Hindi Kamuk Kahani वो शाम कुछ अजीब थी
07-20-2019, 10:00 PM,
RE: Hindi Kamuk Kahani वो शाम कुछ अजीब थी
रूबी : अरे दीदी आप चढ़े घोड़े पे क्यूँ सवार रहती हो, सवी दीदी के साथ जो हुआ वो जानते हुए भी, और इस काम को सिर्फ़ सुनेल कर सकता है, उसका जिस्म घायल है तो उसने सुनील के मजबूत जिस्म में शरण लेली ताकि वो सवी को बचा सके आप हर वक़्त ग़लत क्यूँ सोचते हो. मैने सुनेल की आँखों में रिश्तों के लिए जो तड़प देखी है वो ऐसा घिनोना काम कभी नही करसकता. दीदी कभी सुनेल भाई के दिल की हालत को समझने की कोशिश करी. जिसे अपनी माँ समझते आए जिंदगी भर वो उसकी माँ नही निकली, कभी सोच के देखो ये सब आपके साथ होता तो क्या गुजरती दिल पे. महीनो कोमा में पड़े रहे सुनील पे होने वाले वार को अपने उपर ले लिया, इतना भी नही किया के सुनील को वॉर्न करें, पोलीस में कंप्लेंट करें, बस अकेले झुझते रहे जिंदगी की परेशानियों से. ऐसा भाई तो किस्मत वालों को मिलता है. और कभी ये सोचा क्या गुज़री होगी उसके दिल पे जब ये पता चला कि उसकी असली माँ अब उसके जुड़वा भाई की बीवी है , उसकी बड़ी बहन उसके जुड़वा भाई की बीवी है, उसकी वो मासी जिसने माँ की तरहा उसकी देखभाल कि वो उसके जुड़वा भाई कि बीवी बन गयी. सारे रिश्ते जिनकी पनाह में वो जीने आया था वो सब बदल गये. क्या इनको (सुनील) को भाई बोल पाएगा, अगर सूमी दीदी को माँ बोलता है तो सुनील उसका पिता बन गया, अगर सुनील को वो भाई बोलता है तो उसकी माँ उसकी भाभी बन गयी. सोचो क्या गुजर रही होगी उसपर.

सोनल और सूमी खामोश पत्थर सी बन जाती हैं. सुनील उनके दिल में इतना बसा हुआ था कि सुनेल के दर्द का अहसास छू तक नही रहा था.

सोनल : ये सब तो उस उपर वाले की मर्ज़ी से हुआ, ना डॅड सुनील को माँ को अपनाने को बोलते, ना मेरे दिल में उसके लिए वो प्यार पनपता तो ये सब नही होता. पर होनी को कुछ और मंजूर था, हम सब का एक होना विधि के विधान ने खुद निश्चित कर रखा था.

रूबी : और उसकी सज़ा सुनेल को मिले क्यूँ ?

तर्क वितर्क शुरू हो गये, पर कोई हल् ना निकला . कसूर किसी का भी नही , पर सज़ा तो एक को मिल ही रही थी, जिसका समाधान अगर कोई कर सकती थी तो बस सुनेल की माँ या बड़ी बहन हां उस रूप में उसे अपने भाई को खोना पड़ता और वक़्त ने ये फ़ैसला भी सुनेल के हाथों में रख दिया - वो किसे चुनता है - माँ और बहन को या अपने जुड़वा भाई को.

सुनील जिसके अंदर अब सुनेल समा चुका था उसने एक नज़र सुनेल पे डाली जैसे कह रहा हो यार माफ़ करना ज़रूरी था, ये जंग तेरे बस की नही और मुझे तेरे जिस्म का सहारा चाहिए.

सुनील आइसीयू से बाहर निकला तो उसका सामना विजय से हो गया. विजय को सुनेल कुछ बदला सा लगा पर शायद थकान और चिंता का असर होगा ये सोच उसने कोई ध्यान नही दिया.

