीर भूख की शांत करना चाहती थी इसीलिए तो रामू काका को उसने अपने कमरे में बुलाया था वो शांत थी और अपने हाथों का दबाब रामू के हाथों पर और जोर से कर रही थी वो रामू के झुके होने से अपना सिर रामु के कंधे पर टिकाए हुए थी वो शायद सिटी को छोड़ कर अपने पैरों को नीचे रखे हुए और सिर को रामू के कंधे पर टिकाए हुए अपने को हवा में उठा चुकी थी


रामू तो अपने होंठों को आरती के गालों और गले तक जहां तक वो जा सटका था ले जा रहा था अपने हाथों का दबाब भी वो अब बढ़ा चुका था। आरती के चूचियां पर जोर जोर-जोर से और जोर से की आरती के मुख से एक जोर से चीत्कार जब तक नहीं निकल गई

आरती- ईईईईईईईईईईईई आआआआआअह्ह उूुुुउउफफफफफफफफफफफफ्फ़
और झटक से आरती के ब्लाउसने भी आरती का साथ छोड़ दिया अब उसकी ब्लाउस सिर्फ़ अपना अस्तितव बनाने के लिए ही थे उसके कंधे पर और दोनों पाट खुल चुके थे अंदर से उसकी महीन सी पतली सी स्ट्रॅप्स के सहारे आरती के कंधे पर टीके हुए थे और ब्रा के अंदर रामू के मोटे-मोटे हाथ उसके उभारों को दबा दबा के निचोड़ रहे थे रामू भूल चुका था की आरती एक बड़े घर की बहू है कोई गॉव की देहाती लड़की नही या फिर कोई देहात की खेतो में काम करने वाली लड़की नहीं है पर वो तो अपने हाथों में रूई सी कोमल और मखमल सी कोमल नाजुक लड़की को पाकर पागलो की तरह अब उसे रौंदने लगा था।
वो अपने दोनों हाथों को आरती की चुचियों पर रखे हुए उसे सहारा दिए हुए उसके गालों और गले को चाट और चूम रहा था

उसका थूक आरती के पूरे चेहरे को भिगा चुका था वो अब एक हाथ से रामू की गर्दन को पकड़ चुकी थी और खुद ही अपने गालों और गर्दन को इधर-उधर या फिर उचका करके रामु को जगह दे रही थी कि यहां चाटो या फिर यहां चुमो उसके मुख और नाक से सांसें अब रामु के चेहरे पर पड़ रही थी । रामू की उत्तेजना की कोई सीमा नहीं थी वो अधखुली आखों से आरती की ओर देखता रहा और अपने होंठों को उसके होंठों की ओर बढ़ाने लगा। आरती रामू के इस इंतजार को सह ना पाई और उसकी आखें भी खुली रामू की आखों में देखते ही वो जैसे समझ गई थी कि रामू क्या चाहता है उसने अपने होंठों को रामु के होंठो में रख दिया जैसे कह रही हो लो चूमो चाटो और जो मन में आए करो पर मुझे शांत करो । आरती की हालत इस समय ऐसी थी कि वो किसी भी हद तक जा सकती थी वो रामू के होंठों को अपने कोमल होंठों से चूस रही थी और रामु जो कि आरती की इस हरकत को नजर अंदाज नहीं कर पाया वो अब भी आरती की दोनों चुचियों को कसकर निचोड़ रहा था और अपने मुँह में आरती के होंठों को लेकर चूस रहा था वो हब्सियो की तरह हो गया था उसके जीवन में इस तरह की घटना आज तक नहीं हुई थी और आज वो इस घटना को अपने आप में समेट कर रख लेना चाहता था वो अब आरती को चोदे बगैर नहीं छोड़ना चाहता था वो भूल चुका था कि वो इस घर का नौकर है अभी तो वो सिर्फ़ और सिर्फ़ एक मर्द था और उसे भूख लगी थी किसी नारी के शरीर की और वो नारी कोई भी हो उससे फरक नहीं पड़ता था उसकी मालकिन ही क्यों ना हो वो अब नहीं रुक सकता .


उसने आरती को अपने बलिश्त हाथ से खींच लिया लगभग गिरती हुई आरती कुर्सी को छोड़ कर रामू के ऊपर गिर पड़ी पर रामू तैयार था उसने आरती को सहारा दिया और अपनी बाहों में कसकर बाँध लिया उसने आरती को अब भी पीठ से पकड़ा हुआ था उसके हाथों की छीना झपटी में आरती की दोनों चूचियां ब्रा के बाहर आ गई थी

बल्कि कहिए खुद ही आजाद हो गई होंगी कितना जुल्म सहे बेचारी कैद में आरती का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था वो इतनी उत्तेजित हो चुकी थी कि लग रहा था कि अब कभी भी बस झड जाएगी पर रामू की उत्तेजना तो इससे भी कही अधिक थी उसका लण्ड तो जैसे अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा था । रामू अब नहीं रुकना चाहता था और ना ही कुछ आगे की ही सोच पा रहा था उसने आरती को अपनी ओर कब मोड़ लिया आरती को पता भी ना चला बस पता चला तब जब उसकी सांसें अटकने लगी थी । रामू काका की पकड़ इतनी मजबूत थी कि वो उनकी बाहों में हिल भी नहीं पा रही थी सांस लेना तो दूर की बात वो अपने होंठों को भी रामू काका से अलग करके थोड़ा सा सांस ले ले वो भी नहीं कर पा रही थी


रामू जो कि बस अब आरती के पूरे तन पर राज कर रहा था उसके हाथों का खिलोना पाकर वो उसे अपनी बाहों में जकड़े हुए उसके होंठों को अपने मुख में लेता जा रहा था और अंदर तक वो अपनी जीब को आरती के सुंदर और कोमल मुख में घुसाकर अंदर उसकी लार को अपने मुख में लेकर अमृत पान कर रहा था उसने आरती को इतनी जोर से जकड़ रखा था यह वो नहीं जानता था हाँ… पर उसे यह जरूर पता था रूई की गेंद सी कोई चीज़ जो कि एकदम कही से भी खुरदरी नहीं है उसके बाहों में है उसका लण्ड अब आरती की जाँघो के बीच में रगड़ खा रहा था रामू की हथेली आरती को थोड़ा सा ढीला छोड़ कर अपनी बाहों में आए हुश्न की परिक्रमा करने चल दी और आरती की पीठ से लेकर नितंबों तक घूम आए कब कहाँ कौन सा हाथ था यह आरती भी नहीं जानना चाहती थी नहीं ही रामू हाँ… सपर्श जिसका ही एहसास दोनों को महसूस हो रहा था वो खास था। आरती के शरीर को आज तक किसी ने इस तरह से नहीं छुआ था इतनी बड़ी बड़ी हाथलियो का स्पर्श और इतना कठोर स्पर्श आज तक आरती के शरीर ने नहीं झेला था या कहिए महसूस नहीं किया था रामू जैसे आटा गूँथ रहा था
वो आरती के शरीर को इस तरह से मथ रहा था कि आरती का सारा शरीर ही उसके खेलने का खिलोना था वो जहां मन करता था वही उसे रगड़ रहा था । रामू और आरती अब नीचे कालीन में लेटे हुए थे और रामू नीचे से आरती को अपने ऊपर पकड़कर उससे खेल रहा था उसके होंठ अब भी आरती के होंठों पर थे और एक दूसरे के थूक से खेल रहे थे । आरती अपने को संभालने की स्थिति में नहीं थी उसकी पेटीकोट उसकी कमर के चारो तरफ एक घेरा बना के रह गया था अंदर की पैंटी पूरी तरह से गीली थी और वो रामू काका को अपनी जाँघो की मदद से थोड़ा बहुत पकड़ने की कोशिश भी कर रही थी पर रामू तो जो कुछ कर रहा था उसका उसे अनुभव ही नहीं था वो कभी आरती को इस तरफ और तो कभी उस तरफ करके उसके होंठों को अपने मुख में घुसा लेता था दोनों हाथ आजादी से उसके जिश्म के हर हिस्से पर घूम घूमकर उनकी सुडौलता का और कोमलता का एहसास भी कर रहे थे रामू के हाथ अचानक ही उसके नितंबो पर रुक गये थे और आरती की पैंटी की आउट लाइन के चारो तरफ घूमने लगे थे। आरती का पूरा शरीर ही समर्पण के लिए तैयार था इतनी उत्तेजना उसे तो पहली बार ही हुई थी


उसके पति ने भी कभी उसके साथ इस तरह से नहीं खेला था या फिर उसके शरीर को इस तरह से नहीं छुआ था। रामु काका के हर टच में कुछ नया था जो कि उसके अंदर तक उसे हिलाकर रख देता था उसके शरीर के हर हिस्से से सेक्स की भूख अपना मुँह उठाकर रामू काका को पुकार रही थी वो अब और नहीं सह सकती थी वो रामु काका को अपने अंदर समा लेना चाहती थी। रामू जो कि अब भी नीचे था और आरती को एक हाथ से जकड़ रखा था और दूसरे हाथ से उसकी पैंटी के चारो और से आउटलाइन बना रहा था अचानक ही उसने अपना हाथ उसकी पैंटी के अंदर घुसा दिया और कस कस कर उसके नितंबों को दबाने लगा फिर दूसरा हाथ भी इस खेल में शामिल हो गया आरती पर पकड़ जैसे ही थोड़ा ढीली हुई आरती अपनी चुत को और भी रामु के लण्ड के समीप ले गई और खुद ही उपर से घिसने लगी रामु का लण्ड तो आजादी के लिए तड़प ही रहा था्
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08-27-2019, 01:24 PM,
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RE: Kamvasna आजाद पंछी जम के चूस.
आरती के ऊपर-नीचे होने से वो और भी ख़ूँखार हो गया था वो रामु को परेशान कर रहा था वो अपने जगह पर रह-ही नहीं रहा था अब तो उसे आजाद होना ही था और रामु को यह करना ही पड़ा

आरती ऊपर से रामु के होंठों से जुड़ी हुई अपने हाथों को वो भी रामु के शरीर पर चला रही थी उसके हाथों में बालों का गुछा आ रहा था जहां भी उसका हाथ जाता बाल ही बाल थे और वो भी इतने कड़े कि काँटे जैसे लग रहे थे पर आरती के नंगे शरीर पर वो कुछ अच्छे लग रहे थे यह बाल उसकी कामुकता को और भी बढ़ा रहे थे । रामु की आखें बंद थी पर आरती ने थोड़ी हिम्मत करके अपनी आखें खोली तो रामु के नंगे पड़े हुए शरीर को देखती रह गई कसा हुआ था मास पेशिया कही से भी ढीली नहीं थी थुलथुला पन नहीं था कही भी उसके पति की तरह । रामु में कोई कोमलता भी नहीं थी कठोर और बड़ा भी था बालों से भरा हुआ और उसके हाथ तो बस उसकी कमर के चारो और तक जाते थे कुछ जाँघो के बीच में गढ़ रहा था अगर उसका लण्ड हुआ तो बाप रे इतना बड़ा भी हो सकता है किसी का उसका मन अब तो रामू के लण्ड को आजाद करके देखने को हो रहा था वो अपने को रामू पर जिस तरह से घिस रही थी उसका पूरा अंदाज़ा रामु को था वो जानता था कि आरती अब पूरी तरह से तैयार थी पर वो क्या करे उसका मन तो अब तक इस हसीना के बदन से नहीं भरा था वो चाह कर भी उसे आजाद नहीं करना चाहता था पर इसी उधेड़ बुन में कब आरती उसके नीचे चली गई पता अभी नहीं चला और वो कब उसके ऊपर हावी हो गया नहीं पता वो आरती की पीठ को जकड़े हुए उसके होंठों को अब भी चूस रहा था


आरती के शरीर पर अब वो चढ़ने की कोशिश कर रहा था आरती की पैंटी में एक हाथ ले जाते हुए उसको उतारने लगा उतारने क्या लगभग फाड़ ही दी उसने बची कुची उसके पैरों से आजाद करदी पेटीकोट तो कमर के चारो और था ही जरूरत थी तो बस अपने साहब को आजाद करने की रामू होंठों से जुड़े हुए ही अपने हाथों से अपनी धोती को अलग करके अपने बड़े से अंडरवेयार को भी खोल दिया और अपने लण्ड को आजाद कर लिया और फिर से गुथ गया आरती पर अब उसे कोई चिंता नहीं थी वो अब अपने हर अंग से आरती को छू रहा था



अपने लण्ड को भी वो आरती की जाँघो के बीच में रगड़ रहा था उसके लिंग की गर्मी से तो आरती और भी पागल सी हो उठी अपने जाँघो को खोलकर उसने उसको जाँघो के बीच में पकड़ लिया और रामू से और भी सट गई अपने हाथों को रामू की पीठ के चारो ओर करके रामू काका को अपनी ओर खींचने लगी और आरती की इस हरकत से रामु और भी खुल गया जैसे अपनी बेटी को ही भोग रहा हो वो झट से आरती के शरीर पर छा गया और अपनी कमर को हिलाकर आरती के अंदर घुसने का ठिकाना ढूँडने लगा। आरती भी अब तक सहन ही कर रही थी पर रामु के झटको ने उसे भी अपनी जाँघो को खोलने और अपनी योनि द्वार को रामू के लण्ड के लिए स्वागत पर खड़े होना ही था सो उसने किया पर एक ही झटके में रामु उसके अंदर जब उतरा तो ....


आरती- ईईईईईईईईईईईईईईईई आआआआआआअह्ह कर उठी रामु का लण्ड था कि मूसल बाप रे मर गई आरती की चुत तो शायद फटकर खून निकला होगा आखें पथरा गई थी आरती कि इतना मोटा और कड़ा सा लण्ड जो कि उसके चुत में घुसा था अगर वो इतनी तैयार ना होती तो मर ही जाती पर उसकी चुत के रस्स ने रामु के लण्ड को आराम से अपने अंदर समा लिया पर दर्द के मारे तो आरती सिहर उठी। रामु अब भी उसके ऊपर उसे कस कर जकड़े हुए उसकी जाँघो के बीच में रास्ता बना रहा था। आरती थोड़ी सी अपनी कमर को हिलाकर किसी तरह से अपने को अड्जस्ट करने की कोशिश कर ही रही थी कि रामु का एक तेज झटका फिर पड़ा और आरती के मुख से एक तेज चीख निकल गई

पर वो तो रामु के गले में ही गुम हो गई रामु अब तो जैसे पागल ही हो गया था ना कुछ सोचने की जरूरत थी और नहीं ही कुछ समझने की बस अपने लण्ड को पूरी रफ़्तार से आरती की चुत में डाले हुए अपनी रफ़्तार पकड़ने में लगा था उसे इस बात की जरा भी चिंता नहीं थी कि आरती का क्या होगा उसे इस तरह से भोगना क्या ठीक होगा बहुत ही नाजुक है और कोमल भी पर रामू तो बस पागलो की तरह अपनी रफ़्तार बढ़ाने में लगा था और आरति मारे दर्द के बुरी तरह से तड़प रही थी वो अपनी जाँघो को और भी खोलकर किसी तरह से रामु को अड्जस्ट करने की कोशिश कर रही थी पर रामु ने उसे इतनी जोर से जकड़ रखा था कि वो हिल तक नहीं पा रही थी उसके शरीर का कोई भी हिस्सा वो खुद नहीं हिला पा रही थी जो भी हिल रहा था वो बस रामु के झटको के सहारे ही था रामु अपनी स्पीड पकड़ चुका था और आरति के अंदर तक पहुँच गया था हर एक धक्के पर आरति चिहुक कर और भी ऊपर उठ जाती थी पर रामु को क्या आज जिंदगी में पहली बार वो एक ऐसी हसीना को भोग रहा था जिसकी की कल्पना वो तो नहीं कर सकता था वो अब कोई भी कदम उठाने को तैयार था भाड़ में जाए सबकुछ वो तो इसको अपने तरीके से ही भोगेगा और वो सच मुच में पागलो की तरह से आरति के सारे बदन को चूम चाट रहा था और जहां जहां हाथ पहुँचते थे बहुत ही बेदर्दी के साथ दबा भी रहा था


अपने भार से आरति को इस तरह से दबा रखा था कि आरती क्या आरती के पूरे घर वाले भी जमा होकर रामु को हटाने की कोशिश करेंगे तो नहीं हटा पाएँगे और आरती जो कि रामु के नीचे पड़े हुए अपने आपको नर्क के द्वार पर पा रही थी अचानक ही उसके शरीर में अजीब सी फुर्ती सी आ गई । रामु की दरिंदगी में उसे सुख का एहसास होने लगा उसके शरीर के हर अंग को रामु के इस तरह से हाथों रगड़ने की आदत सी होने लगी थी यह सब अब उसे अच्छा लगने लगा था वो अब भी नीचे पड़ी हुई रामु के धक्कों को झेल रही थी और अपने मुख से हर चोट पर चीत्कार भी निकालती पर वो तो रामु के गले मे ही गुम हो जाती अचानक ही रामु की स्पीड और भी तेज हो गई और उसकी जकड़ भी बहुत टाइट हो गई अब तो आरति का सांस लेना भी मुश्किल हो गया था पर उसके शरीर के अंदर भी एक ज्वालामुखी उठ रहा था जो कि बस फूटने ही वाला था हर धक्के के साथ आरति का शरीर उसके फूटने का इंतजार करता जा रहा था और रामू के तने हुए लण्ड का एक और जोर दार झटका उसके अंदर कही तक टच होना था कि आरती का सारा शरीर काप उठा और वो झड़ने लगी और झड़ती ही जा रही थी आरति रामु से बुरी तरह से लिपट गई अपनी दोनों जाँघो को ऊपर उठा कर रामु की कमर के चारो तरफ एक घेरा बनाकर शायद वो रामु को और भी अंदर उतार लेना चाहती थी और रामु भी एक दो जबरदस्त धक्कों के बाद झड़ने लगा था वो भी आरती के अंदर ढेर सारा वीर्य उसके लण्ड से निकाला था जो कि आरति की योनि से बाहर तक आ गया था पर फिर भी रामु आख़िर तक धक्के लगाता रहा जब तक उसके शरीर में आख़िरी बूँद तक बचा था और उसी तरह कस कर आरति को अपनी बाहों में भरे रहा, दोनों कालीन में वैसे ही पड़े रहे। आरति के शरीर में तो जैसे जान ही नहीं बची थी वो निढाल सी होकर लटक गई थी । रामु काका जो कि अब तक उसे अपनी बाहों में समेटे हुए थे अब धीरे-धीरे अपनी गिरफ़्त को ढीला छोड़ रहे थे और ढीला छोड़ने से आरति के पूरे शरीर में जैसे जान ही वापस आ गई थी उसे सांस लेने की आजादी मिल गई थी वो जोर-जोर से सांसें लेकर अपने आपको संभालने की कोशिश कर रही थी
रामु आरती पर से अपनी पकड़ ढीली करता जा रहा था और अपने को उसके ऊपर से हटाता हुआ बगल में लुढ़क गया था वो भी अपनी सांसों को संभालने में लगा था रूम में जो तूफान आया था वो अब थम चुका था दोनों लगभग अपने को संभाल चुके थे लेकिन एक दूसरे की ओर देखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे रामु वैसे ही आरति की ओर ना देखते हुए दूसरी तरफ पलट गया और पलटा हुआ अपनी धोती ठीक करने लगा अंडरवेर पहना और अपने बालों को ठीक करता हुआ धीरे से उठा और दबे पाँव कमरे से बाहर निकल गया आरती जो कि दूसरी और चेहरा किए हुए थी रामु की ओर ना उसने देखा और ना ही उसने उठने की चेष्टा की वो भी चुपचाप वैसे ही पड़ी रही और सबकुछ ध्यान से सुनती रही उसे पता था कि रामू काका उठ चुके हैं और अपने आपको ठीक ठाक करके बाहर की ओर चले गये है आरति के चेहरे पर एक विजयी मुस्कान थी उसके चेहरे पर एक संतोष था एक अजीब सी खुशी थी आखों में और होंठों को देखने से यह बात सामने आ सकती थी पर वो वैसे ही लेटी रही और कुछ देर बाद उठी और अपने आपको देखा उसके शरीर में सिर्फ़ पेटीकोट था जिसका की नाड़ा कब टूट गया था उसे नहीं पता था और कुछ भी नहीं था हाँ… था कुछ और भी रामू के हाथों और दाँतों के निशान और
उसका पूरा शरीर थूक और पसीने से नहाया हुआ था वो अपने को देखकर थोड़ा सा मुस्कुराइ आज तक उसके शरीर में इस तरह के दाग कभी नहीं आए थे होंठों पर एक मुस्कान थी रामु काका के पागलपन को वो अपने शरीर पर देख सकती थी जो की उसने कभी भी अपने पति से नहीं पाया था वो आज उसने रामू काका से पाया था उसकी चुचियों पर लाल लाल हथेली के निशान साफ दिख रहे थे वो यह सब देखती हुई उठी और पेटीकोट को संभालते हुए अपनी ब्लाउस और ब्रा को भी उठाया और बाथरूम में घुस गई जब वो बाथरूम से निकली तो उसे बहुत जोर से भूख लगी थी याद आया कि उसने तो खाना खाया ही नहीं था