विजय : आओ सुनील, चलो उधर चल के बैठते हैं, फिर सारी बात बताओ. सुनील कुछ नही बोला बस साथ हो लिया.

विजय : हां सुनील, अब सारी बात शुरू से बताओ, क्या माजरा है ये. ये प्रोफ़ेसर. कॉन है, और सवी के साथ क्या हुआ उसका तो कुछ अता पता नही चला, सुनेल एका एक लंडन से कैसे आया.

सुनील ( सुनेल) कुछ देर चुप रहा. ' सब कुछ पता चल जाएगा अंकल, अभी मुझे उस जगह पहुँचना है जहाँ आक्सिडेंट हुआ था, वक़्त बहुत कम है.

विजय को सुनील की आवाज़ कुछ बदली लगी. पर चुप रहा और उसे साथ ले उस जगह की तरफ चल पड़ा अपनी कार से जहाँ गाँव वालों ने बताया था कि आक्सिडेंट हुआ था. कार चलाते वक़्त विजय का ध्यान बार बार सुनील की आँखों पे जा रहा था उनमें एक ऐसी चमक सी थी जो उसने पहले कभी नही देखी थी, बहुत से सवाल विजय के मन में खड़े हो गये थे पर कुछ जवाब ना था, उसे इंतजार था उस पल का जब सुनील उसे सब कुछ बताता.

कार जब उस स्थान के पास पहुँची तो सुनील कार से उतरा, ' आप कार को यहाँ से 500 मीटर पीछे ले जाओ, और कुछ भी हो, कार से बाहर मत निकलना. मैं फिर कह रहा हूँ, कुछ भी हो कार से बाहर मत निकलना'

उस जगह से थोड़ी दूर सरक पे एक छोटा सा मंदिर था. सुनील उस मंदिर के सामने जा के बैठ गया और ध्यान लगाने लगा. विजय सुनील के कहे मुताबिक कार पीछे ले गया.

जैसे जैसे सुनील (सुनेल) का ध्यान गहरा होने लगा आसमान पे काले बादल छाने लगे बहुत जोरों की गड़गड़ाहट होने लगी और यकायक एक दम तेज बारिश शुरू हो गयी , जिसका नतीजा ये हुआ कि आपास्स जो मिट्टी के ढेर थे वो पानी में घुलने लगे. सुनील बिल्कुल भी विचिलित नही हुआ और तेज तूफ़ानी बरसात में यूँ ही ध्यान लगाए रहा. कार में बैठा विजय दूर से सब देख रहा था. बारिश इतनी तेज होने लगी थी कि वो कार से बाहर नही निकल सकता था. कुछ ही देर में बारिश थम गयी और सुनील के चारों तरफ एक सफेद धुआँ फैलने लगा वो धुआँ सुनील को उड़ा ले जाना चाहता था पर सुनील वहीं जमा रहा.

कुछ पलों बाद जब सुनील का जिस्म उखडने लगा तभी अचानक एक आकृति उभरी और सुनील के जिस्म में समा गयी. इधर ये आकृति उभरी उधर सुनेल का जिस्म बेजान हो गया पर कोई शक्ति अब भी उसके दिल की धड़कन को चला रही थी. डॉक्टर्स हैरान हो गये. सुनेल का जिस्म बरफ की तरहा ठंडा हो चुका था, जिस्म की सारी लाली गायब हो चुकी थी. सुनेल को कोमा में घोषित कर दिया गया, जिस्म बिल्कुल बेजान था पर दिल धड़क रहा था. और दिल की धड़कन भी गैर मामूली थी यूँ लगा रहा था अभी रुकी अभी रुकी. डॉक्टर्स ने कुछ जान बचाने वाले इंजेक्षन लगाए जिन से दिल की धड़कन बढ़ जाए , पर कुछ असर ना हुआ और डॉक्टर्स ने सब वक़्त पे छोड़ दिया.