अब क्या करे नीचे जाने की हिम्मत नहीं थी रामू काका को फेस करने की हिम्मत वो जुटा नहीं पा रही थी पर खाना तो खाना पड़ेगा नहीं तो भूख का क्या करे घड़ी पर नजर गई तो वो सन्न रह गई 1: 30 हो गये थे तो क्या रामु और वो एक दूसरे से लगभग दो घंटे तक सेक्स का खेल खेल रहे थे। रवि तो 5 से 10 मिनट में ही ठंडा हो जाता था और आज तो कमाल हो गया । आरती का पूरा शरीर थक चुका था उसे हाथों पैरों में जान ही नहीं थी पूरा शरीर दुख रहा था हर एक अंग में दर्द था और भूख भी जोर से लगी थी।

थोड़ी हिम्मत करके उसने नीचे जाने का फैसला किया।

रामु की भी हालत खराब थी वो जब नीचे आया तो उसके हाथ पाँव फूले हुए थे वो सोच नहीं पा रहा था कि वो अब बहू को कैसे फेस करेगा वो अपने आपको कहाँ छुपाए कि बहू की नजर उसपर ना पड़े पर जैसे ही वो नीचे आया तो उसके मन में एक चिंता घर कर गई थी और खड़ा-खड़ा किचेन में यही सोच रहा था कि बहू ने खाना तो खाया ही नहीं

मर गये अब क्या होगा मतलब आरति को खाना ना खिलाकर वो तो किचेन साफ भी नहीं कर सकता और वो बहू को कैसे नीचे बुलाए और क्या बहू नीचे आएगी कही वो अपने कमरे से रवि या फिर सोनल को फोन करके बुला लिया तो कही पोलीस के हाथों उसे दे दिया तो क्या यार क्या कर दिया मैंने क्यों किया यह सब वो अपने हाथ जोड़ कर भगवान को प्रार्थना करने लगा प्लीज भगवान मुझे बचा लो प्लीज अब नहीं करूँगा उसके आखों में आँसू थे वो सच मुच में शर्मिंदा था जिस घर का नमक उसने खाया था उसी घर की इज़्ज़त पर उसने हाथ डाला था अगर किसी को पता चला तो उसकी इज़्ज़त का क्या होगा गाँव में भी उसकी थू-थू हो जाएगी और तो और वो साहब और सोनल को क्या मुँह दिखाएगा सोचते हुए वो
खड़ा ही था की किचन के दरवाजे पे आरति को खड़े देखा, डर के साथ हकलाहट में वो सबकुछ एक साथ कह गया, बहु रानी खाना खा लो, पर दूसरी ओर से कुछ भी आवाज ना आने से वो फिर घबरा गया
रामू-- बहुऊऊ,

आरति- खाना लगा दो

आरति के पास और कुछ कहने को नहीं था अगर भूखी नहीं होती तो शायद नीचे भी ना आती पर क्या करे उसने फिर से वही सुबह वाला सूट पहना और उसे रामु काका जल्दी-जल्दी खाने के टेबल पर उसका खाना लगा रहे थे वो भी बिना कुछ आहट किए चुपचाप डाइनिंग टेबल पर पहुँची आरति को आता सुनकर ही रामु जल्दी से किचेन में वापस घुस गया आरति भी नीचे गर्दन किए खाना खाने लगी थी जल्दी-जल्दी में क्या खा रही थी उसे पता नहीं था पर जल्दी से वो यहां से निकल जाना चाहती थी किसी तरह से उसने अपने मुँह में जितनी जल्दी जितना हो सकता था ठूँसा और उठ कर वापस अपने कमरे की ओर भागी नीचे बेसिन पर हाथ मुख भी नहीं धोया था उसने
कमरे में आकर उसने अपने मुँह के नीवाले को ठीक से खाया और बाथरूम में मुँह हाथ धोकर बिस्तर पर लेट गई अब वो सेफ थी पर अचानक ही उसके दिमाग में बात आई कि उसे तो शाम को ड्राइविंग पर जाना था अरे यार अब क्या करे उसका मन तो बिल्कुल नहीं था उसने फोन उठाया और रवि को रिंग किया

रवि- हेलो

आरति- सुनिए प्लीज आज ना में ड्राइविंग पर नहीं जाऊँगी कल से चली जाऊँगी ठीक है

रवि- हहा ठीक है क्यों क्या हुआ

आरति- अरे कुछ नहीं मन नहीं कर रहा कल से ठीक है

रवि- हाँ ठीक है कल से चलो रखू

आरति- जी

और फोन काट गया
आरती ने भी फोन रखा और बिस्तर पर लेटे लेटे सीलिंग की ओर देखती रही और पता नहीं क्या सोचती रही और कब सो गयी मालूम ही नही चला।
शाम को जब वो उठी तो एक अजीब सा एहसास था उसके शरीर में एक अजीब सी कशिश थी उसके अंदर एक ताजगी सी महसूस कर रही थी वो सिर हल्का था शरीर का दर्द पता नहीं कहाँ चला गया था सोई तो ऐसी थी कि जनम में ऐसी नींद उसे नहीं आई थी

बहुत अच्छी और फ्रेश करने वाली नींद आई थी उठकर जब आरती बाथरूम से वापस आई तो मोबाइल पर रिंग बज रहा था उसने देखा रवि का था
आरती- हेलो
रवि- कहाँ थी अब तक
आरती- क्यों क्या हुआ
रवि--- देखो 6 7 बार कॉल किया
आरती- अरे में तो सो रही थी और अभी ही उठी हूँ
रवि- अच्छा बहुत सोई हो आज तुम
आरती- जी कहिए क्या बात है
रवि- पार्टी में में चलना है रात को
आरति- कहाँ
रवि- अरे बर्तडे पार्टी है मेहता जी के बेटे के बेटे का
आरति- हाँ हाँ ठीक है कितने बजे
‌रवि- वही रात को 9:30 -10 बजे करीब तैयार रहना
आरती- ठीक है
और आरती का फोन कट गया अब आरती ने फ़ोन को देखा कि 6 मिस्ड कॉल थे उसे सेल पर
कितना सोई थी आज वो फ्रेश सा लग रही थी वो
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08-27-2019, 01:24 PM,
#13
RE: Kamvasna आजाद पंछी जम के चूस.
मिरर के सामने खड़ी होकर अपने को देखा तो बिल्कुल फ्रेश लग रही थी चेहरा खिला हुआ था और आखें भी नींद के बाद भी खिली हुई थी अपना ड्रेस और बाल को ठीक करने के बाद वो नीचे जाती कि दरवाजा नॉक हुआ

सोनल-- मम्मी जी, चाय नहीं पीनी क्या

आरति- आती हूँ सोनल। चलो।

और भागती हुई नीचे चली गई रामू काका का कही पता नहीं था शायद किचेन में थे। सोनल डाइनिंग टेबल पर थी और आरती का ही इंतजार कर रही थी। आरती भी जाकर सोनल के पास बैठ गई और दोनों चाय पीने लगे

सोनल- मम्मी, पापा का फोन आया था कह रहै थे कि कोई पार्टी में जाना है

आरती--- हां बात हुई थी मेरी भी।

सोनल- हाँ पापा कह रहै थे कि मम्मी फोन नहीं उठा रही है

आरती- सो रही थी सुनाई नहीं दिया

सोनल- हाँ… मैंने भी यही कहा था (कुछ सोचते) थोड़ा बहुत घूम आया करो मम्मी जी पूरा दिन घर में रहने से आप भी पुम्मी आंटी जैसे मोटी हो जाएगी

आरती- अच्छा जी कहाँ जाऊ

सोनल- देखो मम्मी पापा को तो कमाने से फुर्सत नहीं है पर आप तो पढ़ी लिखी है घर के चार दीवारी से बाहर निकलो और देखो दुनियां में क्या चल रहा है और कुछ खर्चा भी किया करो, क्या करेंगे इतना पैसा जमा कर कोई तो खर्चा करे । मुझे तो करने देते नही।हीहीही हीहीही।

आरती- अच्छा दादी अम्मा जी ही ही ही ही

दोनों माँ और बेटी में हँसी मजाक चल रहा था और एक दूसरे को सिखाने में लगे थे
पर आरती का मन तो आज बिल्कुल साफ था आज का अनुभव उसके जीवन में जो बदलाब लाने वाला था उससे वो बिल्कुल अंजान थी। बातों में उसे दोपहर की घटना को वो भूल चुकी थी या फिर कहिए कि अब भी उसका ध्यान उस तरफ नहीं था वो तो सोनल के साथ हँसी मजाक के मूड में थी और शाम की पार्टी में जाने के लिए तैयार होने को जा रही थी। बहुत दिनों के बाद आज वो कही बाहर जा रही थी
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josef
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Re: आजाद पंछी जम के चूस
Post by josef » 22 Jan 2019 11:00

चाय पीने के बाद सोनल अपने कमरे की ओर चली गई और आरती अपने कमरे की ओर तैयार जो होना था वारड्रोब से साडियो के ढेर से अपने लिए एक जड़ी की साड़ी निकाली और उसके साथ ही मैचिंग ब्लाउस रवि को बहुत पसंद था एक ड्रेस

यही सोचकर वो तैयारी में लग गई 9 तक रवि आ जाएगा सोचकर वो जल्दी से अपने काम में लग गई

करीब 9 15 तक रवि आ गया और अपने कमरे में पहुँचा कमरे में आरति लगभग तैयार थी । रवि को देखकर आरती ड्रेसिंग टेबल छोड़ कर खड़ी हो गई और मुस्कुराते हुए अपने आपको रवि के सामने प्रेज़ेंट करने लगी

रवि जो कि उसका दिमाग़ कही और था, आरती की सुंदरता को अपने सामने खड़े इस तरह की साड़ी में देखता रहता । आरती इस समय एक महीन सी साड़ी पहने हुए थी स्लीव्ले ब्लाउज था और चूचियां को समझ के ढका था पर असल में दिखाने की ज्यादा कोशिश थी साड़ी का पल्लू भी दाई चुचि को छोड़ कर बीच से होता हुआ कंधे पर गया था उससे दाई चूची बाहर की और उछलकर मुँह उठाए देख रहा था

लेफ्ट चुचि ढका क्या था सामने वाले को निमंत्रण था कि कोशिश करो तो शायद कुछ ज्यादा दिख जाए क्लीवेज साफ-साफ नीचे तक दिख रहे थे मुस्कुराते हुए आरती ने पलटकर भी रवि को अपना हुश्न दिखाया पीछे से पीठ आधे से ज्यादा खुले हुए थे पतली सी पट्टी ही उसे सामने से पकड़ी हुई थी और वैसे ही कंधे पर से पट्टी उतरी थी

रवि- (सिटी बजाते हुए) क्या बात है आज कुछ ज्यादा ही तैयार हो हाँ… कहाँ बिजली गिराने वाली हो
आरती- हीही और कहाँ जहां गिर जाए यहां तो कुछ फरक नहीं पड़ता क्यों है ना
रवि- हाँ… फिर आज नहीं जाते यही बिजली गिराती रहो ठीक है
आरती- ठीक है
रवि हँसते हुए बाथरूम में घुस गया और आरती भी वापस अपने आपको मिरर में सवारने का अंतिम टच दे रही थी
रवि भी जल्दी से तैयार होकर आरति को साथ में लेकर नीचे की चल दिया। रवि के साथ आरती भी नीचे की जा रही थी डाइनिंग रूम के पर करते हुए वो दोनों सोनल के कमरे की तरफ चल दिए ताकि उसको बोल कर जा सके
रवि- सोनल बेटा हम जा रहे है
सोनल- ठीक है पापा जी
रवि- बेटा जी, खाना खाकर जल्दी सो जाना।
सोनल--- ठीक है पापा जी। अंदर से ही आवाज दे रही थी।
रवि और आरती मुड़े और पलटकर वो बाहर की ओर चले
रवि- अरे रामु काका दरवाजा बंद कर लेना ।
आरती के शरीर में एक सिहरन सी फेल गई जैसे ही उसने रामू काका का नाम सुना उसने ना चाह कर भी पीछे पलटकर किचेन की ओर देख ही लिया शायद पता करना चाहती हो कि रामु काका ने उसे इस तरह से तैयार हुए देखा की नहीं
क्यों चाहती थी, आरती की रामू काका उसे देखे क्यों? पर आरती थोड़ा सा रुक गई । रवी आगे की ओर निकल गया था पलटकर आरती ने जब किचेन की ओर देखा तो पाया कि किचेन के पीछे के दरवाजे से कोई बाहर की ओर निकलते हुए भागा है।
किचेन में एक दरवाजा पीछे की तरफ भी खुलता था जिससे रामु कचरा बाहर फैंकता था या फिर नौकरो के आने जाने का था । बाहर निकलने वाला शायद कौन होगा
पर जो भी था इस समय किचेन में क्या कर रहा था शायद पानी या फिर कुछ खाने आया होगा जैसे ही वो बाहर को निकला वैसे ही रामू किचेन के दरवाजे पर दरवाजा बंद करने को डाइनिंग स्पेस पर निकलकर आया
अब रामु और आरती एकदम आमने सामने थे। रवि बाहर निकल गया था। आरती ड्राइंग रूम के बीच में खड़ी थी फुल्ली ड्रेसअप बिजली गिराती हुई कामसुख और मादकता लिए हुए सुंदर और सेक्सी दिखती हुई और किसी भी साधु या फिर सन्यासी की नियत को हिलाने के लिए ,

जैसे ही रामु और आरती की नजर आपस में टकराई दोनों जैसे जमीन में धस्स गये थे दोनों एक दूसरे को देखते रह गये। रामु की नजर तो जैसे जम गई थी। आरति के ऊपर नीचे से ऊपर तक एकटक निहारता रह गया वो आरती। को क्या लग रही थी किसी अप्सरा की तरह और रामू को देखकर आरती को दोपहर का वाकया याद आ गया कि कैसे रामू ने उसे रोंदा था और कैसे उसके हाथ और होंठों ने उसे छुआ और चूमा था हर वो पहलू दोनों के जेहन में एक बार फिर ताजा हो गई थी दोनों के आँखों में एक सेक्स की लहर दौड़ गई थी । आरती का पूरा शरीर सिहर गया था उसके जाँघो के बीच में हलचल मच गई थी निपल्स ब्रा के अंदर सख़्त हो गये थे

रामू का भी यही हाल था उसके धोती के अंदर एक बार फिर उसके पुरुषार्थ ने चिहुक कर अपने अस्तित्व की आवाज को बुलंद कर दिया था वो अपने को आजाद करने की गुहार लगाने लग गया था दोनों खड़े हुए एक दूसरे को देखते रह गये किसी ने भी आगे बढ़ने की या फिर नजर झुका के हटने की कोशिश नहीं की
पर बाहर से रवि की आवाज ने आरती और रामु को चौंका दिया। आरति पलटकर जल्दी से गाड़ी की ओर भाग गयी।
बाहर रवि गाड़ी के अंदर बैठ चुका था और गाड़ी का गेट खुला था । आरती ने अपने पल्लू को संभाल कर जल्दी से गाड़ी के पास आई और गाड़ी में बैठ गयी।

रामु मंत्रमुग्ध सा आरती के यौवन को निहारता रहा

और अपने आँखों में उसकी सुंदरता को उतारता रहा कामया ने एक बार ओर रामू काका की ओर देखा और चुपचाप दरवाजे से अंदर जाकर अपनी सीट पर बैठ गई । रामु भी लगभग दौड़ता हुआ दरवाजा बंद करने लगा। बाद में उसे पता ही नहीं चला था कि कैसे दो घंटे बीत गये थे और वो सिर्फ़ बहू के बारे में ही सोचता रहा गया था वो अपने अंदर एक ग्लानि से पीड़ित हो गया था छि छी वो क्या सोच रहा था जिनका वो नमक खाता है उनके घर की बहू के बारे में वो क्या सोच रहा था रवि को उसने दो साल का देखा था और तब से वो इस घर का नौकर था । नहीं उसे यह सब नहीं सोचना चाहिए यह गलत है वो कोई जानवर तो नहीं है वो एक इंसान है जो गलत है वो उसके लिए भी गलत है वो बाहर गार्डन में बैठा था।

पर उसका दिमाग पूरा समय इसी सोच में डूबा था। पर उसके मन का वो क्या करे वो चाह कर भी अपनी नजर बहू के ऊपर से नहीं हटा पाया था पर घर लौटते समय उसने एक बार भी बहू की ओर नहीं देखा था उसने अपने मन पर काबू पा लिया था इंसान अगर कोई चीज ठान ले तो क्या वो नहीं कर सकता बिल्कुल कर सकता है उसने अपने दिमाग पर चल रहे ढेर सारे सवाल को एक झटके से निकाल दिया और फिर से एक नमक हलाल नोकर के रूप में आ गया और गाड़ी घर के अंदर की ओर तेजी से दौड़ चलो थी अंदर बिल्कुल सन्नाटा था घर के गेट पर चौकी दार खड़ा था गाड़ी आते देखकर झट से दरवाजा खुल गया गाड़ी की आवाज से अंदर से रामू भी दौड़ कर आया और घर का दरवाजा खोलकर बाजू में सिर झुकाए खड़ा हो गया।

आरती भी जल्दी से अपनी नजर को नीचे किए रामू काका को पार करके सीधे सीडियो की ओर भागी और अपने रूम में पहुँची रूम में जाकर देखा कि रवि बाथरूम में है तो वो अपनी साड़ी उतारकर सिर्फ़ ब्लाउस और पेटीकोट में ही खड़ी होकर अपने आपको मिरर पर निहारती रही

वो जानती थी कि रवि के बाहर आते ही वो उसपर टूट पड़ेगा इसलिए वो वैसे ही खड़ी होकर उसका इंतजार करती रही हमेशा रवि उसे घूमके आने के बाद ऐसे ही सिर्फ़ साड़ी उतारने को ही कहता था बाकी उसका काम था आग्याकारी पत्नी की तरह आरती खड़ी रवि का इंतजार कर रही थी और बाथरूम का दरवाजा खुला । आरती को मिरर के सामने देखकर रवि भी उसके पास आ गया और पीछे से आरती को बाहों में भरकर उसके चूचियां को दबाने लगा

आरती के मुख से एक अया निकली और वो अपने सिर को रवि के कंधों के सहारे छोड़ दिया और रवि के हाथों को अपने शरीर में घूमते हुए महसूस करती रही वो रवि का पूरा साथ देती रही और अपने आपको रवि के ऊपर न्योछाबर करने को तैयार थी। रवि के हाथ आरती की दोनों चुचियों को छोड़ कर उसके पेट पर आ गये थे और अब वो आरती की नाभि को छेड़ रहा था वो अपनी उंगली को उसकी नाभि के अंदर तो कभी बाहर करके आरती को चिढ़ा रह था । अपने होंठों को आरती के गले और गले से लेजाकर उसके होंठों पर रखकर वो आरती के होंठों से जैसे सहद को निकालकर अपने अंदर लेने की कोशिश कर रहा था। आरति भी नहीं रहा गया वो पलटकर रवि की गर्दन के चारो और अपनी बाहों को पहना कर खुद को रवि से सटा लिया और अपने पेट और चुत को वो रवि से रगड़ने लगी थी उसके शरीर में जो आग भड़की थी वो अब रवि ही बुझा सकता था