यहाँ जैसे ही वो आकृति सुनील के जिस्म में समाई, सुनेल जो उस वक़्त सुनील के जिस्म में था उसे ताक़त मिल गयी और वो अपनी साधना में लीन रहा वो तुफ्फान और ज़ोर का उठा पर सुनील(सुनेल) का कुछ बिगाड़ ना सका.

काफ़ी उत्पात के बाद वो तूफान शांत हो गया एक सफेद धुएँ की लाकीर यकायक लूप्त हो गयी.

सुनील ने अपनी आँखें खोली और इधर उधर छानबीन करने लगा.

उसे प्रोफ़ेसर. का ब्रीफकेस मिल गया , लपक के उसने वो उठाया और बिजली की गति से दौड़ता हुआ विजय की तरफ भागा . विजय ने उसे आता देख कार स्टार्ट करी और सुनील के बैठते ही तूफ़ानी गति से वहाँ से निकल पड़ा.

सुनील ने ब्रीफ केस में से दो मालाएँ निकाली और विजय को दी. एक उसने वहीं उसी वक़्त विजय को पहनने को कहा और एक हॉस्पिटल पहुँच सुनेल को पहनाने को कहा फिर वो रास्ते में कहीं उतर गया और नज़दीक किसी शमशन घाट पे चला गया.

वहाँ पहुँच उसने वहाँ के करम चारी से एकांत में कोई जगह माँगी जहाँ उसे कोई तंग ना करे और उस स्थान पे जा कर वो बॅग में से डाइयरी निकाल के पढ़ने लग गया. जैसे जैसे वो डाइयरी पढ़ता गया उसके रोंगटे खड़े होते चले गये.

क्या था उस डाइयरी में , ????????????????????????
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07-20-2019, 10:01 PM,
RE: Hindi Kamuk Kahani वो शाम कुछ अजीब थी
कमरा कहो या हॉल क्म जगह सीलन से भरी थी और बहुत तेज दुर्गंध आ रही थी जैसे सेकड़ों मन मास के लोतड़े जल रहे हों सड़ रहे हों. और उसी हॉल के एक कोने में एक पत्थर की टीला सी थी जिसपे हाथ पैर से बँधी सवी लेटी हुई थी. इस वक़्त वो बेहोश थी उसके जिस्म में कोई हरक़त नही हो रही थी.

वहीं पास एक लंगड़ी आकृति खड़ी थी जो बहुत ही नफ़रत से उसे देख रही थी.

'अब पता चलेगा तुझे, जिंदगी कितनी कड़वी हो सकती है, मुझे छोड़ उस कुत्ते के साथ चली गयी थी, मेरी जान को मुझ से दूर कर दिया था, कोई नही बचेगा अब और तेरे सामने अपनी जान को पा कर रहूँगा यहीं तेरे सामने ...हा हा हा हा और तू मेरे गुलाम की दासी बनेगी हा हा हा हा' कमरे में भयानक हँसी गूंजने लगी जिसे सुन वो आकृति भी घबराने लगी जो सवी को यहाँ तक लाने की ज़िम्मेदार थी.

इधर सुनेल (सुनील के जिस्म में) ध्यान लगा के शमशान घाट में बैठा था, उसका रबता उस आत्मा से हो गया जो प्रोफ़ेसर की मदद करती थी, काफ़ी देर दोनो की बात हुई और सुनेल ने मानसिक तरंगों से विजय को एक स्थान का पता दिया और जल्द वहाँ पहुँचने को को कहा, विजय ने तुरंत अपनी कार घुमाई और उस तरफ चल पड़ा.

आवेश में सुनेल ये भूल गया था कि सुनील की आत्मा वापस अपने जिस्म में आ चुकी है और उसी ने उसकी मदद करी थी.

वो आत्मा जो प्रोफ़ेसर की मदद करती थी वो भी सुनेल के जिस्म में समा गयी और कुछ ही पलों में सुनील (सुनेल) वहाँ पहुँच चुका था जिस बिल्डिंग की बेसमेंट में सवी क़ैद थी.

वहाँ पहुँच वो उस बॅग से कुछ समान निकाल बिल्डिंग के चारों तरफ रखने लगा, वो आत्मा अब सुनील के जिस्म से बाहर निकल गयी थी और बिल्डिंग में घुस्स चुकी थी.

वो आत्मा जैसे ही अंदर घुस्सी, कमरे में फैली दुर्गंध ख़तम हो गयी और एक मनमोहक महक फैल गयी .

'न्न् नणन्नाआआआआहहिईीईईईईईईईईईईईईईईईईईईई ' वो लंगड़ी दिखने वाली आत्मा चिल्ला उठी और और विकास की आत्मा को राहत मिली वो दौड़ के उस आत्मा के कदमों में बैठ गया...

खट खट खट दो जिस्मों की बेड़ियाँ खुल गयी. सवी की और एक और लड़की की जिसे क़ब्ज़े में कर वो लंगड़ी आत्मा ने विकास की आत्मा को क़ब्ज़े में ले लिया था.

ये कैसे हुआ था ये एक अलग ही कहानी है, उस पर ना जाते हुए हम सिर्फ़ उन वक्यात पे ध्यान देंगे जो इस कहानी के लिए ज़रूरी है. आत्म हत्या जैसी हरकतें अच्छी आत्माओं को भी कमजोर कर देती हैं इसलिए विकास की आत्मा उस लंगड़ी आत्मा के वश में आ गयी थी.

वो आत्मा जो प्रोफ़ेसर की मदद करती थी उसे हम अगी नाम देते हैं. अगी के इशारे पे विकास अपनी चेतन बहन को उस हाल से बाहर ले गया और उसे सही ठिकाने पे पहुँचा लुप्त हो गया, उसका गन्तव्य वो स्थान था जिसके बारे में अगी ने उसे कहा था. ये आत्माएँ आपस में कैसे बात करती हैं ये तो बस वो सबको बनानेवाला ही जानता है.

खैर इनकी बातों का सार कुछ इस प्रकार था :

अगी : समर आत्मिक योनि में लंगड़ा प्रतिरूप पा कर भी तुझे अकल नही आई, फिर लग गया उसी कामक्षुदा को शांत करने में जिसकी वजह से तूने अपना मनुश्य जीवन कलंकित कर लिया, अब तयार होज़ा दोझक में जाने के लिए तेरा खेल ख़तम.


समर : हाहाहा (बड़ी भयानक हँसी हंसा वो) मैं अपनी इच्छा पूरी करके रहूँगा तू मुझे नही रोक पाएगा. इसका मैं पति था इंसानी रूप में इस्पे तो मेरा हक़ है ही मुझे तो सूमी को यहाँ लाना था वो बेवकूफ़ अपने ही प्यार के चक्कर में इसे ले आया. ख़तम कर दूँगा सुनील और उसके जुड़वा को फिर सुमन मेरी . हा हा हा हा रोक सकता है तो रोक के दिखा.

तभी विजय और सुनील ( सुनेल) अंदर दाखिल हो गये. समर का ध्यान भटका और अगी सवी के अंदर समा गया.

आत्महत्या की वजह से श्रापित विकास एक कमजोर आत्मा बन गया था जिसे समर ने आसानी से अपने क़ब्ज़े में ले लिया था और फिर उसी से उसकी बहन को भी बंदी बनवा अपने क़ब्ज़े में ले लिया, जब विकास के उपर से समर का सम्मोहन उतरा तो बहुत देर हो चुकी थी. समर जो कहता गया, विकास गाँव के सीधे साधे लोगो को क़ब्ज़े में कर वो सब पूरा करता गया. तामसिक क्रियाओं से समर की शक्ति बढ़ती चली गयी, उस हॉल में एक ओर शैतान की मूर्ति थी जहाँ समर अपने कार्य कलाप करता था.

अगी सब भाँप चुका था वो उसका और समर का युद्ध कोई आसान नही था. इस सारे सिलसिले में सवी एक कमजोर कड़ी थी क्यूंकी वो ब्यहता का जोड़ा पहन चुकी थी पर अभी तक उसकी सुहाग रात नही हुई थी.