वो अपने आपको रवि के और भी नजदीक ले जाना चाहती थी और अपने होंठों को वो रवि के मुख में घुसाकर अपनी जीब को रवि के मुख में चला रही थी रवि का भी बुरा हाल था वो भी पूरे जोश के साथ आरती के बदन को अपने अंदर समा लेना चाहता था वो भी आरती को कस्स कर अपने में समेटे हुए धम्म से बिस्तर पर गिर पड़ा और गिरते ही रवि आरति के ब्लाउसपर टूट पड़ा जल्दी-जल्दी उसने एक झटके में आरति के ब्लाउसको हवा में उछाल दिया और ब्रा भी उसके कंधे से उसी तरह बाहर हो गई थी । आरति के ऊपर के वस्त्र के बाद रवि ने आरति के पेटीकोट और पैंटी को भी खींचकर उत्तार दिया और बिना किसी देरी के वो आरती के अंदर एक ही झटके में समा गया


आरती उउउफ तक नहीं कर पाई अऔर रवि उसके अंदर था अंदर और अंदर और भी अंदर और फिर रवि किसी पिस्टन के तरह आरति के अंदर-बाहर होता चला गया । आरती के अंदर एक ज्वार सा उठ रही थी और वो लगभग अपने शिखर पर पहुँचने वाली ही थी। रवि जिस तरह से उसके शरीर से खेल रहा था उसको उसकी आदत थी वो रवि का पूरा साथ दे रही थी और उसे मजा भा आ रहा था उधर रवि भी अपने आपको जब तक संभाल सकता था संभाल चुका था अब वो भी रवि के शरीर के ऊपर ढेर होने लग गया था अपनी कमर को एक दो बार आगे पीछे करते हुए वो निढाल सा आरती के ऊपर पड़ा रहा और आरति भी रवि के साथ ही झड चुकी थी और अपने आपको संतुष्ट पाकर वो भी खुश थी वो रवि को कस्स कर पकड़े हुए उसके चेहरे से अपना चेहरा घिस रही थी और अपने आपको शांत कर रही थी जैसे ही रवि को थोड़ा सा होश आया वो लुढ़क कर आरति के ऊपर से हाथ और अपने तकिये पर सिर रख कर आरति की ओर देखते हुए
रवि- स्वीट ड्रीम्स डार्लिंग

आरती- स्वीट ड्रीम्स डियर और उठकर वैसे ही बिना कपड़े के बाथरूम की ओर चल दी। तभी उसे खिड़की के बाहर फिर से साया नजर आया। आज फिर वो न्नगी थी खिड़की पर जा नही सकी। वो सोचतेहुए बाथरूम में गुस गयी। जब वो बाहर आई तो रवि सो चुका था और वो अपने कपड़े जो कि जमीन पर जहां तहाँ पड़े थे उसको समेट कर वारड्रोब में रखा और अपनी जगह पर लेट गई और सीलिंग की ओर देखते हुए रवि की तरफ नज़रें घुमा ली जो कि गहरी नींद में था। आरति अपनी ओर पलटकर सोने की कोशिश करने लगी और बहुत ही जल्दी वो भी नींद के आगोस में चली गई।

सुबह रोज की तरह वो लेट ही उठी। रवि बाथरूम में था वो भी उठकर अपने आपको मिरर में देखने के बाद रवि का बाथरूम से निकलने का वेट करने लगी

जब रवि निकला तो वो भी बाथरूम में घुस गई और कुछ देर बाद दोनों चेंज करके नीचे सोनल के साथ चाय पीरहे थे। आरती और रवि एक दूसरे से बातों में इतना व्यस्त थे कि सोनल का ध्यान किसी को नहीं था और न हीं सोनल को कोई इंटेरस्ट था इन सब बातों में वो तो बस अपने आप में ही खुश रहने वाली लड़की थी और कोई ज्यादा अपेक्षा नहीं थी उसे किसी से।
अपने घर वालों से एक तो किसी बात की बंदिश नहीं थी उसे यहां और ना ही कोई रोक टोक और नहीं ही कोई काम था तो क्या शिकायत करे । वो बस अपने मे खुश रहती थी। न ही स्कूल में किसी से ज्यादा मेलजोल। सबकी चाय खतम हुई और सब अपने कमरे की ओर चल दिये। पूरे घर में फिर से शांति सब अपने कमरे में जाने की तैयारी में लगे थे। आरती वही बिस्तर बैठी रवि के बाथरूम से निकलने की राह देख रही थी और उसके कपड़े निकालकर रख दिए थे वो बैठे बैठे सोच रही थी कि रवि बाथरूम से निकलते ही जल्दी से अपने कपड़े उठाकर पहनने लगा
रवि-् हाँ… आरती आज तुम क्या गाड़ी चलाने जाओगी

आरती- आप बताइए

रवि- नहीं नहीं मेरा मतलब है कि शायद मैं थोड़ा देर से आऊँगा तो अगर तुम भी कही बीजी रहोगी तो अपने पति की याद थोड़ा कम आएगी हीही

आरति- कहिए तो पूरा दिन ही गाड़ी चलाती रहूं

रवि- अरे यार तुमसे तो मजाक भी नहीं कर सकते

आरती- क्यों आएँगे लेट

रवि- काम है यार

आरती- ठीक है पर क्या मतलब कब तक चलाती रहूं

रवि- अरे जब तक तुम्हें चलानी है तब तक और क्या मेरा मतलब था कि कोई जरूरत नहीं है जल्दी बाजी करने की
आरती- ठीक है पर क्या रात को इतनी देर तक में वहां ग्राउंड पर मनोज अंकल के साथ मेरा मतलब

रवि- अरे यार तुम भी ना , मनोज अंकल हमारे बहुत ही पुराने जानकार है अपनी जान दे देंगे पर तुम्हें कुछ नहीं होने देंगे

आरती- जी पर

रविवि- क्या पर वर छोड़ो मैं छोड़ दूँगा तुम तैयार रहेना ठीक है जब भी आए चली जाना

आरति- जी
और दोनों नीचे की ओर चल दिए डाइनिंग रूम में खाना लगा था। रवि के बैठ-ते ही आरति ने प्लेट मे खाना लगा दिया और पास में बैठकर रवि को खाते देखती रही । रवि जल्दी-जल्दी अपने मुख में रोटी और सब्जी ठूंस रहा था और जल्दी से हाथ मुँह धोकर बाहर को लपका रवि के जाने के बाद आरती भी अपने रूम की ओर चल दी पर जाते हुए उसे रामु काका डाइनिंग टेबल के पास दिख गये वो झूठे प्लेट और बाकी का समान समेट रहे थे। आरती के कदम एक बार तो लडखडाये फिर वो सम्भल कर जल्दी से अपने कमरे की ओर लपकी और जल्दी से अपने कमरे में घुसकर दरवाजा लगा लिया पता नहीं क्यों उसे डर लग रहा था अभी थोड़ी देर में ही सोनल भी चली जाएँगी और तब वो क्या करेगी अभी आते समय उसने रामू काका को देखा था पता नहीं क्यों उनकी आखों में एक आजीब सी बात थी की उनसे नजर मिलते ही वो काप गई थी उसकी नजर में एक निमंत्रण था जैसे की कह रहा था कि आज का क्या आरति।
बाथरूम में जल्दी से घुसी और जितनी जल्दी हो सके तैयार होकर नीचे जाने को तैयार थी जब उसे लगा कि सोनल डाइनिंग टेबल पर पहुँच गयी होगी तो वो भी सलवार कुर्ता पहने हुए डाइनिंग टेबल पर पहुँच गई और सोनल के पास बैठ गई । सोनल को भी कोई आपत्ति नहीं थी या फिर कोई शक या शुबह नहीं। रामु काका ने भी आरती का प्लेट लगा दिया और आरती ने नज़रें झुका कर अपना खाना शुरू रखा ।


और सोनल की ओर देखते हुए

आरती- हाँ…सोनल बेटा आज मुझे जाना है गाड़ी सीखने, तुम शाम को घर पर रहना।

सोनल- जी मम्मी जी, रामु काका है ना और मोनिका दी को बुला लुंगी।

और आरति के सोए हुए अरमान फिर से जाग उठे थे जिस बात को वो भूल जाना चाहती थी । सोनल ने एक बार फिर से याद दिला दिया था वो आज अकेले नहीं रहना चाहती थी और ना ही रामु काका के करीब ही आना चाहती थी कल की गलती का उसे गुमान था वो उसे फिर से नहीं दोहराना चाहती थी पर ना जाने क्यों जैसे ही सोनल ने रामु काका का नाम लिया तो उसे कल की दिन की घटना याद आ गई थी और फिर खाते खाते रात की बात

उसके शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गई थी वो ना चाहते हुए भी एक जोर की सांस छोड़ी और अपने जाँघो को आपस में जोड़ लिया और नज़रें झुका के खाने लगी पर मन था कि बार-बार उसके जेहन में वही बात याद डालती जा रही थी वो आपने आपसे लड़ने लगी थी अपने मन से या फिर कहिए अपने दिमाग से बार-बार वो अपनी निगाहे उठाकर की ओर देखने लगी थी कि शायद कोई और बात हो

तो वो यह बात भूलकर कहीं और इन्वॉल्व हो जाए पर कहाँ सेक्स एक ऐसा खेल है या फिर कहिए एक नशा है कि पेट भरने के बाद सबसे जरूरी शारीरिक भूक पेट की भूख बुझी नहीं कि पेट के नीचे की चिंता होने लगती है और,,,,
आरती तो एक बार वो चख चुकी थी और उसका पूरा मजा भी ले चुकी थी वो तो बस उसको अवाय्ड करना चाहती थी वो यह अच्छे से जानती थी, कि अगर वो ना चाहे तो रामू क्या रामू का बाप भी उसे हाथ नहीं लगा सकता था और वो तो इस घर का नौकर है किसे क्या बताएगा एक शिकायत में तो वो घर से बाहर हो जाएगा इसलिए उसे इस बात की चिंता तो बिल्कुल नहीं थी की रामु उसके साथ कोई गलत हरकत कर सकता है पर वो अपने आपको कैसे रोके यही सोचते हुए ही तो वो आज सोनल के साथ ही खाना खाने को आ गई थी अभी जब रवि गया था तब भी उसकी आखें रामु से टकराई थी उसने रामु काका की आखों में वही भूख देखी थी या फिर शायद इंतजार देखा था जो कि उसके लिए खतरनाक था अगर वो नहीं संभली तो पता नहीं क्या होजायगा

यही सोचते हुए वो अपनी निगाहे झुकाए खाना खा रही थी। सोनल का नास्ता हो गया तो वो जल्दी-जल्दी करने लगी
सोनल- अरे अरे मम्मी आराम से ख़ालो ।

आरती- बस हो गया और आखिरी नीवाला किसी तरह से अपने मुँह में ठूँसा और पानी के ग्लास पर हाथ पहुँचा दिया
सोनल भी हँसते हुए उठ गई और आरति भी
दोनो उठकर हाथ मुँह धोया और बाहर निकल कर बस का इंतजार करने लगे ।

सोनल के जाते ही आरती पीछे-पीछे अपने कमरे की ओर बढ़ गई थी ना जाने क्यों वो अपने को अकेला नहीं छोड़ना चाहती थी या फिर डर था कही कोई फिर से गलत कदम ना उठा ले या फिर अपने शरीर की भूख को संभालने की चेष्टा थी यह जो भी हो वो सोनल के जाते साथ ही अपने कमरे में आ गई थी आते समय जब उसका ध्यान डाइनिंग टेबल पर गया तो देखा कि डिननिग टेबल साफ था मतलब रामू काका ने आज जल्दी ही टेबल साफ कर दिया था नहीं तो वो हमेशा ही सबके अपने कमरे में पहुँचने का इंतजार करता था और फिर आराम से डाइनिंग टेबल साफ करके वर्तन धो कर रख देता था अंदर किचेन से वर्तन धोने की आवजे भी आ रही थी वो कुछ और ज्यादा नहीं सोचते हुए जल्दी से कमरे में घुस गई फिर मुड़ कर वपिश आयी,
एक लंबी सी सांस फेक कर रूम के बाहर आते ही वो थोड़ा सा सचेत हो गई थी उसकी नजर अनायास ही डाइनिंग रूम और फिर उसके आगे किचेन तक चली गई थी पर वहां शांति थी बिल्कुल सन्नाटा वो थोड़ा रुकी और थोड़ा धीरे-धीरे अपने कदम बढ़ाते हुए सीडियो की ओर चली पर उसे कोई भी आहट सुनाई नहीं दी कहाँ है रामू काका किचेन में नहीं है क्या या फिर अपने कमरे में चले गये होंगे ऊपर या फिर सोचते हुए आरति सीडियो पर चढ़ती हुई अपने कमरे की ओर जा रही थी पर ना जाने क्यों उसका मन बार-बार किचेन की ओर देखने को हो रहा था शायद इसलिए कि कल दोपहर को जो घटना हुई थी क्या वो रामू कका भूल गये थे या फिर घर छोड़ कर भाग गये थे या फिर कुछ और ......


वो सीडिया चढ़ती जा रही थी और सोच रही थी क्या रामु काका उससे एक बार खेल कर ही उसे भूल गये है पर वो तो नहीं भूल पाई तो क्या वो जितनी सुंदर और सेक्सी लगती थी वो अब नहीं रही। क्या रामू काका भी एक बार के बाद उसे फिर से अपने साथ सेक्स के लिए लालायित नहीं होंगे मैंने तो सुना था कि आदमी एक बार किसी औरत को भोग ले तो बार-बार उसकी इच्छा करता है और वो तो इतनी खूबसूरत है और उसने इस बात की पुष्टि भी की थी उसे रामू काका की नज़रों में ही यह बात दिखी थी पर अभी तो कही गायब ही हो गये थे वो सीढ़ियाँ चढ़ना भूल गई थी वही एक जगह खड़ी होकर एकटककिचेन की ओर ही देख रही थी

कुछ सोचते हुए वो फिर से नीचे की ओर उत्तरी और धीरे-धीरेकिचेन की ओर चल दी उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था पर फिर भी हिम्मत करके वो किचेन की ओर जा रही थी पर क्यों क्या पता नहीं पर आरती के पैर जो कि अपने आप ही किचेन की ओर जा रहे थे किचेन के दरवाजे पर पहुँचकर उसने अंदर देखा वहाँ शांति थी वो थोड़ा और
आगे बढ़ी तो उसे रामू काका के पैर देखे वो शायद नीचे फ्लोर पर पोछा लगा रहे थे उसे अपने को इस स्थिति में पाकर आगे क्या करे सोचने का टाइम भी ना मिला कि तभी रामु की नजर आरति पर पड़ गई वो आरती को दरवाजे पर खड़ा देखकर जल्दी से उठा और अपने धोती को संभालते हुए हाथ पीछे करके खड़ा हो गया
और
रामू- जी बहू रानी कुछ चाहिए

आरती -- जी वो पानी

रामू- जी बहू रानी

उसकी नजर अब भी नीचे ही थी पर बहू के इस समय अपने पास खड़े होना उसके लिए एक बहुत बड़ा बरदान था वो नजरें झुकाए हुए आरती की टांगों की ओर देख रहा था और पानी का ग्लास फिल्टर से भरकर आरती की ओर पलटा आरती ने हाथ बढ़ाकर ग्लास लिया तो दोनों की उंगलियां आपस में टच हो गये आरती और रामु के शरीर में एक साथ एक लहर सी दौड़ गई और शरीर के कोने कोने पर छा गई वो एक दूसरे को आखें उठाकर देखने की हिम्मत नहीं कर पा रहे थे

पर किसी तरह आरती ने पानी पिया पिया वो तो अपने आपको रामू के सामने पाकर कुछ और नहीं कह पाई थी तो पानी माँग लिया था और झट से ग्लास प्लतेफोर्म में रख कर पलट गई और अपने कमरे की ओर चल दी

रामू वही खड़ा-खड़ा अपने सामने सुंदरी को जाते हुए देखता रहा वो चाहता था कि आरती रुक कर उससे बात करे कुछ और नहीं भी करे तो कम से कम रुक जाए और वही खड़े रहे वो उसको देखना चाहता था बस देखना चाहता था नजर भर के पर वो तो जा रही थी उसका मन कर रहा था कि जाके रोक ले वो बहू को और कल की घटना के बारे में पूछे कि कल क्यों उसने वो सब किया मेरे साथ पर हिम्मत नहीं हुई वो अब भी आरती को सीडिया चढ़ते देख रहा था किसी पागल भिखारी की तरह जिसे सामने जाती हुई राहगीर से कुछ मिलने की आसा अब भी बाकी थी

तभी आरती आखिरी सीढ़ी में जाकर थोड़ा सा रुकी और पलट कर किचेन की ओर देखी पर रामू को उसकी तरफ देखता देखकर जल्दी से ऊपर चली गई रामू अब भी अपनी आखें फाड़-फाड़कर सीडियो की ओर यूँ ही देख रहा था पर वहाँ तो कुछ भी नहीं था सबकुछ खाली था और सिर्फ़ उसके जाने के बाद एक सन्नाटा सा पसर गया था उसे कोने में

कोने में ही नही बल्कि पूरे घर में वो भी पलटा और अपने काम में लग गया पर उसके दिमाग में बहू की छवि अब भी घूम रही थी सीधी साधी सी लगने वाली बहू रानी अभी भी उसके जेहन पर राज कर रही थी कितनी सुंदर सी सलवार कमीज पहेने हुए थी और उसपर कितना जम रहा था
उसका चेहरा कितना चमक रहा था कितनी सुंदर लगती थी वो पर वो अचानक किचेन में क्यों आई थी रामू का दिमाग ठनका हाँ… यार क्यों आई थी वो तो कमरे में थी और अगर पानी ही पीना था तो उनके कमरे में भी पानी था तो वो यहां क्यों आई थी कही सिर्फ़ उसे देखने के लिए तो नहीं या फिर कल के बारे में कुछ कह रही हो या फिर उसे फिर से बुला रही हो अरे यार उसने पूछा क्यों नहीं कि और कुछ चाहिए क्या क्या बेवकूफ है वो धत्त तेरी की अच्छा मौका था निकल गया अब क्या करे अभी भी शाम होने को देर थी क्या वो बहू को जा करके पूछे अरे नहीं कही बहू ने शिकायत कर दी तो


वो अपने दिमाग को एक झटका देकर फिर से अपने काम में जुट गया था पर ना चाहते हुए भी उसकी नजर सीडियो की ओर चली ही जाती थी

और उधर आरती ने जब पलटकर देखा था तो वो बस इतना जानना चाहती थी कि रामु क्या कर रहा था पर उसे अपनी ओर देखते हुए पाकर वो घबरा गई थी और जल्दी से अपने कमरे में भाग गई थी और जाकर अपने कमरे की कुण्डी लगाकर बिस्तर पर बैठ गई थी पूरे घर में बिल्कुल शांति थी पर उसके मन में एक उथल पुथल मची हुई थी उसने अपनी चुन्नि को उतार फेका और चित्त होकर लेट गई वो सीलिंग की ओर देखते हुए बिस्तर पर लेटी थी उसकी आखों में नींद नहीं थी उसका दिल जोरो से धड़क रहा था उसके शरीर में एक अजीब सी कसक सी उठ रही थी वो ना चाहते हुए भी अपने आपको अपने में समेटने की कोशिश में लगी हुई थी वो एक तरफ घूमकर अपने को ही अपनी बाहों में भरने की कोशिश कर रही थी