समर ने असल में विकास को सूमी को क़ब्ज़े में करने को कहा था लेकिन वहाँ सवी को दुल्हन बनता देख विकास खुद पे काबू ना रख सका और उसने सवी को क़ब्ज़े में कर लिया, उसने सोचा सवी के साथ समर के लिए सूमी भी मिल जाएगी, पर वो यहीं मात खा गया, सुनेल बीच में टपक पड़ा और विकास को आगे कुछ करने का मौका नही मिला. उसने समर को बहकाने की कोशिश करी जो क्रोध में ढंग से सोच भी ना पाया और इससे पहले समर कुछ और विकास को करने के लिए बोलता अगी ने पहुँच विकास को उसके चुंगल से मुक्त कर दिया.

विकास अपनी बहन को सुरक्षित पहुँचा फिर वहीं पहुँच गया, अब जो भी हो उस पे अगी का असर पड़ चुका था और ये समझने में उसे देर ना लगी एक तरफ़ा प्यार एक तरफ़ा ही रहता है और प्यार बलिदान माँगता नही देता है.

समर की तामसिक और अगी की सात्विक शक्तियों में युद्ध चल रहा था, अगी ने समर को उलझा रखा था, विकास सुनेल और विजय को सवी के साथ वहाँ एक दूसरे कमरे में ले गया जो सुहाग रात की तरहा सज़ा हुआ था.
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07-20-2019, 10:01 PM,
RE: Hindi Kamuk Kahani वो शाम कुछ अजीब थी
विकास को नही मालूम था कि सुनील के जिस्म में सुनेल है.

विकास : बहुत बड़ा अनर्थ हो सकता है, मैं अपने किए की माफी माँगता हूँ. आप अपनी सुहागरात पूरी कीजिए वरना ....सवी की जान को बहुत बड़ा ख़तरा हो जाएगा.

ये सुन सुनील के अंदर बैठा सुनेल हिल गया.

'नही नही मैं नही --मैं इस पाप की दलदल में नही कूद सकता.'

सुनील की ये बात सुन विजय भोचक्का रह गया.

विजय : ये क्या बक रहे हो तुम, मैने तो सुना तुमने सवी से शादी कर ली.

सुनील (सुनेल) ... मैने नही सुनील ने की थी और वो कोई शादी थोड़े ही थी कि अंगूठी पहना दी और घर में कुछ मन्त्र माँ ने पढ़ दिए तो शादी हो गयी.

सवी अब होश में आ चुकी थी.'ये सब क्या बक रहो हो अब फिर कोई नया ड्रामा मत करना मेरे साथ'

सुनील (सुनेल) : मासी मैं कोई ड्रामा नही कर रहा, ये तो किस्मत अच्छी थी जो अगी का साथ मिल गया जो इस वक़्त समर से अंदर जूझ रहा है, मैं सुनील नही सुनेल हूँ , मुझे सुनील के जिस्म का सहारा लेना पड़ा, क्यूंकी मेरा जिस्म घायल हो चुका था और मैं कुछ नही कर सकता था, सुनील के बस का नही इन आत्माओं से लड़ना. मैने उसके जिस्म पे क़ब्ज़ा कर लिया और उसे मजबूर कर दिया मेरे जिस्म में जाने के लिए. जब सब ठीक हो जायगा, मैं वापस अपने जिस्म में चला जाउन्गा.

विजय और सवी उसे आँखे फाडे देखते रहे.

विकास : बहुत कम वक़्त है जो करना है जल्दी करो, मैं अंदर जा रहा हूँ.

इतना कह विकास वहाँ से गायब हो गया.

सुनील (सुनेल) : मासी विजय जी आपका पहला प्यार हैं, वक़्त ने इन्हें आपसे दूर होने पे मजबूर कर दिया, उसकी इतनी बड़ी सज़ा इन्हें मत दो, और सुनील को मैं समझा दूँगा.