पर नहीं वो यह नहीं कर पा रही थी उसे रामू काका की नज़रें याद आ रही थी उसके पानी देते समय जो उंगलियां उससे टकराई थी वो उसे याद करके सनसना गई थी वो एक झटके से उठी और बेड पर ही बैठे बैठे अपने को मिरर में देखने लगी बिल्कुल भी सामान्य नहीं लग रही थी वो मिरर में पता नहीं क्या पर कुछ चाहिए था क्या पता नहीं हाँ… शायद रामू हाँ… उसे रामू काका के हाथ अपने पूरे शरीर में चाहिए थे उसने बैठे बैठे ही अपनी सलवार को खोलकर खींचकर उतार दिया और अपनी गोरी गोरी टांगों को और जाँघो को खुद ही सहलाने लगी थी जो अच्छी शेप लिए हुए थे उसके टाँगें पतली और सिडौल सी गोरी गोरी और कोमल सी उसकी टांगों को वो सहलाते हुए उनपर रामू काका के सख़्त हाथों की कल्पना कर रही थी उसकी सांसें अब बहुत तेज चलने लगी थी।
उसके हाथ अपने आप ही उसके कुर्ते के अंदर उसकी गोलाईयो की ओर बढ़ चले थे जैसे की वो खुद को ही टटोल कर देखना चाहती थी कि क्या वो वाकई इतनी सुंदर है या फिर ऐसे ही हाँ वो बहुत सुंदर है जब उसके हाथ उसके कुर्ते के अंदर उसकी गोलाईयों पर पहुँचे तो खुद को रोक नहीं पाई और खुद ही उन्हें थोड़ा सा दबाकरदेखा उसके मुख से एक आआह्ह निकली कितना सुख है पर अपने हाथों की बजाए और किसी के हाथों से उसे मजा दोगुना हो जाएगा । रवि भी तो कितना खेलता है इन दोनों से पर अपने हाथों के स्पर्श का वो आनंद उसे नहीं मिल पा रहा था उसने अपने कुर्ते को भी उतार दिया और खड़े होकर अपने को मिरर में देखने लगी थी।
Reply
08-27-2019, 01:24 PM,
#14
RE: Kamvasna आजाद पंछी जम के चूस.
सिर्फ़ ब्रा और पैंटी में वो कितनी खूबसूरत लग रही थी लंबी-लंबी टाँगों से लेकर जाँघो तक बिल्कुल सफेद और चिकनी थी वो कमर के चारो ओर पैंटी फँसी हुई थी जो की उसकी जाँघो के बीच से होकर पीछे कही चली गई थी

बिल्कुल सपाट पेट और उसपर गहरी सी नाभि और उसके ऊपर उसके ब्रा में क़ैद दो ठग हाँ… रवि उनको ठग ही कहता था मस्त उभार लिए हुए थे आरती अपने शरीर को मिरर में देखते हुए कही खो गई थी और अपने हाथों को अपने पूरे शरीर पर चला रही थी और अपने अंदर सोई हुई ज्वाला को और भी भड़का रही थी वो नहीं जानती थी कि आगे क्या होगा पर उसे ऐसा अच्छा लग रहा था आज पहली बार आरती अपने जीवन काल में अपने को इस तरह से देखते हुए खेल रही थी
वो अपने आपसे खेलते हुए पता क्यों अपनी ब्रा और पैंटी को भी धीरे से उतार कर एक तरफ बड़े ही स्टाइल से फेक दिया और बिल्कुल नग्न अवस्था, में खड़ी हुई अपने आपको मिरर में देखती रही उसने आपने आपको बहुत बार देखा था पर आज वो अपने आपको कुछ अजीब ही तरह से देख रही थी उसके हाथ उसे पूरे शरीर पर घूमते हुए उसे एक अजीब सा एहसास दे रहे थे उसके अंदर एक ज्वाला सा भड़क रही थी जो कि अब उसके बर्दास्त के बाहर होती जा रही थी उसकी उंगलियां धीरे-धीरे अपने निपल्स के ऊपर घुमाती हुई आरती अपने पेट की ओर जा रही थी और अपने नाभि को भी अंदर तक छू के देखती जा रही थी दूसरे हाथों की उंगलियां अब उसकी जाँघो के बीच में लेने की कोशिश में थी वो उसके मुख से एक हल्की सी सिसकारी पूरे कमरे में फेल गई और वो अपने सिर को उचका करके नाक से और मुख से सांसें छोड़ने लगी उसकी जाँघो के बीच में अब आग लग गई थी वो उसके लिए कुछ भी कर सकती थी हाँ… कुछ भी वो एकदम से नींद से जागी और फिर से अपने आपको मिरर में देखते हुए अपने आपको वारड्रोब के पास ले गई और एक सफेद पेटीकोट और ब्लाउस निकाल कर पहनने लगी बिना ब्रा के ब्लाउस पहनने में उसे थोड़ा सा दिक्कत हुई पर, ठीक है वो तैयार थी अपने बालों को एक झटका देकर वो अपने को एक बड़े ही मादक पोज में मिरर की ओर देखा और लड़खड़ाती हुई सीढ़ियों तक पहुँची और किचेन का दरवाजा देखा और हल्के स्वर में आवाज लगाई और एक दम से पीछे हट गई
किचेन में हल्की आवाज आते ही रामू उठा और बाहर देखा।

आरति ने तुरंत खुद को छिपा लीया, और खंबे के पीछे खुद को रखकर तेज-तेज सांसें लेने लगी

उसके अंतर मन में एक ग्लानि सी उठ रही थी ना चाहते हुए भी उसने आवाज दी और बिस्तर पर बैठे बैठे सोचने लगी क्या कर रही है वो एक इतने बड़े घर की बहू को क्या यह सोभा देता है अपने घर के नौकरके साथ और वो भी इसी घर में क्या वो पागल हो गई है नहीं उसे यह सब नहीं करना चाहिए वो सोचते हुए बिस्तर पर लूड़क गई और अपने दोनों हाथों से अपने को समेटे हुए वैसे ही पड़ी रही उसका पूरा शरीर जिस आग में जल रहा था उसके लिए उसके पास कोई भी तरीका नहीं था बुझाने को पर क्या कर सकती थी वो जो वो करना चाहती थी वो गलत था पर पर हाँ… नहा लेती हूँ सोचकर वो एक झटके से उठी और तौलिया हाथ में लिए बाथरूम की ओर चल दी उसका पूरा शरीर थर थर काप
रहा था और शरीर से पसीना भी निकल रहा था वो कुछ धीरे कदमो से बाथरूम की ओर जा ही रही थी कि दरवाजे पर एक हल्की सी क्नॉच से वो चौंक गई

वो जहां थी वही खड़ी हो गई और ध्यान से सुनने की कोशिस करने लगी नहीं कोई आहट नहीं हुई थी शायद उसके मन का भ्रम था कोई नहीं है दरवाजे पर जया, नही जया तो नीचे बाहर कपड़े धो रही होंगी और कौन हो सकता है रामू काका, अरे नहीं वो इतनी हिम्मत नहीं कर सकता वो क्यों आएगा

और उधर रामू काका ने आवाज सुनी थी खड़ा का खड़ा रह गया था सोचता हुआ कि क्या हुआ बहू को कही कोई चीज तो नहीं चाहिए शायद भूल गई हो नीचे या फिर कोई काम था उससे या कुछ और वो धीरे से किचेन से निकला और ऊपर सीडियो की ओर देखता रहा पर कही कोई आवाज ना देखकर वो बड़ी ही हिम्मत करके ऊपर की ओर चला और बहू के कमरे की ओर आते आते पशीना पशीना हो गया बड़ी ही हिम्मत की थी उसने आज दरवाजे पर आकर वो चुपचाप खड़ा हुआ अंदर की आवाज को सुनने की कोशिश करने लगा था एक हल्की सी आहट हुई तो वो कुछ सोचकर हल्के से दरवाजे पर एक कान करके खड़ा हो गया और इंतजार करने लगा था पर कोई आहट नहीं हुई तो यह सोचते हुए नीचे की ओर चल दिया की शायद बहू सो गई होगी


अंदर आरति का पूरा ध्यान दरवाजे पर ही था नारी मन की जिग्याशा ही कहिए वो अपने को उस नोक का कारण जानने की कोशिश में दरवाजे की ओर चली और कान लगाकर सुनने की कोशिश करने लगी कि कही कोई आहट या फिर कोई चहल पहल की आवाज हो रही है कि नहीं पर कोई आवाज ना देखकर वो दरवाजे की कुण्डी खोलकर बाहर की ओर देखती है पर कोई नहीं था वहाँ कुछ भी नहीं था तो वो बाहर आ गई थी बाहर भी कोई नहीं था लेकिन आचनक ही उसकी नजर सामने सीढ़ियो पर पड़ी तो वहां रामू खड़ा था जो कि अब उसी की ओर देख रहा था आरति ने अब भी सफेद ब्लाउस और पेटीकोट ही पहना हुआ था और हाथ में तौलिया था वो रामू काका को सीढ़ियो में देख कर सबकुछ भूल गई थी उसे अपने आपको ढकने की बात तो दूर वो फिर से अपने को उस आग की गिरफ़्त में पाती जा रही थी जिस आग से वो अब तक निकलने की कोशिश कर रही थी


उसकी सांसों में अचानक ही तेजी आ गई थी और वो उसकी धमनिओ से टकरा रही थी रामु सीढ़ियो में खड़ा-खड़ा बहू के इस रूप को देख रहा था बहू तो कल जैसे ही स्थिति में है ती क्या वो आज भी मालिश के बहाने उसे बुला रही थी हाँ शायद पर अब क्या करे वो हिम्मत करके सीढ़ियो में ही घुमा और बहू की ओर कदम बढ़ाया अपने सामने इस तरह से खड़ी कोई स्वप्न सुंदरी को कैसेछोड़ कर जा सकता था वो उसका दीवाना था वो तो उस रूप का पुजारी था उस रूप को उसकाया को वो भोग चुका था उसकी मादकता और नाजूक्ता का अनुमान था उसे उसके लिए वो तो कब से लालायित था और वो उसके सामने इस तरह से खड़ी थी । रामू अपने आपको रोक ना पाया और बड़े ही सधे हुए कदमो से बहू की ओर बढ़ने लगा



और आरती ने जब रामु काका को अपनी ओर बढ़ते हुए देखा तो जैसे वो जमीन में गढ़ गई थी उसकी सांसें जो कि अब तक उसकी धमनियों से ही टकरा रही थी अब उसके मुँह से बाहर आने को थी हर सांस के साथ उसके मुख से एक हल्की सी सिसकारी भी निकलने लगी थी उसके शरीर के हर एक रोएँ में सेक्स की एक लहर दौड़ गई थी उसे रामु काका के हाथ और उनके शरीर के बालों का गुच्छे याद आने लगे थे कल जब रामु काका ने उसे अपनी बाहों में लेकर रोंधा था वो एक-एक वाकया उसे याद आने लगा था वो खड़ी-खड़ी काँपने लगी थी उसका शरीर ने एक के बाद एक झटके लेना शुरू कर दिया था वो खड़े-खड़े लड़खड़ा गई थी और दीवाल का सहारा लेने को मजबूर हो गई थी उसकी और रामु काका की आखें एक दूसरे की ओर ही थी एक बार के लिए भी नहीं हटी थी अब आरती पीछे दीवार के सहारे खड़ी थी कंधा भर टिका था दीवाल से और पूरा शरीर पाँव के सहारे खड़ा था सांसों की तेजी के साथ आरती की चूचियां अब ज्यादा ही ऊपर की ओर उठ जा रही थी वो नाक और मुख से सांस लेते हुए रामू काका को अपने करीब आते देख रही थी रामू करीब और करीब आते हुए उसके बहुत नजदीक खड़ा हो गया अब रामु की नजर बहू के शरीर का अवलोकन कर रही थी वही शरीर जिसे कल उसने भोगा था और बहुत ही अच्छे तरीके से भोगा था जैसा मन किया था वैसे ही आज फिर वो उसके सामने खड़ी थी कल जैसे ही परिस्थिटी में और, खुल्ला आमंत्रण था रामु को वो सिर से पैर तक बहू को निहारता रहा और

रामु की नजर एक बार फिर से बहू के चेहरे पर पड़ी और उनको देखते हुए उसने अपने हाथों को बहू की ओर बढ़ाया धीरे से उसने बहू के पेट को छुआ

आरती- आआआआआआअह्ह उूुुुुुुुुउउम्म्म्मममममममममम
रामु के हाथों में जैसे मखमल आ गया हो नाजुक नाजुक और नरम नरम सा बहू का पेट उसकी सांसों के साथ अंदर-बाहर और ऊपर नीचे होते हुए वो अपने हाथों को एक जगह नहीं रख पाया वो अपने दूसरे हाथ को भी लाकर बहू के पेट पर रख दिया और अपने दोनों हाथों से उसको सहलाने लगा बल्कि कहिए उनका नाप लेने लगा वो अपने हाथों से बहू के पेट का आकार नाप रहा था और उस ऊपर वाले की रचना को महसूस कर रहा था वो अपनी आखें गढ़ाए बहू के पेट को ऊपर से देख भी रहा था और अपने हाथों से उस रचना की तारीफ भी कर रहा था उसकी आखों के सामने बहू की दोनों चूचियां अपनी जगह से आजाद होने की कोशिश कर रही थी वो अपने हाथों को धीरे से बहू के ब्लाउसकी ओर ले जाने लगा कि आचनक ही बहू लड़खड़ाई और रामु की सख़्त बाहों ने बहू को संभाल लिया अब बहू भीमा की ग्रफ्त में थी और बेसूध थी उसकी आखें बंद सी थी नथुने फूल रहे थे मुख से सिसकारी निकल रही थी उसका पूरा शरीर अब रामू के हाथों में था उसके भरोसे में था वो चाहे तो वही पटक कर बहू को भोग सकता था या फिर उठाकर अपने कमरे में ले जा सकता था या फिर अंदर उसी के कमरे में कल जैसे बिल्कुल नंगा करके उसके सारे शरीर को जो चाहे वो कर सकता था उसकी आखें बहू की चेहरे पर थी वो अपना सबकुछ रामु के हाथों में सौंप कर लंबी-लंबी सांसें लेते हुई उसकी बाहों ले लटकी हुई थी। रामु उस अप्सरा को अपने बाहों में संभाले हुए अपने एक हाथों से उसकी पीठ को सहारा दिया और दूसरे हाथ से उसके पैरों के नीचे से हाथ डालकर एक झटके से उसे उठाकर उसी के बेडरूम में घुस गया वो कमरे में आते ही अपने हाथों की उस सुंदर और कामुक काया को कहाँ रखे सोचने लगा उसके हाथों में आरती एक बेसूध सी जान लग रही थी एक रति के रूप में वो लगभग बेहोशी की मुद्रा में थी उसे सब पता था कि
क्या चल रहा था पर उसके हाथों से अब बात निकल चुकी थी वो अब रामू को भेट चढ़ चुकी थी या कहिए वो अपने को रामु के सुपुर्द कर चुकी थी अब वो इस खेल का हिस्सा बनने को तैयार थी । अब वो उसे दैत्यकाय के हर उस पुरुषार्थ को सहने को तैयार थी जो कि उसे चाहिए था जो कि उसे रवि से नहीं मिला था या फिर उसे नहीं पता था इतनी दिनों तक वो अब अपने आपको किसी भी स्थिति में रोकना नहीं चाहती थी रामु के गोद में वो ऐसी लग रही थी कि कोई बनमानुष उसे उठाकर अपने हवस का शिकार करने जा रहा हो वो तैयार थी उस बनमानुष को झेलने को उसे राक्षस को अपने अंदर समा लेने को वो चुपचाप उस राक्षस का साथ दे रही थी उसके हर कदम को देख भी रही थी और समझ भी रही थी जैसे कह रही हो करो और करो जो मन में आए करो पर मेरे तन की आग को ठंडा करो प्लीज

रामु अपने हाथों में बहू को उठाए कमरे में दाखिल हुआ और सोचने लगा की अब क्या करे पर वो खुद ही बिना किसी इजाज़त के बहू को उसके बिस्तर तक ले गया और धीरे से हाँ बहुत ही धीरे से बहू को उसके बिस्तर पर लिटा दिया बहू अब सिर और नितंबों और पैरों के तले को रखकर बिस्तर पर लेटी हुई थी। आरती को जैसे ही रामु ने बिस्तर पर रखा वो एक जल बिन मछली की तरह से तड़प उठी उसके हाथ पाँव और सिर बिस्तर पर अपने आपसे इधर उधर होने लगे थे वो अपने को रामु के शरीर से अलग नहीं करना चाहती थी वो जब रामु उसे अपने गोद में भरकर लाया था तो उसके नथुनो में रामु के पसीने की खुशबू को सूंघ कर ही बेसूध हो गई थी कितनी मर्दानी खुशबू थी कितनी मादक थी यह खुशबूओ काम अग्नि में जलती हुई आरती का पूरा शरीर अब रामु के रहमो करम पर था वो चाहती थी कि रामु कल जैसे उससे निचोड़ कर रख दे उसके शरीर में उठ रही हर एक लहर को अपने हाथों से रोक दे, वो अपने आपको अकेला सा पा रही थी बिस्तर पर और रामु पास खड़े हुए बहू की इस स्थिति को अपने आखों से देख रहा था बहू के ब्लाउसमें फँसे हुए उसके गोल गोल बड़े-बड़े चुचो को वो वही खड़े-खड़े निहार रहा था उसके ऊपर-नीचे होते हुए आकर को बढ़ते घटते देख रहा था उसके पेट को अंदर-बाहर होते देख रहा था जाँघो में फाँसी हुई पेटीकोट को उसकी टांगों के साथ ऊपर-नीचे होते हुए देख रहा था उसकी आखें बहू के हर हिस्से को देख रही थी और उसकी सुंदरता को अपने अंदर उतारने की कोशिश कर रही थी वो खड़े-खड़े देख ही रहा था कि उसके हाथों से बहू की नाजुक हथेली टकराई वो उसकी मजबूत हथेली को अपनी हथेली में लेने की कोशिश कर रही थी वो अपनी हथेली को रामु की हथेली पर कस कर पकड़ बनाने की कोशिश कर रही थी और अपने पास खींच रही थी उसके हाथ रामु को अपने पास और पास आने का न्यौता दे रहे थे। रामु भी अब कहाँ रुकने वाला था वो भी बहू के हाथों के साथ अपने आपको आगे बढ़ाया और बहू के हाथों का अनुसरण करने लगा बहू अपने हाथों को रामु के हाथों के सहारे अपने चूची तक लाने में सफल हो गई थी उसके चूचियां और भी तेज गति से ऊपर की ओर हो गये।
आरती के मुख से एक आआअह्ह निकली और वो रामू के हाथों को अपने चूची के ऊपर घुमाने लगी थी रामू को तो मन की मुराद ही मिल गई थी जो खड़े-खड़े देख रहा था अब उसके हाथों में था वो और नहीं रुक पाया वो अपने अंदर के शैतान को और नहीं रोक पाया था वो अपने दोनों हाथों से बहू की दोनों चूचियां को कस कर पकड़ लिया और ब्लाउज के ऊपर से ही दबाने लगा । आरती का पूरा शरीर धनुष की तरह से अकड गया था वो अपने सिर के और कमर के बल ऊपर को उठ गई थी
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08-27-2019, 01:25 PM,
#15
RE: Kamvasna आजाद पंछी जम के चूस.
आरती- उूुुुुउउम्म्म्मममम आआआआआआआअह्ह
और रामू के होंठ उसकी आवाज को दबाने को तैयार थे उसके होंठों ने आरती के होंठों को सील दिया और अब खेल शुरू हो गया दोनों एक दूसरे से बिना किसी ओपचारिकता से गुथ गये थे रामु कब बिस्तर पर उसके ऊपर गिर गया पता ही नहीं चला वो आरती को अपने बाहों में जकड़े हुए निचोड़ता जा रहा था और उसकी दोनों चुचियों को अपने हाथों से दबाते जा रहा था आरती जो कि नीचे से रामु को पूरा समर्थन दे रही थी अब अपनी जाँघो को खोलकर रामु को अपने बीच में लेने को आतुर थी वो सेक्स के खेल में अब देरी नहीं करना चाहती थी उसकी जाँघो के बीच में जो हलचल मची हुई थी वो अब उसकी जान की दुश्मन बन गई थी वो अब किसी तरह से रामु को जल्दी से जल्दी अपने अंदर समा लेना चाहती थी पर वो तो अब तक धोती में था और ऊपर भी कुछ पहने हुए था अब तो आरती भूखी शेरनी बन गई थी वो नहीं चाहती थी कि अब देर हो रामु को अपने ऊपर से पकड़े ही उसने हिम्मत करके एक हाथ से उसकी धोती को खींचना चालू किया और अपने को उसके साथ ही अड्जस्ट करना चालू किया रामु जो कि उसके ऊपर था बहू के इशारे को समझ गया था और आश्चर्य भी हो रहा था कि बहू आज इतनी उतावली क्यों है पर उसे क्या वो तो आज बहू को जैसे चाहे वैसे भोग सकता था यही उसके लिए वरदान था वो थोड़ा सा ऊपर उठा और अपनी धोती और अंदर अंडरवेअर को एक झटके से निकाल दिया और वापस बहू पर झुक चुका क्या झुका लिया गया नीचे पड़ी आरती को कहाँ सब्र था वो खुद ही अपने हाथों से रामु को पकड़कर अपने होंठों से मिलाकर अपनी जाँघो को खोलकर रामू को अड्जस्ट करने लगी थी रामु का लण्ड उसकी चुत के आस-पास टकरा रहा था बहुत ही गरम था और बहुत ही बड़ा पर उससे क्या वो तो कल भी इससे खेल चुकी थी उसको उस चीज का मजा आज भी याद था वो और ज्यादा सह ना पाई
आरती- आआआआआआह्ह उूुउउंम्म काका प्लीज़ करो ना प्लीज
और रामु काका के कानों में एक मादक सी घुल जाने वाली आवाज़ ने कहा तो रामु के अंदर तक आग सी दौड़ गई और रामु का लण्ड एक झटके से अंदर हो गया और

आरति- ईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईई उूुुुुुुुउउम्म्म्मममममममम आवाज रामु काका के गले में कहीं गुम हो गई
रामू का लण्ड बहू के अंदर जाते ही जैसे कमरे में तूफान सा आ गया था बिस्तर पर एक द्वंद युद्ध चल गया था दोनों एक दूसरे में समा जाने की कोशिस में लगे थे और एक दूसरे के हर अंग को छूने की कोशिश में लगे हुए थे आरति तो जैसे पागल हो गई थी कल की बातें याद करके आज वो खुलकर रामु के साथ इस खेल में हिस्सा ले रही थी वो अपने आपको खुद ही रामु काका के हाथों को अपने शरीर में हर हिस्से को छूने के लिए उकसा रही थी वो अपने होंठों को रामु के गालों से लेकर जीब तक को अपने होंठों से चूस-चूसकर चख रही थी और रामु तो जैसे अपने नीचे बहू की सुंदर काया को पाकर समझ ही नहीं पा रहा था वो अपने हाथों को और अपने होंठों को बहू के हर हिस्से में घुमा-घुमाकर चूम भी रहा था और चाट चाट कर उस कमसिन सी नारी का स्वाद भी ले रहा था और अपने अंदर के शैतान को और भी भड़का रहा था

वो किसी वन मानुष की तरह से बहू को अपने नीचे रोंध रहा था और उसे अपनी बाहों में भरकर निचोड़ता जा रहा था उसके धक्कों में कोई कमी नहीं आई थी बल्कि तेजी ही आई थी और हर धक्के में वो बहू को अपनी बाहों में और जोर से जकड़ लेता था, ताकि वो हिल भी ना पाए और उसके नीचे निस्चल सी पड़ी रहे और आरती की जो हालत थी उसकी वो कल्पना भी नहीं कर पा रही थी रामु के हर धक्के पर वो अपने पड़ाव की ओर बढ़ती जा रही थी और हर धक्के की चोट पर रामु काका की गिरफ़्त में अपने आपको और भी कसा हुआ महसूस करती थी उसकी जान तो बस अब निकल ही जाएगी सोचते हुए वो अपने मुकाम की ओर बढ़ चली थी और वो रामु काका के जोर दार झटको को और नहीं सह पाई और वो झड़ गई थी झरना इसको कहते है उसे पता ही नही चला लगा कि उसकी चुत से एक लंबी धार बाहर की ओर निकलने लगी थी जो कि रुकने का नाम भी नहीं ले रही थी और रामू तो जैसे पागलों की तरह अपने आपसे गुम बहू को अपनी बाहों में भरे हुए अपनी पकड़ को और भी मजबूत करते हुए लगा तार जोरदार धक्के लगाता जा रहा था वो भी अपनी पीक पर पहुँचने वाला था पर अपने नीचे पड़ी बहू को ठंडा होते देख कर वो और भी सचेत हो गया और बिना किसी रहम के अपनी गति को और भी बढ़ा दिया और अपने होंठों को बहू के होंठों के अंदर डाल कर उसकी जीब को अपने होंठों में दबाकर जोर्र दार धक्के लगाने लगा था। आरती जो कि झड कर शांत हो गई थी रामु काका के निरंतर धक्कों से फिर जाग गई थी और हर धक्के का मजा लेते हुए फिर से अपने चरम सीमा को पार करने की कोशिश करने लगी थी उसके जीवन काल में यह पहली बार था कि वो एक के बाद दूसरी बार झड़ने को हो रही थी रामु काका की हर एक चोट पर वो अपनी नाक से सांस लेने को होती थी और नीचे से अपनी कमर और योनि को उठाकर रामू को और अंदर और अंदर तक उतर जाने का रास्ता भी देती जा रही थी उसके हर एक कदम ने उसका साथ दिया और रामु का ढेर सारा वीर्य जब उसकी योनि पर टकराया तो वो एक बार फिर से पहली बार से ज्यादा तेजी से झड़ी थी उसका शरीर एकदम से सुन्न हो गया था पर रामु कका की पकड़ अब भी उसके शरीर पर मजबूती से कसा हुआ था वो हिल भी नहीं पा रही थी और नाही ठीक से सांस ही ले पा रही थी हाँ अब दोनों धीरे-धीरे शांत हो चले थे । रामू भी अब बहू के होंठो को छोड़ कर उसके कंधे पर अपने सिर को रखकर लंबी-लंबी सांसें ले रहा था और अपने को सयम करने की कोशिश कर रहा था उसकी पकड़ अब बहू पर से ढीली पड़ती जा रही थी और उसके कानों में आरति की सिसकारियां और जल्दी-जल्दी सांस लेने की आवाज भी आ रही थी जैसे वो सपने में कुछ सुनाई दे रही थी रामु अपने आपको संभालने में लगा था और अपने नीचे पड़ी हुई बहू की ओर भी देख रहा था उसके बाल उसके नीचे थे बहू का चेहरा उस तरफ था और वो तेज-तेज सांसें ले रही थी बीच बीच में खांस भी लेती थी उसकी चूचियां अब आज़ादी से उसके सीने से दबी हुई थी। रामु की जाँघो से बहू की जांघे अब भी सटी हुई थी उसका लण्ड अब भी बहू के अंदर ही था वो थोड़ा सा दम लगाकर उठने की चेष्टा करने लगा और अपने लण्ड को बहू के अंदर से निकालता हुआ बहू के ऊपर ज़ोर ना देता हुआ उठ खड़ा हुआ या कहिए वही बिस्तर पर बैठ गया बहू अब भी निश्चल सी बिस्तर पर अपने बालों से अपना चेहरा ढके हुए पड़ी हुई थी रामु ने भी उसे डिस्टर्ब ना करते हुए अपनी धोती और अंडरवेर उठाया और उस सुंदर काया के दर्शन करते हुए अपने कपड़े पहनने लगा



उसके मन की इच्छा अब भी पूरी नहीं हुई थी उस अप्सरा को वैसे ही छोड़ कर वो नहीं जाना चाहता था वो एक बार वही खड़े हुए बहू को एक टक देखता रहा और उसके साथ गुजरे हुए पल को याद करता रहा बहू की कमर के चारो ओर उसका पेटीकोट अब भी बिखरा हुआ था पर ब्लाउस के सारे बटन खुले हुए थे और उसके कंधों के ही सहारे थे उसकी चूचियां अब बहुत ही धीरे-धीरे ऊपर और नीचे हो रही थी नाभि तक उसका पेट बिल्कुल बिस्तर से लगा हुआ था जाँघो के बीच काले बाल जो कि उस हसीना के अंदर जाने के द्वार के पहरेदार थे पेट के नीचे दिख रहे थे और लंबी-लंबी पतली सी जाँघो के बाद टांगों पर खतम हो जाती थी


रामु की नजर एक बार फिर बहू पर पड़ी और वो वापस जाने को पलटा पर कुछ सोचकर वापस बिस्तर तक आया और बिस्तर के पास झुक कर बैठ गया और बहू के चेहरे से बालों को हटाकर बिना किसी डर के अपने होंठों को बहू के होंठों से जोड़ कर उसका मधु का पान करने लगा वो बहुत देर तक बहू के ऊपर फिर नीचे के होंठों को अपने मुख में लिए चूसता रहा और फिर एक लंबी सी सांस छोड़ कर उठा और नीचे रखी एक कंबल से आरती को ढँक कर वापस दरवाजे से बाहर निकल गया।
उसने लेटे हुए उसने रामु को अच्छे से देखा था उतना अच्छे से तो उसने अपने पति को भी नहीं देखा था पर ना जाने क्यों उसे रामू काका को इस तरह से छुप कर देखना बहुत अच्छा लग रहा था और जब वो जाते जाते रुक गये थे और पलटकर आके उसके होंठों को चूमा था तो उसका मन भी उनको चूमने का हुआ था पर शरम और डर के मारे वो चुपचाप लेटी रही थी उसे बहुत मजा आया था

उसके पति ने भी कभी झड़ने के बाद उसे इस तरह से किस नहीं किया था या फिर ढँक कर सुलाने की कोशिश नहीं की थी वो लेटी लेटी अपने आपसे ही बातें करती हुई सो गई और एक सुखद कल की ओर चल दी उससे पता था कि अब वो रामु काका को कभी भी रोक नहीं पाएगी और वो यह भी जानती थी कि जो उसकी जिंदगी में खाली पन था अब उसे भरने के लिए रामू काका काफी है वो अब हर तरीके से अपने शरीर का सुख रामू काका से हासिल कर सकती है
और किसी को पता भी नहीं चलेगा और वो एक लंबी सी सुखद नींद के आगोस में समा गई

दोपहर बाद 3 बजे दरवाजे पर नोक के साथ ही उसकी नींद खुली और उसने झट से आवाज दी
आरती- हाँ…

- जी वो सोनल आने वाली है, आप भी चाय के लिए नीचे आएंगी क्या।

आरती - हाँ…
लेकिन आचनक ही उसके दिमाग की घंटी बज गई अरे यह तो रामू काका थे पर क्यों अभी तो जया भी आ सकती थी

तभी उसका ध्यान अपने आप पर गया अरे वो तो पूरी तरह से नंगी थी उसके जेहन में सुबह की बातें घूमने लगी थी वो वैसे ही बिस्तर पर बैठी अपने बारे में सोचने लगी थी वो जानती थी कि आज उसने क्या किया था सेक्स की भूख खतम होते ही उसे अपनी इज़्ज़त का ख्याल आ गया था वो फिर से चिंतित हो गई और कंधे पर पड़े अपने ब्लाउज को ठीक करने लगी और धीरे से उठ कर बाथरूम की ओर चल दी

बाथरूम में जाने के बाद उसने आपने आपको ठीक से साफ किया और फिर से कमरे में आ गई थी वारड्रोब से सूट निकालकर वो जल्दी से तैयार होने लगी थी पर ध्यान उसका पूरे समय मिरर पर था उसका चेहरा दमक रहा था जैसे कोई चिंता या कोई जीवन की समस्या ही नहीं हो उसके दिमाग पर हाँ… आज तक उसका चेहरा इतना नहीं चमका था उसने मिरर के पास आके और गौर से देखा उसकी आखों में एक अजीब सा नशा था और उसके होंठों पर एक अजीब सी खुशी उसका सारा बदन बिल्कुल हल्का लग रहा था

दोपहर के सेक्स के खेल के बाद वो कुछ ज्यादा ही चमक गया था वो सोचते ही उसके शरीर में एक लहर सी दौड़ गई और उसके निपल्स फिर से टाइट होने लगे थे उसने अपने हाथों से अपनी चुचियों को एक बार सहलाकर छोड़ दिया और वो अपने दिमाग से इस घटना को निकाल देना चाहती थी वो जल्दी से तैयार होकर नीचे की ओर चली सीडियो के कोने से ही उसने देख लिया था कि सोनल अपने कमरे से अभी स्कूल ड्रेस चेंज करके निकली है अच्छा हुआ रामू ने जगा दिया था नहीं तो वो तो सोती ही रह जाती

वो जल्दी से सोनल के पास पहुँच गई और दोनों की चाय सर्व करने लगी वो शांत थी
सोनल - मम्मी आज जाओगी कार चलानी सीखने।

आरती- हां।

सोनल - अरे मनोज अंकल के साथ नहीं जाना गाड़ी चलाने

आरती- अरे हाँ… बस चाय पीकर तैयार होती हूँ।
सोनल-- ठीक है मम्मी मैं भी जा रही हु ट्यूशन।
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08-27-2019, 01:25 PM,
#16
RE: Kamvasna आजाद पंछी जम के चूस.
सोनल बारहवीं कक्षा में थी और उसकी परीक्षा आने वाली थी। वो पढ़ाई में ज्यादा तेज़ नहीं थी और परीक्षा बोर्ड की थी। स्कूल का प्रिंसीपल जो मैथ का टीचर भी था। वो उसे बहुत प्यार से बुलाता था और उसके बदन को छूता रहता था। उसके प्यार से बात करने की वजह उसे पता थी क्योंकि पूरी कक्षा में वो सबसे दब्बू और सदारण लड़की थी जो उसकी बातों को किसी से भी नही कह सकती थी।

परीक्षा पास आते देख सोनल ने ट्यूशन उन्हीं के पास रख ली वो मैथ, साइंस और इंगलिश पढा़ते थे। उन्होंने रवि को बोला वो ट्यूशन नहीं पढा़ते लेकिन सोनल को पढ़ाई करवाएंगे और कोशिश करेंगे पहले दर्जे में पास हो और कोई ट्यूशन फीस नहीं।
उनके क्लास की दो ओर लडकिया भी उनसे उनके घर पढ़ने जाती थी और उनकी हरकते जानते हुए भी सोनल ने ट्यूशन उनसे ही पढ़ने का मन बना लिया। क्यो ये तो वो ही जानती थी। एक सामान्य घरेलू लड़की ऐसे टीचर के पास क्यो जाना चाहती थी पढ़ने।

उनका नाम प्रेम गर्ग था लेकिन सोनल उनको सर बुलाती थी। तब उनकी आयु 50 साल की थी। उनका रंग सांवला कद करीब 5 फीट 8 इंच है। चेहरा क्लीन शेव है और सिर के बालों पर काला रंग लगाते हैं। उनकी आंखें काली हैं और नज़र का चश्मा लगा हुआ है। उनके एक बेटा और बेटी हैं दोनों शादीशुदा हैं। बेटी ससुराल में रहती है बेटा दूसरे शहर में नौकरी करता है तो अपनी पत्नी के साथ वहीं रहता है।
प्रेम सर की पत्नी 40 किमी दूर एक बैंक में नौकरी करती थी जो शाम को करीब 6 बजे घर आती थी।

दोपहर को 2 बजे स्कूल में छुट्टी हो जाती थी और सोनल बैग घर में रखकर खाना खा कर 2:30 बजे सर के घर पहुंच जाती थी, तब सर घर में अकेले ही होते थे। सोनल स्कूल की यूनीफॉर्म बदल कर जींस टॉप या जींस शर्ट पहन कर जाती थी जो कि टाईट होते थे। उन कपड़ों में उनके बदन का एक एक उभार (जो भी उसके शरीर पर था) अच्छे से दिखाई देता था।

सर सब सब्जेक्ट एक एक घंटा पढा़ते थे। पढा़ते टाईम उनकी नजर लड़कियों के बूब्ज़ पर होती थी। वो पढ़ाई कम करवाते और अपनी ठर्क ज्यादा पूरी करते थे। जब उनकी पत्नी घर आ जाती तब छुट्टी करते थे।
अब परीक्षा में 3 मंथ बाकी थे और सोनल को डर लग रहा था।

आज सोनल सर के पास पढ़ाई के लिए गई और उसकी क्लासमेट नही आई थी।
सोनल ने सर् से कहा- सर परीक्षा पास आ रही है और मुझे डर लग रहा है कि अगर अच्छे नंबर नहीं आए तो अच्छे कॉलेज़ में दाखिला नहीं मिलेगा।
सर उसकी पीठ सहलाते हुए कहा- डर मत सोनल, मैं हूं न, तेरे कम से कम 80% नंबर आएंगे।
सोनल ने कहा- पर कैसे सर, आप जानते ही हो मैं इतनी होशियार नहीं हूं, 50% नंबर लेना भी मुश्किल लग रहा है।

सर हंस पडे़ और कहा- जितना आता हो उतना लिख देना, बाकी हमारे पास एक घंटा होता है और सुपरअटेंडेंट और सुपरवाईज़र सब मेरी पहचान के हैं, परीक्षा के बाद मैं करवा दिया करू़गा। मैं जो बोलता जाऊंगा तुम लिखती जाना।
सोनल ने कहा- थैंक्स सर, आप मेरे लिए इतना कुछ कर रहे हो, यह एहसान में कभी नहीं चुका पाऊंगी।
सर ने कहा- ये कोई एहसान नहीं है इसके बदले मुझे भी कुछ चाहिए।
सोनल ने कहा- आप बोलो, मैं पापा से बोल कर आपको वो दिलवा दू़ंगी।

सर ने कहा- वो तुम्हारे पापा नहीं तुम दे सकती हो।
सोनल ने कहा- मैं क्या दे सकती हूं?
सर ने कहा- मुझे खुश करना होगा!
सोनल ने कहा- कैसे सर?
सोनल को कुछ समझ नही आ रहा था कि सर क्या चाहते है।

सर ने कहा- जैसा मैं कह वैसा करती जाना मैं खुश हो जाऊँगा, मैं तुम्हे परीक्षा में मदद कर दूँगा। तुमहारी सहेलियां भी ऐसा ही करेगी।
सोनल ने बिना सोचे हां कर दी।
तभी सर ने अपनी पैंट से लंड बाहर निकाल लिया और कहा- देखो सोनल, कैसे खड़ा है।
सोनल ने पहली बार किसी मर्द का लंड देखा था और मैं गौर से देखने लगी, सर का लंड काफी मोटा, लंबा और जानदार था।

सर ने अपने लंड की चमड़ी पीछे खींच ली और बीच से लाल रंग का टोपा निकल आया। सोनल की सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी वो समझ ही नही पाई क्या करे क्या न करे। उसको रोना आ रहा था। घर मे चुलबुली रहने वाली बाहर आते ही डब्बू बन जाती थी जैसे विरोध करना उसके लिए पाप हो सब झेल जाती थी। उसका रोना देख कर सर ने कहा- अभी मेरी पत्नी आने वाली होगी, टाईम कम है। कल को सुबह नौं बजे मेरे घर आ जाना और घर बोल कर आना स्कूल में 3 बजे तक पढ़ाई होगी और फिर सर के पास पढ़ने जाना है. 6 बजे घर आऊंगी।
सोनल ने कुछ नही कहा और अपना बैग उठा कर वहा से निकल आयी। उसको रोना आ रहा था और सोच रही थी कल क्या होगा।
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08-27-2019, 01:25 PM,
#17
RE: Kamvasna आजाद पंछी जम के चूस.
घर आकर सोनल कुछ नही किया और सीधा अपने रूम में घुस गई। वैसे भी उसकी मम्मी आज कार चलाने सीखने गयी है। अकेले कमरे में बैठी वो बस अपने सर के लण्ड को याद कर रही थी, इतनी पास से पहली बार लण्ड देखा था उसने, वो कंफ्यूज थी कि क्या करे,क्या न करे। चाहती तो वो सर को सबक सिखा सकती है। बस एक बार अपने पापा को बताना है, लेकिन वो कुछ नही कर रही है ओर न ही सर के साथ करना
चाहती है। अजीब जद्दोजहद में पड़ी है।
सोचते सोचते पता नहीं कब नींद आ गई सोनल को। शाम के समय सो गई सोते ही सोनल के सपने में सर आके उसकी पैंटी खींच कर अपने लंड को उसके मुंह में डाल दिया और उसकी चूंत चाटने लगे फिर उसके हाथ पकड़ कर दोनों ऊपर बांध दिये और उसका टाप उतार कर ब्रा को फाड़ दिये, अब सर दोनों हाथों से बूब्स दबाने लगे और चूचियों को पकड़ कर अपने मुंह में लेकर चूसने लगे फिर उसकी गान्ड को चूमने लगे और चाटने लगे और बोले सोनल तेरी गांड के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूं।

फिर सीधा करके टांगे फैला कर अपनी जीभ से सोनल की चूंत को चाट चाट कर बिल्कुल पागल कर दिया फिर सर बोलने लगे कि अब मेरा लौड़ा चाटो सोनल और सोनल के मुंह में डाल दिया अपना मस्त लंड,सोनल पूरा लंड चूस चूस कर चाटी अब सर उसके बालों को पकड़ कर बोले सोनल मैं तुम्हें चोदू, सोनल बोली हां सर अपनी स्टुडेंट को चोदो ताकि पागल हो जाऊं, इतना चोदिये कि मैं पागल होके जन्नत का मजा ले लूं। सर बोले ओके सोनल मैं तुम्हें आज छिनाल की तरह चोदूंगा, सोनल ने कहा थैंक यू सर, तभी सर ने सोनल टांगें फैला कर चौड़ी कर दी और अपना लंड उनकी चूत में रख दिया और टांगे ऊपर कर दी और एक झटके में पूरा लौड़ा अन्दर उसकी चूत में डाल दिया।
और एक दम से सोनल की आंख खुल गयी। वो पूरे पसीने से भीगे हुए थी। अभी तक जो लड़की कभी अपनी चुत भी नही छुई हो आज उसे एक दम चुदाई भर सपना आया था। अभी भी उसके सामने सपने की यादें घूम रही थी। उसकी सांसे धौकनी के जैसे चल रही थी।
उधर आरति आज कार चलाने के लिए मनोज अंकल के स्कूल पहुच गयी थी। और अभी कार में मनोज अंकल के साथ कार में थी।
आरती थोड़ी सी ठिठकी पर अपने अंदर उठ रही सनश्य को रोक कर वो गाड़ी के अंदर बैठ गयी, मनोज अंकल भी सामने की सीट पर बैठ गये थे और गाड़ी गेट के बाहर की ओर चल दी गाड़ी सड़क पर चल रही थी और बाहर की आवाजें भी सुनाई दे रही थी पर अंदर एकदम सन्नाटा था शायद सुई भी गिर जाए तो आवाज सुनाई दे जाए। मनोज अंकल गाड़ी चला रहा था पर उसका मन पीछे बैठी हुई आरती को देखने को हो रहा था पर बहुत देर तक वो देख ना सका। पहली बार आरती उसके साथ अकेली आई थी वो सुंदरी जिसने कि उसके मन में आग लगाई थी उस दिन जब वो पार्टी में गई थी और आज तो पता नहीं कैसे आई है । (मनोज ने पार्टी में आरति का सेक्सी रूप देखा था।)
एक बड़ा सा लबादा पहने हुए सिर्फ़ साड़ी क्यों नहीं पहने हुए है आरती। मनोज ने थोड़ी ही हिम्मत करके रियर व्यू में देखने की हिम्मत जुटा ही ली देखा की आरती पीछे बैठी हुई बाहर की ओर देख रही थी गाड़ी सड़क पर से तेजी से जा रही थी । मनोज को मालूम था कि कहाँ जाना है , रवि ने कहा था कि ग्राउंड में ले जाना वहां ठीक रहेगा थोड़ी दूर था पर थी बहुत ही अच्छी जगह दिन में तो बहुत चहल पहेल होती थी वहां पर अंधेरा होते ही सबकुछ शांत हो जाता था पर उसे क्या वो तो इस घर का पुराना जानकार था और बहुत भरोसा था रवि को उसपर वो सोच भी नहीं सकता था कि आरती ने उस सोए हुए मनोज के अंदर एक मर्द को जनम दे दिया था जो कि अब तक एक लकड़ी के तख्त की तरह हमेशा खड़ा रहता था अब एक पेड़ की तरह हिलने लगा था उसके अंदर का मर्द कब और कहाँ खो गया था इतने सालो में उसे भी पता नहीं चला था वो बस जी सर् और जी मैडम के सिवा कुछ भी नहीं कह पाया था इतने दिनों में



पर उस दिन की घटना के बाद वो एक अलग सा बन गया था,जब पार्टी में आरती का मनमोहिनी रूप देखा था, जब भी वो खाली समय में बैठता था तो आरती का चेहरा उसके सामने आ जाता था उसके चेहरे का भोलापन और शरारती आखें वो चाह कर भी उसकी वो मुश्कान को आज तक नहीं भूल पाया था वो बार-बार पीछे की ओर देख ही लेता था पर नजर बचा के

और पीछे बैठी आरती का तो पूरा ध्यान ही मनोज अंकल पर था वो दिखा जरूर रही थी कि वो बाहर या फिर उसका ध्यान कही और था पर जैसे ही मनोज अंकल की नजर उठने को होती वो बाहर की ओर देखने लगती और आरती मन ही मन मुस्कुराई वो जानती थी कि मनोज के मन में क्या चल रहा है वो जानती थी कि मनोज अंकल के साथ आज वो पहली बार अकेली आई है और उस दिन के बाद तो शायद मनोज अंकल भी इंतजार में ही होंगे कि कब वो आरती को फिर से नजर भर के देख सके यह सोच आते ही आरती के पूरे शरीर में फिर से एक झुनझुनी सी फैल गई और वो अपने आपको समेट कर बैठ गई वो जानती थी कि मनोज अंकल में इतनी हिम्मत नहीं है कि वो कुछ कह सके या फिर कुछ आगे बढ़ेंगे तो आरती ने खुद ही कहानी को आगे बढ़ाने की कोशिश की

आरती- और कितनी दूर है अंकल

मनोज जो कि अपनी ही उधेड़ बुन में लगा था चलती गाड़ी के अंदर एक मधुर संगीत मई सुर को सुन के मंत्रमुग्ध सा हो गया और बहुत ही हल्के आवाज में कहा
मनोज- बस दो 3 मिनट लगेंगे

आरती- जी अच्छा
और फिर से गाड़ी के अंदर एक सन्नाटा सा छा गया दोनो ही कुछ सोच में डूबे थे पर दोनो ही आगे की कहानी के बारे में अंजान थे दोनो ही एक दूसरे के प्रति आकर्षित थे पर एक दूसरे के आकर्षण से अंजान थे हाँ… एक बात जो आम सी लगती थी वो थी कि नजर बचा कर एक दूसरे की ओर देखने की जैसे कोई कालेज के लड़के लड़कियाँ एक दूसरे के प्रति आकर्षित होने के बाद होता था वो था उन दोनों के बीच मे .

पीछे बैठी आरति थोड़ा सा सभाल कर बैठी थी और बाहर से ज्यादा उसका ध्यान सामने बैठे मनोज अंकल की ओर था वो बार-बार एक ही बात को नोटीस कर रही थी कि मनोज अंकल कुछ डरे हुए थे और, कुछ संकोच कर रहे है वो तो वो नहीं चाहती थी वो तो चाहती थी कि मनोज अंकल उसे देखे और खूब देखे उनकी नजर में जो भूख उसने उस दिन देखी थी वो उस नजर को वो आज भी नहीं भुला पाई थी उसको उस नजर में अपनी जीत और अपनी खूबसूरती दिखाई दी थी अपनी सुंदरता के आगे किसी की बेबसी दिखाई दी थी उसकी सुंदरता के आगे किसी इंसान को बेसब्र और चंचल होते देखा था उसने वो तो उस नजर को ढूँढ़ रही थी उसे तो बस उस नजर का इंतजार था वो नजर जिसमें की उसकी तारीफ थी उसके अंग अंग की भूख को जगा गई थी वो नजर रामु और मनोज में कोई फरक नहीं था आरती के लिए दोनों ही उसके दीवाने थे उसके शरीर के दीवाने उसकी सुंदरता के दीवाने और तो और वो चाहती भी यही थी इतने दिनों की शादी के बाद भी यह नजर उसके पति ने नहीं पाई थी जो नजर उसने रामु की और मनोज अंकल के अंदर पाई थी उनके देखने के अंदाज से ही वो अपना सबकुछ भूलकर उनकी नज़रों को पढ़ने की कोशिश करने लगती थी और जब वो पाती थी कि उनकी नजर में भूख है तो वो खुद भी एक ऐसे समुंदर में गोते लगाने लग जाती थी कि उसमें से निकलना रामू काका या फिर मनोज अंकल के हाथ में ही होता था आज वो फिर उस नजर का पीछा कर रही थी पर मनोज अंकल तो बस गाड़ी चलाते हुए एक दो बार ही पीछे देखा था उस दिन तो पार्टी में रवि के साथ होते हुए भी कितनी बार मनोज ने पीछे उसे भीड़ मे नजर बचा कर देखा था और सीढ़िया उतरते उतरते भी उसे नहीं छोड़ा था आज कहाँ गई वो दीवानगी और कहाँ गई वो चाहत आरति सोचने को मजबूर थी कि अचानक ही उसने अपना दाँव खेल दिया वो थोड़ा सा आगे हुई और अपने सम्मर कोट के बटनों को खोलने लगी और धीरे से बहुत ही धीरे से अपने आपको उसकोट से अलग करने लगी


मनोज जिसका कि गाड़ी चलाने पर ध्यान था पीछे की गति विधि को ध्यान से देखने की कोशिश कर रहा था उसकी आखों के सामने जैसे किसी खोल से कोई सुंदरता की तितली बाहर निकल रही थी उूुुुुुुुुुुउउफफफफफफफफफफफ्फ़ क्या नज़ारा था जैसे ही आरति ने अपने कोट को अपने शरीर से अलग किया उसका यौवन उसके सामने था आँचल ढलका हुआ था और बिल्कुल ब्लाउज के ऊपर था नीचे गिरा हुआ था कोट को उतार कर आरति ने धीरे से साइड में रखा और अपने दाँये हाथ की नाजुक नाजुक उंगलियों से अपनी साड़ी को उठाकर अपनी चुचियों को ढका या फिर कहिए मनोज को चिड़ाया कि देखा यह में हूँ और आराम से वापस टिक कर बैठ गई थी

जैसे कि कह रही हो लो अंकल मेरी तरफ से तुम्हें गिफ्ट मेरी ओर से तो तुम्हें खुला निमंत्रण है अब तुम्हारी बारी है।
वो अपने को और भी ठीक करके बैठने की कोशिश कर रही थी ठीक से क्या अपने आपको अंकल के दर्शान के लिए और खुला निमंत्रण दे रही थी वो थोड़ा सा आगे की ओर हुई और अपनी दोनों बाहों को सामने सीट पर ले गई और बड़े ही इठलाते हुए कहा
आरती- और कीईईतनीईिइ दुर्र्ररर है हाँ…

मनोज- जी बस पहुँच ही गये

और गाड़ी मैदान में उतर गई थी और एक जगह रोक गई


मनोज ने अपने तरफ का गेट खोलकर बाहर निकलते समय पीछे पलटकर आरती की ओर देखते हुए कहा

मनों- जी आइए ड्राइविंग सीट पर

आरती ने लगभग मचलते हुए अपने साइड का दरवाजा खोला और जल्दी से नीचे उतर कर बाहर आई और लगभग दौड़ती हुई इचे से घूमती हुई आगे ड्राइविंग सीट की ओर आ गई

बाहर मनोज़ डोर पकड़े खड़ा था और अपने सामने स्वप्न सुंदरी को ठीक से देख रहा था वो अपनी नजर को नीचे नहीं रख पा रहा था वो उस सुंदरता को पूरा इज़्ज़त देना चाहता था वो अपनी नजर को झुका कर उस सुंदरता का अपमान नहीं करना चाहता था वो अपने जेहन में उस सुंदरता को उतार लेना चाहता था वो अपने पास से आरती को ड्राइविंग सीट की ओर आते हुए देखता रहा और बड़े ही अदब से उसका स्वागत भी किया थोड़ा सा झुक कर और थोड़ा सा मुस्कुराते हुए वो आरती के चेहरे को पढ़ना चाहता था वो उसकी आखों में झाँक कर उसके मन की बातों को पढ़ना चाहता था वो अपने सामने उस सुंदरी को देखना और देखना चाहता था वो एकटक आरती की ओर नजर गढ़ाए देखता रहा जब तक वो उसके सामने से होते हुए ड्राइविंग सीट पर नहीं बैठ गई आरती का बैठना भी एक और दिखावा था वो तो मनोज को अपने शरीर का दीदार करा रही थी बैठते ही उसका आचाल उसके कंधे से ढलक कर उसकी कमर तक उसको नंगा कर गया सिर्फ़ ब्लाउसमें उसके चूचियां जो की आधे से ज्यादा ही बाहर थी मनोज के सामने उजागर हो गया पर आरती का ध्यान ड्राइविंग सीट पर बैठे ही स्टियरिंग पर अपने हाथों को ले जाने की जल्दी में था वो बैठते ही अपने आपको भुलाकर स्टियरिंग पर अपने हाथों को फेरने लगी थी और उसके होंठों पर एक मधुर सी मुस्कान थी पर बाहर खड़े हुए मनोज की तो जैसे जान ही निकल गई थी अपने सामने ड्राइविंग सीट पर बैठी हुई उसे काम अग्नि से जलाती हुई स्वर्ग की उस अप्सरा को वो बिना पलके झपकाए आखें गढ़ाए खड़ा-खड़ा देख रहा था उसकी सांसें जैसे रुक गई थी वो अपने मुख से थूक का घुट पीते हुए डोर को बंद करने को था कि उसकी नजर आरती के साड़ी पर पड़ी जो की डोर से बाहर जमीन तक जा रही थी और आरती तो स्टियरिंग पर ही मस्त थी उसने बिना किसी तकल्लूफ के नीचे झुका और अपने हाथों से आरती की साड़ी को उठाकर गाड़ी के अंदर रखा और अपने हाथों से उसे ठीक करके बाहर आते हुए हल्के हाथों से आरती की जाँघो को थोड़ा सा छुआ और डोर बंद कर दिया
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08-27-2019, 01:25 PM,
#18
RE: Kamvasna आजाद पंछी जम के चूस.
वो जल्दी से घूमकर अपने सीट पर बैठना चाहता था पर घूमकर आते आते उसने पेनट को और आपने अंडरवेर को थोड़ा सा हिलाकर अपने लण्ड को आकड़ने से रोका या कहिए थोड़ा सा सांस लेने की जगह बना दी वो तो तूफान खड़ा किए हुए था अंदर। आरति अब भी उसी स्थिति में बैठी हुई थी उसने अपने पल्लू को उठाने की जहमत नहीं की थी और अपने हाथों को स्तेरिंग पर अब भी घुमाकर देख रही थी मनोज के आने के बाद वो उसकी ओर देखकर मुस्कुराई और
आरती- हाँ… अब क्या

मनोज साइड की सीट पर बैठे हुए थोड़ा सा हिचका था पर फिर थोड़ा सा दूरी बना के बैठ गया और आरती को देखता रहा ब्लाउज के अंदर से उसकी गोल गोल चूचियां जो कि बाहर से ही दिख रही थी उनपर नजर डालते हुए और गले को तर करते हुए बोला

मनोज- जी आप गाड़ी स्टार्ट करे

आरती- कैसे
और अपने पल्लू को बड़े ही नाटकीय अंदाज से अपने कंधे पर डाल लिया ना देखते हुए कि उससे कुछ ढका कि नहीं

मनोज- जी वो चाबी घुमा के साइड से
और आखों का इशारा करते हुए साइड की ओर देखा आरती ने भी थोड़ा सा आगे होकर कीस तक हाथ पहुँचाया और घुमा दिया

गाड़ी एक झटके से आगे बड़ी और फिर आगे बढ़ी और बंद

मनोज ने झट से अपने पैरों को साइड से लेजाकर ब्रेक पर रख दिया और ध्यान से आरतीकी ओर देखा

मनोज के ब्रेक पर पैर रखते ही आरती का सारा बदन जल उठा उसकी जाँघो पर अब मनोज अंकल की जांघे चढ़ि हुई थी और उसकी नाजुक जांघे उनके नीचे थी भारी और मजबूत थी उनकी जांघे और हाथ उसके कंधे पर आ गये थे साड़ी का पल्लू फिर से एक बार उसकी चुचियों को उजागर कर रहा था वो अपनी सांसो को नियंत्रण करने में लगा था मनोज ने जल्दी से अपने पैरों को उसके ऊपर से हठाया और गियर पर हाथ लेजाकर उसे न्यूट्रल किया और आरती की ओर देखता रहा उसकी जान ही अटक गई थी पता नहीं अब क्या होगा उसने एक बहुत बड़ी गलती कर ली थी

पर आरति तो नार्मल थी और बहुत ही सहज भाव से पूछी
आरती- अरे अंकल हमें कुछ नहीं आता ऐसे थोड़ी सिखाया जाता है गाड़ी

मनोज- जी जी जी वो
क्या कहे उसके सामने जो चीज बैठी है, उसको देखते ही उसके होश उड़ गये है और क्या कहे कैसे कहे

आरती- अरे अंकल आप थोड़ा इधर आके बैठो और हमें बताओ कि क्या करना है और ब्रेक बागेरा सबकुछ हमें कुछ नहीं पता है
मनोज- जी जी
और मनोज अपने आपको थोड़ा सा संभालता हुआ आरती की ओर नजर गढ़ाए, हुए उसे बताने की कोशिश करने लगा

मनोज- जी वो लेफ्ट तरफ वाला ऐक्सीलेटर है बीच में ब्रेक है और दायां में क्लच है और बताते हुए उसकी आखें आरती के उठे हुए उभारों को और उसके नीचे उसे पेट और नाभि तक दीदार कर रहे थे ब्लाउज के अंदर जो उथल पुथल चल रही थी
वो उसे भी दिख रहा था पर जो शरीर के अंदर चल रहा था वो तो सिर्फ़ कमी को ही पता था उसके निपल्स टाइट औट टाइट हो धुके थे जाँघो के बीच में गीला पन इतना बढ़ चुका था कि लग रहा था की सूसू निकल गई है पैरों को जोड़ कर रखना उसके लिए दूभर हो रहा था वो अब जल्दी से अपने शरीर में उठ रही अग्नि को शांत करना चाहती थी और मनोज अंकल की नजर अब उसपर थी और वो अंकल को और भी भड़का रही थी वो जानती थी कि बस कुछ ही देर में वो मनोज के हाथों का खिलोना बन जाएगी और मनोज उसे रामू काका जैसे ही रौंद कर रख देंगे वो चाहत लिए वो हर उसकाम को अंजाम दे रही थी जिससे कि वो जल्दी से मुकाम को हासिल कर सके

आरती- उउउफ़्फुऊऊ अंकल एक काम कीजिए आप घर चलिए ऐसे मैं तो कभी भी गाड़ी चलना सीख नहीं पाऊँगी

मनोज- जी पर कोशिश तो आप को ही करनी पड़ेगी

आरती- जी पर मैं तो कुछ भी नहीं जानती आप जब तक हाथ पकड़कर नहीं सिखाएँगे गाड़ी चलाना तो दूर स्टार्ट करना भी नहीं आएगा

और अपना हाथ स्तेरिंग पर रखकर बाहर की ओर देखने लगी मनोज भी सकते में था कि क्या करे वो कैसे हाथ पकड़कर सिखाए पर सिखाना तो है वो अपने आपको संभालता हुआ बोला
मनोज- आप एक काम करे एक्सीलेटर पर पैर आप रखे मैं ब्रेक और क्लच संभालता हूँ और स्तेरिंग भी थोड़ा सा देखा दूँगा

आरती- ठीक है
एकदम से मचलते हुए उसने कहा और नीचे हाथ लेजाकर कीस को घुमा दिया और एक्सीलेटर पर पैर रख दिया दूसरा पैर फ्री था और मनोज की ओर देखने लगी

मनोज भी नहीं जानता था कि अब क्या करे
आरती - अरे अंकल क्या सोच रहे है आप तो बस ऐसा करेगे तो फिर घर चलिए

घर चलिए के नाम से मनोज के शरीर में जैसे जोश आ गया था अपने हाथों में आई इस चीज को वो नहीं छोड़ सकता अब चाहे कुछ भी हो जाए चाहे जान भी चली जाए वो अब पीछे नहीं हटेगा उसने अपने हाथों को ड्राइविंग सीट के पीछे रखा और थोड़ा सा आगे की ओर झुक कर अपने पैरों को आगे बढ़ाने की कोशिश करने लगा ताकि उसके पैर ब्रेक तक पहुँच जाए पर कहाँ पहुँचे वाले थे पैर आरती मनोज की इस परेशानी को समझते हुए अपने पल्लू को फिर से ऊपर करते हुए
आरती- अरे अंकल थोड़ा इधर आइए तो आपका पैर पहुँचेगा नहीं तो कहाँ

मनोज- जी पर वो

आरती- उउउफफ्फ़ ऊऊ आप तो बस थोड़ा सा टच हो जाएगा तो क्या होगा आप इधर आईई और अपने आपको भी थोड़ा सा डोर की ओर सरक के वो बैठ गई

अब मनोज के अंदर एक आवेश आ गया था और वो अपने को रोक ना पाया उसने अपने लेफ्ट पैर को गियर के उस तरफ कर लिया और आरती की जाँघो से जोड़ कर बैठ गया उसकी जांघे आरती की जाँघो को रौंद रही थी उसके वेट से आरती की जाँघो को तकलीफ ना हो सोचकर मनोज थोड़ा सा अपनी ओर हुआ ताकि आरती अपना पैर हटा सके पर आरती तो वैसे ही बैठी थी और अपने हाथों को स्टियरिंग पर घुमा रही थी

मनोज ने ही अपने हाथों से उसके जाँघो को पकड़ा और थोड़ा सा उधर कर दिया और अपनी जाँघो को रखने के बाद उसकी जाँघो को अपने ऊपर छोड़ दिया वह कितनी नाजुक और नरम सी जाँघो का स्पर्श था वो कितना सुखद और नरम सा मनोज अपने हाथों को सीट के पीछे लेजाकर अपने आपको अड्जस्ट किया और आरती की ओर देखने लगा । आरती अब थोड़ा सा उससे नीचे थी उसका आचल अब भी अपनी जगह पर नहीं था उसकी दोनों चूचियां उसे काफी हद तक दिख रही थी वो उत्तेजित होता जा रहा था पर अपने पर काबू किए हुआ था अपने पैरों को वो ब्रेक तक पहुँचा चुका था और अपनी जाँघो से लेकर टांगों तक आरती के स्पर्श से अविभूत सा हुआ जा रहा था वो अपने नथुनो में भी आरती की सुगंध को बसा कर अपने आपको जन्नत की सैर की ओर ले जा रहा था

आरती लगभग उसकी बाहों में थी और उसे कुछ भी ध्यान नहीं था वो अपनी स्वप्न सुंदरी के इतने पास था वो सोच भी नहीं सकता था

गाड़ी स्टार्ट थी और गियर पड़ते ही चालू हो जाएगी
मनोज का दायां हाथ अब गियर के ऊपर था और उसने क्लच दबा के धीरे से गियर चेंज किया और धीरे-धीरे क्लच को छोड़ने लगा और
मनोज- आप धीरे से आक्सेलेटर बढ़ाना

मनोज- जी हमम्म्ममममम
मनोज ने धीरे से क्लच को छोड़ा पर आक्सेलोटोर बहुत कम था सो गाड़ी फिर रुक गई

आरती अपनी जगह पर से ही अपना चेहरा उठाकर
उसके गले में सारी आवाज ही फँस गई थी ।
अंकल की ओर देखा और
आरती- क्या हुआ

मनोज- जी थोड़ा सा और एक्सीलेटर दीजिएगा

और अपने दाँये हाथ से गियर को फ्री करके रुका पर आरती की ओर से कोई हरकत ना देखकर लेफ्ट हैंड से उसके कंधे पर थोड़ा सा छूके कहा
मनोज- जी वो गाड़ी स्टार्ट कजिए हमम्म्ममम

आरती- जी हाँ
किसी इठलाती हुई लड़की की तरह से हँसी और झुक कर कीस को घुमाकर फिर से गाड़ी स्टार्ट की । मनोज की हालत खराब थी वो अपने को अड्जस्ट ही कर रहा था उसका लण्ड उसका साथ नहीं दे रहा था वो अपने आपको आजाद करना चाह-ता था। मनोज ने फिर से अपने पेण्ट को अड्जस्ट किया और अपने लण्ड को गियर के सपोर्ट पर खड़ा कर लिया ढीले अंडरवेअर से उसे कोई दिक्कत नहीं हुई थी अब वो गियर चेंज करने वाला ही था कि आरती का हाथ अपने आप ही गियर रोड पर आ गया था ठीक उसके लण्ड के उउऊपर था जरा सा नीचे होते ही उसके लण्ड को छू जाता । मनोज थोड़ा सा पीछे हो गया और अपने हाथों को आरती के हाथों रख दिया और जोर लगाकर गियर चेंज किया और धीरे से क्लुच छोड़ दिया गाड़ी
आगे की ओर चल दी

मनोज- जी थोड़ा सस्स्साअ और एक्सीलेटर दबाइए हमम्म्ममम
उसकी गरम-गरम सांसें अब आरती के चेहरे पर पड़ रही थी और आरती की तो हालत ही खराब थी वो जानती थी कि वो किस परस्थिति में है और उसे क्या चाहिए उसने आपने आप पर से नियंत्रण हटा लिया था और सबकुछ मनोज के हाथों में सौंप दिया था उसकी सांसें अब उसका साथ नहीं दे रही थी उसके कपड़े भी जहां तहाँ हो रहे थे उसके ब्लाउज के अंदर से उसकी चूचियां उसका साथ नहीं दे रही थी वो एक बेसूध सी काया बन कर रह गई थीजो कि बस इस इंतजार में थी कि मनोज अंकल के हाथ उसे सहारा दे

उसने बेसुधि में ही अपनी आखें आगे की ओर गढ़ाए, हुए स्टियरिंग को किसी तरह से संभाला हुआ था गाड़ी कभी इधर कभी उधर जा रही थी

मनोज का लेफ्ट हैंड तो अब आरती के कंधे पर ही आ गया था और उस नाजुक सी काया का लुफ्त ले रहा था और दायां हैंड कभी उसके हाथो को स्टियरिंग में मदद करते तो कभी गियर चेंज करने में वो भी अपनी स्थिति से भली भाँति परिचित था पर आगे बढ़ने की कोशिश भी कर रहा था पूरी थाली सजी पड़ी थी बस हाथ धोकर श्री गणेश करना बाकी था हाँ बस ओपचारिकता ही उन्हें रोके हुए थी।
मनोज अपने दाँये हाथ से आरती का हाथ पकड़कर स्टियरिंग को डाइरेक्ट कर रहा था और अपने लेफ्ट हैंड से आरती के कंधों को अब ज़रा आराम से सहला रहा था उसकी आखें आरती की ओर ही थी और कभी-कभी बाहर ग्राउंड पर भी उठ जाती थी पर आरती की ओर से कोई भी ना नुकर ना होने से उसके मन को वो और नहीं समझ सका उसका लेफ्ट हैंड अब उसके कंधों से लेकर बूब्स तक को छूने लगे थे पर बड़े ही प्यार से और बड़े ही नाजुक तरीके से वो उस स्पर्श का आनंद ले रहा था उसके लेफ्ट हैंड अब थोड़ा सा आगे की ओर उसके गर्दन तक आ जाता और उसके गले को छूते हुए फिर से कंधे पर पहुँच जाता मनोज अपने को उस सुंदरता पर मर मिटने को तैयार कर रहा था उसकी साँसे अब आरती से तेज चल रही थी वो थोड़ा सा झुक कर आरती के बालों की खुशबू भी अपने अंदर उतार लेता था और फिर से उसके कंधो पर ध्यान कर लेता था उसके हाथ फिर से आरती के कंधे को छूते हुए गले तक पहुँचे थे कि छोटी उंगलियों को उसने और भी फैला कर उसके पैरो के ऊपर छूने की कोशिश करने लगा था

और उधर आरती अंकल की हर हरकत को अपने अंदर समेट कर अपनी आग को और भी भड़का कर जलने को तैयार थी उसके पल्लू ने तो कब का उसका साथ छोड़ दिया था उसकी सांसें भी उखड़ उखड़ कर चल रही थी । मनोज के हाथों का कमाल था कि उसके मुख से अब तक रोकी हुई सिसकारी एक लंबी सी आआह्ह बनकर बाहर निकल ही आई और उसका लेफ्ट हैंड स्टियरिंग से फिसल कर गियर रॉड पा आ गया


ठीक गियर रोड के साथ ही मनोज अपने लण्ड को टिकाए हुए था। आरती के उंगलियां उससे टकराते ही मनोज का दायां हैंड आरती के ब्लाउज के अंदर और अंदर उतर गया और उसके हाथों में वो जन्नत का मजा या कहिए रूई का वो गोला आ गया था जिससे वो बहुत देर से अपनी आँखे टिकाए देख बार रहा था वो थोड़ा सा आगे हुआ और अपने लण्ड को आरती की उंगलियों को छुआ भर दिया और अपने दाएँ हैंड से आरती की चूचियां को दबाने लगा था


और आरती के हाथों में जैसे कोई मोटा सा रोड आ गया था वो अपने हाथों को नीचे और नीचे ले गई थी और उसके लण्ड को पेण्ट के ऊपर से कसकर पकड़ लिया उसकी हथेली में नहीं आ रहा था पर गरम बहुत था कपड़े के अंदर से भी उसकी गर्मी वो महसूस कर रही थी वो गाड़ी चलाना भूल गई थी, ना ही उसे मालूम था कि गाड़ी कहाँ खड़ी थी उसे तो बस पता था कि उसके ब्लाउज के अंदर एक बालिस्ट सा हाथ उसकी चुचियों को दबा दबाकरउसके शरीर की आग को बढ़ा रहा था और उसके हाथों में एक लण्ड था जिसके आकार का उसे पता नहीं था उसके चेहरे को देखकर कहा जा सकता था कि उसे जो चाहिए था वो उसे बस मिलने ही वाला था

तभी उसके कानों में एक आवाज आई


आप बहुत सुंदर आहियीईई

यह अंकल की आवाज थी बहुत दूर से आती हुई और उसके जेहन में उतरती चली गई उसका लेफ्ट हैंड भी अब उठकर अंकल के हाथों का साथ देने लगा था उसके ब्लाउज के ऊपर से अंकल का दूसरा हाथ यानी की दायां हाथ अब आरती की दांई चुचि को ब्लाउज के ऊपर से दबा रहा था और होंठो से आरती के गले और गालों को को गीलाकर रहे थे। आरती सबकुछ भूल कर अपने सफर पर रवाना हो चुकी थी और अंकल के हाथों का खिलोना बन चुकी थी वो अपने शरीर के हर हिस्से में अंकल के हाथों का इंतजार कर रही थी और होंठों को घुमाकर अंकल के होंठों से जोड़ने की कोशिश कर रही थी। मनोज ने भी आरती को निराश नहीं किया और उसके होंठों को अपने होंठों में लेकर अपनी प्यास बुझानी शुरू कर दी


अब तो गाड़ी के अंदर जैसे तूफान सा आ गया था कि कौन सी चीज पकड़े या किस पर से हाथ हठाए या फिर कहाँ होंठों को रखे या फिर छोड़े दोनों एक दूसरे से गुथ से गये थे। आरती की पकड़ मनोज के लण्ड पर बहुत कस गई थी और वो उसे अपनी और खींचने लगी थी पर मनोज क्या करता वो लेफ्ट हैंड से अपनी पैन्ट को ढीलाकरके अपने अंडरवेर को भी नीचे कर दिया ।
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08-27-2019, 01:25 PM,
#19
RE: Kamvasna आजाद पंछी जम के चूस.
और फिर से आरती के हाथों को पकड़कर अपने लण्ड पर रख दिया और फिर से आरती के होंठों का रास्पान करने लगा। लेफ्ट हैंड से उसने कब आरती की साड़ी ऊपर उठा दी थी। आरती को पता ही नही चला पर हाँ मनोज की पत्थर जैसी हथेली का स्पर्श जैसे ही उसकी जाँघो और टांगों पर हुआ तो वो अपनी जाँघो को और नहीं जोड़ कर नही रख सकी थी वो अपने आपको अंकल के सुपुर्द करके मुख को आजाद करके सीट के हेड रेस्ट पर सिर रख कर जोर-जोर से साँसे ले रही थी और मनोज उस मस्त चीज का पूरा लुफ्त उठा रहा था

तभी आचनक ही मनोज अपनी सीट से आलग होकर जल्दी से बाहर की ओर लपका और घूमकर अपनी ढीली पेण्ट और अंडरवेर को संभालता हुआ ड्राइविंग सीट की ओर लपका और एक झटके में ही डोर खोलकर आरती को खीच कर उसकी टांगों को बाहर निकल लिया और उसकी जाँघो और टांगों को चूमने लगा कितनी सुंदर और सुडौल टाँगें थी । आरती की और कितनी चिकनी और नरम उूउऊफ वो अपने हाथों को बहुके पेटीकोट के अंदर तक बिना किसी झिझक के ले जा रहा था और एक झटके में उसकी पैंटी को खींचकर बाहर भी निकल भी लिया और देखते ही देखते उसके जाँघो को किस करते हुए उसकी चुत तक पहुँच गया


और आरती ने अपने जीवन का पहला अनुभव किया अपनी चुत को छूने का उसका पूरा शरीर जबाब दे गया था और उसके मुख से एक लंबी सी सिसकारी निकल गई और वो बुरी तरह से अपने आपको अंकल की ग्रिफ्त से छुड़ाने की कोशिश करने लगी थी पर कहाँ अंकल की पकड़ इतनी मजबूत थी कि वो कुछ भी ना कर पाई हाँ… इतना जरूर था कि उसकी चीख अब उसके बस में नहीं थी वो निरंतर अपनी चीख को सुन भी सकती थी और उसके सुख का आनंद भी ले सकती थी उसे लग रहा था कि जैसे उसका हार्ट फैल हो जाएगा उसके अंदर उठ रही काम अग्नि अपने चरम सीमा पर पहुँच चुकी थिया और वो अंकल की जीब और होंठों का जबाब ढूँढ़ती और अपने को बचाती वो अंकल के हाथों में ढेर हो गई पर अंकल को कहाँ चैन था वो तो अब भी अपने होंठों को आरती की चुत में लगाकर उसके जीवन का अमृत पीरहा था उसका पूरा चेहरा आरती की चुत से निकलने वाले रस से भर गया था और वो अपने चेहरे को अब भी उसपर घिस रहा था आरती जो कि अब तक अपने को संभालने में लगी थी उसे नहीं पता था कि वो किस परिस्थिति में है हाँ पता था तो बस एक बात की वो एक ऐसे जन्नत के सफर पर है जिसका की कोई अंत नहीं है उसके शरीर पर अब भी झुकने से उसकी चुत से रस्स अब तक निकल रहा था और अपनी चुत पर उसे अभी तक के होंठों का और जीब का एहसास हो रहा था उसकी जाँघो पर जैसे कोई सख़्त सी चीज ने जकड रखा था और उसकी पकड़ इतनी मजबूत थी वो चाह कर भी अपनी जाँघो को हिला नहीं पा रही थी।
और उधर मनोज अपनी जीब को अब भी आरती की चुत के अंदर आगे पीछे करके अपनी जीब से आरती के अंदर से निकलते हुए रस्स को पी रहा था जैसे कोई अमृत मिल गया हो और वो उसका एक भी कतरा वेस्ट नहीं करना चाहता था उसके दोनों हाथ आरती की जाँघो के चारो और कस के जकड़े हुए थे और वो आरती की जाँघो को थोड़ा सा खोलकर सांस लेने की जगह बनाने की कोशिश कर रहा था पर आरती की जाँघो ने उसके सिर को इतनी जोर से जकड़ रखा था कि वो अपनी पूरी ताकत लगाकर भी उसकी जाँघो को अलग नहीं कर पा रहा था


वो इससे ही अंदाजा लगा सकता था कि आरती कितनी उत्तेजित है या फिर कितना मजा आ रहा है वो अपने को और भी आरती की चुत के अंदर घुसा लेना चाहता था पर उसने अपने को छुड़ाने की कोशिश में एक झटके से अपना चेहरा उसकी जाँघो से आजाद कर लिया और बाहर आके सांस लेने लगा तब उसकी नजर आरती पर पड़ी जो कि अब भी ड्राइविंग सीट पर लेटी हुई थी और जाँघो तक नंगी थी उसकी सफेद और सुडोल सी जांघे और पैर बाहर कार से लटके हुए थे दूर से आ रही रोशनी में उसके नंगे शरीर को चार चाँद लगा रहे थे मनोज का पूरा चेहरा आरती के रस्स से भीगा हुआ था और वो अब भी आरती को,
एक भूखे शेर की तरह देख रहा था और अपने मजबूत हाथों से उसकी जाँघो को और उसके पैरों को सहला रहा था आरती का चेहरा उसे नहीं दिख रहा था वो अंदर कही शायद गियर रोड के पास से नीचे की ओर था मनोज उठा और सहारा देकर आरती को थोड़ा सा बाहर खींचा ताकि आरती का सिर किसी तरह से सीट पा आ जाए । वो नहीं चाहता था कि आरती को तकलीफ हो पर अपनी वासना को भी नहीं रोक पा रहा था उसने एक बार आरती की ओर देखा और उठ खड़ा हुआ और अपनी कमीज से अपना चेहरा पोंछा और थोड़ा सा अंदर घुसकर आरती की ओर देखने लगा। आरती अब भी शांत थी पर उसके शरीर से अब भी कई झटके उठ रहे थे बीच बीच में थोड़ा सा खांस भी लेती थी पर अंकल को अचानक ही अपने ऊपर झुके हुए देखकर वो थोड़ा सा सचेत हो गई

और अपनी परिस्थिति का अंदाज लगाने लगी।अंकल का चेहरा बहुत ही सख्त सा दिखाई दे रहा था, उस अंधेरे में भी उसे उनकी आखों में एक चमक दिखाई दे रही थी उसके पैरों पर अब थोड़ा सा नंगेपन का एहसास उसे हुआ तो उसने अपने पैरों को मोड़ कर अपने नंगे पन को छुपाने की कोशिश की
तो अंकल ने उसके कंधों को पकड़कर थोड़ा सा उठाया और

अंकल- मैडम

आरती- ----
अंकल ने जब देखा कि आरती की ओर से कोई जबाब नहीं है तो वो बाहर आया और अपने हाथों से आरती को सहारा देकर बैठा लिया अंकल जो कि बाहर खड़ा था और लगभग आरती के चेहरे तक उसकी कमर आ रही थी। आरती के बैठते ही उसने आरती को कंधे से जकड़कर अपने पेट से चिपका लिया । आरती भी अंकल की हरकत को जानकर अपने को रोका नहीं पाई पर जैसे ही वो अंकल के पेट से लगी तो उसके गले पर एक गरम सी चीज टकराई गरम बहुत ही गरम उसने अपने चेहरे को नीचे करके उस गरम चीज़ को अपने गले और चिन के बीच में फँसा लिया और हल्के से अपनी चिन को हिलाकर उसके एहसास का मजा लेने लगी। आरती के शरीर में एक बार फिर से उत्तेजना की लहर उठने लगी थी और वो वैसे ही अपने गले और चिन को उस चीज पर घिसती रही उधर मनोज अपने लण्ड के आकड़पन को अब ठंडा करना चाहता था वो उत्तेजित तो था ही पर आरती की हरकत को वो और नहीं झेल पा रहा था उसने भी आरती को अपनी कमर पर कस्स कर जकड़ लिया और अपनी कमर को आरती के गले और चेहरे पर घिसने लगा वो अपने लण्ड को शायद अच्छे से दिखा लेना चाहता था कि देख किस चीज पर आज हाथ साफ किया है या कभी देखा है इतनी सुंदर हसीना को या फिर तेरी जिंदगी का वो लम्हा शायद फिर कभी भी ना आए इसलिए देख ले


और उधर आरती की हा;लत फिर से खराब होने लगी थी वो अपने चेहरे पर और गले और गालों पर अंकल के लण्ड के एहसास को झुटला नहीं पा रही थी और वो भी अपने आपको अंकल के और भी नजदीक ले जाना चाहती थी उसने अपने दोनों हाथों को अंकल की कमर में चारो ओर कस्स लिया और खुद ही अपने चेहरे को उनके लण्ड पर घिसने लगी थी पहली बार जिंदगी में पहली बार वो यह सब कर रही थी और वो भी एक अनजाने से सक्श के के साथ। उसने अपने पति का लण्ड भी कभी अपने चेहरे पर नहीं घिसा था या शायद कभी मौका ही नहीं आया था पर हाँ… उसे अच्छा लग रहा था उसकी गर्मी के एहसास को वो भुला नहीं पा रही थी उसके शरीर में एक उत्तेजना की लहर फिर से दौड़ने लगी थी उसकी जाँघो के बीच में फिर से गुदगुदी सी होने लगी थी ठंडी हवा उसकी जाँघो और, योनि के द्वार पर अब अच्छे से टकरा रही थी।
और वो अपने चेहरे को घिस कर अपने आपको फिर से तैयार कर रही थी उसके लिप्स भी कई बार अंकल के लण्ड को छू गये थे पर सिर्फ़ टच और कुछ नहीं उसके होंठों का टच होना और मनोज के शरीर में एक दीवाने पन की लहर और उसे पर उसका वहशीपन और भी बढ़ गया था वो अपने लण्ड को अब आरती के होंठों पर बार-बारछूने की कोशिश करने लगा था वो अपने दोनो हाथों को एक बार फिर आरती की पीठ और बालों को सहलाने के साथ उसकी चूची की ओर ले जाने की कोशिश करने लगा। आरतीके बाल कमर के चारो और चिपके होने से उसे थोड़ी सी मसक्कत करी पड़ी पर हाँ… कामयाब हो ही गया वो अपने हाथों को आरती की चूचियां पर पहुँचने में ब्लाउज के ऊपर से ही वो उनको दबाने लगा और उनके मुलायम पन का आनंद लेने लगा एक तरफ तो वो आरती की चुचियों से खेल रहा था और दूसरे तरफ वो अपने लण्ड को आरती के होंठों पर घिसने की कोशिश भी कर रहा था

उसके हाथ अब उसके इशारे पर नहीं थे बल्कि उसको मजबूर कर रहे थे की आरती की चुचियों को अंदर से छुए तो वो अपने हाथों से आरती के ब्लाउज के बटन को खोलेकर एक ही झटके से उसकी ब्रा को भी आजाद कर लिया और उसकी दोनों चुचियों को अपने हाथों में लेकर तोलने लगा उसके निप्पल्स को भी अपनी उंगलियों के बीच में लेकर हल्के सा दबाने लगा नीचे आरती के मुख से एक हल्की सी सिसकारी ने उसे और भी दीवाना बना दिया था और वो अपनी उंगलियों के दबाब को उसके निपल्स पर और भी ज्यादा जोर से मसलने लगा था


आरती की सिसकारी अब धीरे धीरे बढ़ने लगी थी और उसका चेहरा भी अब कुछ ज्यादा ही उसके पेट पर घिसने लगा था मनोज अपने हाथो का दबाब खड़े-खड़े उसकी चुचियों पर भी बढ़ाने लगा था और अब तो कुछ देर बाद वो उन्हें मसलने लगा था आरती के मुख से निकलने वाली सिसकारी अब थोड़ी बहुत दर्द भी लिए हुए थी पर मना नहीं कर रही थी बल्कि आरती की पकड़ उसकी कमर पर और भी ज्यादा होती जा रही थी और उसका चेहरा भी उसके ठीक लण्ड के ऊपर और उसके लण्ड के चारो तरफ कुछ ज्यादा ही इधर-उधर होने लगा था मनोज ने एक बार नीचे आरती की ओर देखा और जोर से उसकी चुचियों को दबा दिया दोनों हाथों से और जैसे ही उसके मुख से आआह्ह निकली अंकल ने झट से अपने लण्ड को उसके सुंदर और साँस लेने की लिए खुले होंठों के बीच में रख दिया और एक झटका से अंदर गुलाबी होंठों में फँसा दिया

आरती के तो होश ही गुम हो गये जैसे ही उसके मुख में अंकल का लण्ड घुसा उसे घिंन सी आई और वो अपने आपको आजाद कराने की कोशिश करने लगी और अपने मुख से अंकल का लण्ड को निकालने में लग गई थी पर अंकल की पकड़ इतनी मजबूत थी कि वो अपने आपको उनसे अलग तो क्या हिला तक नहीं पाई थी अंकल का एक हाथ अब उसके सिर के पीछे था और दूसरे हाथ से उसके कंधो को पकड़कर उसे अपने लण्ड के पास और पास खींचने की कोशिश कर रहे थे आरती का सांस लेना दूभर हो रहा था उसकी आखें बड़ी-बड़ी हो रही थी और वो अपने को छुड़ा ना पाकर अंकल की ओर बड़ी दयनीय स्थिति में देखने लगी थी पर अंकल का पूरा ध्यान अपने लण्ड को आरती के मुख के अंदर घुसाने में लगा था और वो उसपरम आनंद को कही से भी जाने नहीं देना चाहते थे वो अपने हाथों का दबाब आरती के सिर और कंधे पर बढ़ाते ही जा रहे थे और अपने लण्ड को उसके मुँह पर अंदर-बाहर धीरे से करते जा रहे थे
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08-27-2019, 01:25 PM,
#20
RE: Kamvasna आजाद पंछी जम के चूस.
आरती जो कि अपने को छुड़ाने में असमर्थ थी अब किसी तरह से अपने मुख को खोलकर उस गरम चीज को अपने मुख में अड्जस्ट करने की कोशिस करने लगी थी घिंन के मारे उसकी जान जा रही थी और अंकल के लण्ड के आस पाश उगे बालों पर से एक दूसरी गंध आ रही थी जिससे कि उसे उबकाई भी आ रही थी पर वो बेबस थी वो अंकल जैसे बालिस्त इंसान से शक्ति में बहुत कम थी वो किसी तरह से अपने होंठों को अड्जस्ट करके उनके लण्ड को उनके तरीके से अंदर-बाहर होने दे रही थी पर जैसे ही उसने अपने मुख को खोलकर अंकल के लण्ड को अड्जस्ट किया । अंकल और भी वहशी से हो गये थे वो अब इतना जोर का झटका देते थे कि उसके गले तक उनका लण्ड चला जाता था और फिर थोड़ा सा बाहर की ओर खींचते थे तो आरती को थोड़ा सा सुकून मिलता अंकल अपनी गति से लगे हुए थे और आरती अपने को अड्जस्ट करने में पर ना जाने क्यों थोड़ी देर बाद आरती को भी इस खेल में मजा आने लगा था अब वो उतना रेजिस्ट नहीं कर रही थी बल्कि अंकल के धक्को के साथ ही वो अपने होंठों को जोड़े ही रखा था और धीरे धीरे अंकल के लण्ड को अपने अंदर मुख में लेते जा रही थी अब तो वो अपनी जीब को भी उनके लण्ड पर चलाने लग गई थी उसे अब उबकाई नहीं आ रही थी और ना ही घिन ही आ रही थी उसके शरीर से उठ रही गंध को भी वो भूल चुकी थी और तल्लीनता से उनके लण्ड को अपने मुँह में लिए चुस्स रही थी। मनोज ने जैसे ही देखा कि आरती अब उसके लण्ड को चुस्स रही थी और उसे कोई जोर नहीं लगाना पड़ रहा था तो उसने अपने हाथ का दबाब उसके सिर पर ढीला छोड़ दिया और अपनी कमर को आगे पीछे करने में ध्यान देने लगा उसका लण्ड आरती के छोटे से मुख में लाल होंठों से लिपटा हुआ देखकर वो और भी उत्तेजित होता जा रहा था वो अब किसी भी कीमत पर आरती की चुत के अंदर अपने आपको उतार देना चाहता था वो जानता था कि अगर आरती के मुख में वो ज्यादा देर रहा तो वो झड जाएगा और वो मजा वो उसकी चुत पर लेने से वंचित रह जाएगा उसने जल्दी से आरती के कंधों को पकड़कर एक झटके से उठाया और अपने होंठों को उसके होंठों से जोड़ दिया और उसके लाल लाल होंठों को अपने मोटे और भद्दे से होंठों की भेंट चढ़ा दिया वो पागलो की तरह से आरती के होंठों को चुस्स रहा था और अपनी जीब से भी उसके मुख की गहराई को नाप रहा था । आरती जब तक कुछ समझती तब तक तो अंकल अपने होंठों से जोड़ चुके थे और पागलो की तरह से किस कर रहे थे किस के टूट-ते ही वो आरती के ऊपर थे और अंकल का लण्ड उसके योनि के द्वार पर था और एक ही झटके में वो उसके अंदर था अंकल के वहशीपन से लगता था की आज उसका इम्तहान था या फिर उनके पुरुषार्थ को दिखाने का समय या फिर आरती को भोगने का उतावलापन वो भूल चुका था कि वो सिर्फ उसका कार इंस्ट्रक्टर है और जो आज उसके साथ है वो उस्की स्टूडेंट है एक बड़े घर की बहू उसे तो लग रहा था की उसके हाथों में जो थी वो एक औरत है और सिर्फ़ औरत जिसके जिश्म का वो दीवाना था और जैसे चाहे वैसे उसे भोग सकता था वो आरती को चित लिटाकर अपने लण्ड को उसके चुत के द्वार पर रखकर एक जोरदार धक्के के साथ उसके अंदर समा गया उसके अंदर घुसते ही आरती के मुख से एक चीत्कार निकली जो कि उस सुनसांन् ग्राउंड के चारों ओर फेल्ल गई और शायद गाडियो की आवाज में दब कर कही खो गई दुबारा धक्के के साथ ही मनोज अपने होंठों को आरती के होंठों पर ले आया और किसी पिस्टन की भाँति अपनी कमर को धक्के पर धक्के लगाने लगा वो जानता था कि वो ज्यादा देर का मेहमान नहीं है उसकी उत्तेजना शिखर पर है और वो इस कामुक सुंदरी को ज्यादा देर नहीं झेल पाएगा सो वो अपने गंतव्य स्थान पर पहुँचने की जल्दी में था और बिना किसी रोक टोक के अपने शिखर की ओर बढ़ने लगा था
और आरती जो कि नीचे अंकल के हर धक्के के साथ ही अपने को एक बार फिर उस असीम सागर में गोते लगाने लगी थी जिसमें डूब कर अभी-अभी निकली थी पर कितना सुखद था यह सफर कितना सुख दाई था यह सफर एक साथ दो-दो बार उसकी चुत से पानी झरने को था अब भी उसकी चुत इतनी गीली थी कि उसे लग रहा था कि पहली बार पूरी नहीं हो पाई थी कि दूसरे की तैयारी हो चली थी वो भी अपनी कमर को उठाकर अंकल की हर चोट का मजा भी ले रही थी और उसका पूरा साथ दे रही थी अब तो वो भी अपनी जीब अंकल के साथ लड़ाने लग गई थी वो भी अपने होंठों को उसके होंठों से जोड़ कर उन्हें चूमने लग गई थी कि अचानक ही उसके मुख से निकला

आरती- आआआआह्ह अंकल और जोर से
अंकल@#&$^-
आरती- अऔरर्र ज्ज्जूऊऔरर्र्रर सस्स्सीईए उूुुुुुुुुुुउउम्म्म्मममममममममम
और वो अंकल के चारो ओर अपनी जाँघो का घेरा बना कर उसकी बाहों में झूल गई और अंकल के हर धक्के को अंदर अपने अंदर बहुत अंदर महसूस करने लगी उसकी योनि से एक बहुत ही तेज धार जो कि शायद अंकल के लण्ड से टकराई और अंकल भी अब झड़ने लगे अंकल की गिरफ़्त आरती के चारो तरफ इतनी कस्स गई थी कि आरती का सांस लेना भी दूभर हो गया था वो अपने मुख को खोलकर बुरी तरह से सांसें ले रही थी और हर सांस लेने से उसके मुख से एक लंबी सी सस्सशह्ह्ह्ह्ह्ह निकलती


अंकल भी अब अपना दम खो चुका था और धीरे धीरे उसकी पकड़ भी आरती पर से ढीली पड़ने लगी थी वो अपने को अब भी आरती के बालों और कंधों के सहारे अपने चेहरे को ढँके हुए था और अपनी सांसों को कंट्रोल कर रहा था दोनों शांत हो चुके थे पर एक दूसरे को कोई भी नहीं छोड़ रहा था पर धीरे धीरे हल्की सी ठंडक और तेज हवा का झौंका जब उनके नंगे शरीर पर पड़ने लगा या फिर उनको एहसास होने लगा तो जैसे दोनों ही जागे हो और अपनी पकड़ ढीली की और बिना एक दूसरे से नजर मिलाए अंकल ने सहारा देकर आरती के पैर जमीन पर टिकाए और नीचे गर्दन नीची किए दूसरी तरफ पलट गया वो आरती से नजर नहीं मिला पा रहा था और आरती की भी हालत ऐसी ही थी वो अपने बाप समान अंकल के सामने ऊपर से बिल कुल नंगी थी । नीचे खड़े होने से उसकी साड़ी ने उसके नीचे का नंगा पन तो ढँक लिया था पर ऊपर तो सब खुला हुआ था वो भी एक सुनसान से ग्राउंड में आरती को जैसे ही अपनी परिस्थिति का ग्यान हुआ वो दौड़कर पीछे की सीट पर आ गई और जल्दी से दरवाजा खोलकर अंदर बैठ गई और अपने कंधे पर पड़े हुए ब्रा और ब्लाउसको ठीक करने लगी उसकी नजर बाहर गई तो कि बाहर अंकल अपनी अंडरवेअर ठीक करने के बाद अपनी पेंट को पहन रहे थे और अपने चेहरे को भी पोंछ रहे थे तब तक आरती ने अपने आपको ठीक किया और जल्दी से कोट भी पहन लिया ताकि वो घर चलने से पहले ठीक ठाक हो जाए अपनी साड़ी को अंदर बैठे बैठे ठीक किया और नीचे की ओर झटकारने लगी उसकी नजर बीच बीच में बाहर खड़े हुए अंकल पर भी चली जाती थी अंकल अब पूरी तरह से अपने आपको ठीक ठाक कर चुके थे और बाहर खड़े हुए शायद उसी का इंतजार कर रहे थे या फिर अंदर आने में झिहक रहे थे वो शायद उसके तैयार होने का इंतजार बाहर खड़े होकर कर रहे थे पर आरती में तो इतनी हिम्मत नहीं थी कि वो अंकल को अंदर बुला ले पर उसने अंकल को तभी ड्राइविंग साइड कर गेट खोलते हुए देखा तो झट से उसने अपना सिर बाहर खिड़की की ओर कर लिया और बाहर देखने लगी पर कनखियों से उसने देखा कि अंकल ने नीचे से कुछ उठाया और उसको गाड़ी की लाइट में देखा और अंदर की ओर आरती की तरफ भी उनकी नजर हुई पर आरती की नजर उस चीज पर नहीं पड़ पाई जो उन्होंने उठाई थी पर जब अंकल को उसे अपने मुख के पास लेकर सूँघते हुए देखा तो वो शरम से पानी पानी हो गई वो उसकी पैंटी थी जो कि अंकल के हाथ में थी वो अंदर आके बैठ गये और अपने एक हाथ को पीछे करके उसकी पैंटी को साइड सीट की ऊपर रख दिया ताकि आरती की नजर उसपर पड़ जाए और गेट बंद कर लिया और गाड़ी का इग्निशन चालू कर गाड़ी को धीरे से ग्राउंड के बाहर की ओर दौड़ा दिया

गाड़ी जैसे ही ग्राउंड से बाहर की दौड़ी वैसे ही आरती ने अपनी पैंटी को धीरे से हाथ बढ़ाकर अपने पास खींच लिया ताकि अंकल की नजर में ना आए पर कनखियो से मनोज की नजर से वो ना बच पाई थी हाँ… पर मनोज को एक चिंता अब सताने लगी थी कि अब क्या होगा, जो कुछ करना था वो तो वो कर चुके लेकिन वो चिंतित था कही आरती ने इस बात की शिकायत कही रवि से कर दी तो या फिर कही आरती को कुछ हो गया तो या फिर कही उसका ड्राइविंग स्कूल बंद करवा दिया गया तो


इसी उधेड़बुन में अंकल अपनी गति से गाड़ी चलाते हुए बंगलो की ओर जा रहे थे और उधर आरती भी अपने तन की आग बुझाने के बाद अपने होश में आ चुकी थी वो बार-बार अपनी साड़ी से अपनी जाँघो के बीच का गीलापन और चिपचिपापन को पोन्छ रही थी उसका ध्यान अब भी बाहर की ओर ही था और मन ही मन बहुत कुछ चल रहा था वो अंकल के साथ बिताए वक्त की बारे में सोच रही थी वो जानती थी कि उसने बहुत बड़ी भूलकर ली है पहले रामू काका और अब मनोज अंकल दोनों के साथ उसने वो खेल लिया था जिसका कि भविष्य क्या होगा उसके बारे में सोचने से ही उसका कलेजा काप उठ-ता था पर वो क्या करती वो तो यह सबकुछ नहीं चाहती थी वो तो उसके मन या कहिए अपने तंन के आगे मजबूर हो गई थी वो क्या करती जो नजर उस पड़ पड़ी थी रामू काका की या फिर मनोज अंकल की वो नजर तो आज तक रवि की उस पर नहीं पड़ी थी क्या करती वो उसने जानबूझ कर तो यह नहीं किया हालात ही ऐसे बन गये कि वो उसे रोक नहीं पाई और यह सब हो गया


अगर रवि उसे थोड़ा सा टाइम देता या फिर वो कही एंगेज रहती या फिर उसके लिए भी कोई टाइम टेबल होता तो क्या उसके पास इतना टाइम होता कि वो इन सब बातों की ओर ध्यान देती आज से पहले वो तो कालेज और स्कूल और दोस्तों के साथ कितना घूमी फिरी है पर कभी भी इस तरह की बात नहीं हुई या फिर उसके जेहन में भी इस तरह की बात नहीं आई थी सेक्स तो उसके लिए बाद की बात थी पहले तो वो खुद थी फिर उसकी जिंदगी और फिर सेक्स वो भी रात को अपने पति के साथ। घर के नौकरके साथ सेक्स वो तो कभी सोच भी नहीं पाई थी कि वो इतना बड़ा कदम कभी उठा भी सकती थी वो भी एक बार नहीं दो बार पहली को तो गलती कहा जा सकता था पर दूसरी और फिर आज भी वो भी बाहर दूसरे अनजान आदमी के साथ


यह गलती नहीं हो सकती थी यही सोचते सोचते कब घर आ गया उसे पता भी ना चला और जैसे ही गाड़ी रुकी उसने बाहर की ओर देखा घर का दरवाजा खुला था पर गाड़ी के दरवाजे पर अंकल को नजर झुकाए खड़े देखकर एक बार फिर आरती सचेत हो गई और जल्दी से गाड़ी के बाहर निकली और लगभग दौड़ती हुई सी घर के अंदर आ गई और जल्द बाजी से अपने कमरे की ओर चली गई कमरे में पहुँचकर सबसे पहले अपने आपको मिरर में देखा अरे बाप रे कैसी दिख रही थी पूरे बाल अस्त व्यस्त थे और चेहरे की तो बुरी हालत थी पूरा मेकप ही बिगड़ा हुआ था अगर कोई देख लेता तो झट से समझ लेता की क्या हुआ है आरती जल्दी से अपने आपको ठीक करने में लग गई और बाथरूम की ओर दौड़ पड़ी।
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