इतना कह सुनील ( सुनेल) भी वहाँ से बाहर निकल आया.

कमरे में विजय और सवी रह गये.

सुनील ( सुनेल) ने बाहर निकल कमरे को बाहर से बंद कर दिया.

विजय और सवी दोनो का सर चकरा रहा था कि ये सब क्या हो रहा है. विकास के बारे में तो सवी जान चुकी थी , पर समर, उसका तो सोच के ही हिल के रह गयी वो.

समय आ गया था बलिदान करने के लिए, सवी जिंदगी के हर पहलू को सोचने लगी, शायद किस्मत में सुनील का प्यार लिखा ही नही था, अगर ये लड़ाई ज़्यादा चली तो कहीं सुनील को कुछ ना हो जाए जो इस वक़्त सुनेल के जिस्म में है. फिर रूबी,,,,,सोनल....सूमी ..इनका क्या होगा.

सवी ने अपना सर झुका लिया, विजय क्या तुम.....

विजय भी हालत को समझ चुका था.

विजय : लेकिन ये तो मजबूरी का सोडा होगा

सवी : क्या और कोई रास्ता है हमारे पास.

विजय : नही.....पर .....

'अबे ओ समाज सुधारक, राजा हरीश चन्द्र की अनदेखी औलाद'

सुनील ( सुनेल) चकरा गया ये आवाज़.

'ऐसे क्या उदबीलाव की तरहा नज़रें घुमा रहा है, खुद को नही पहचानता क्या?'

'तुम तुम !'

'ये तुम तुम क्या ! हां क्या नॉतंकी करी तूने अंदर सुनील की शादी सवी से नही हुई, लंडन में क्या कुछ नही सीखा था अपनी संस्कृति के बारे में, अगर नही मालूम तो...'

'वो तो मैं अपना एक रिश्ता बचाना चाहता था, क्या इसका भी मुझे कोई हक़ नही'

'हां कोई हक़ नही, किसी की पूरी जिंदगी दाव पे लगाने का, क्यूँ मजबूर कर के आया सवी को विजय की बनने के लिए, ये जानते हुए भी कि वो सिर्फ़ सुनील से प्यार करती है, क्या सारी जिंदगी उसने तड़पना ही है क्या, क्या दिल से वो विजय की हो पाएगी, इससे अच्छा तो मरने देता उसे, एक बार में काम ख़तम'

'नही नही , उफ्फ मैं क्या करूँ'

'वही कर जो तुझे करना चाहिए---- जा सुनील को आज़ाद कर अपने जिस्म से यहाँ अगी संभाल लेगा'

'ह्म्म'

उसी वक़्त सुनील का जिस्म धडधडाता हुआ गिरा और सुनेल वापस अपने जिस्म में पहुँच सुनील को आज़ाद कर देता है, सुनील की आत्मा वापस अपने जिस्म में.

सुनील को सब पता चल रहा था की सुनेल क्या कर रहा है. लेकिन जब वो वापस अपने जिस्म में पहुँचा तो सोचने लग गया, क्या सवी को विजय की बनने देना चाहिए.

तभी उसकी नज़रों के सामने तीन क्रोधित चेहरे आ गये सूमी, सोनल और रूबी, और सुनील के कदम उस कमरे की तरफ बढ़ गये जहाँ विजय और सवी थे. विजय अभी भी पेशो पश में था.

सुनील : विजय अंकल आपका बहुत शुक्रिया इतना साथ देने के लिए, आप तुरंत हॉस्पिटल के लिए निकल जाइए, वहाँ आपकी ज़रूरत पड़ने वाली है'

सवी : सुनिल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल ( चीखती हुई सुनील के गले लग गयी

विजय सुनील की आवाज़ पहचान गया था और कुदरत के इस खेल पे हैरान होता हुआ हॉस्पिटल की तरफ निकल पड़ा.

इस से पहले की विजय ज़्यादा दूर होता, सुनील ने आवाज़ दे कर उसे रोका और सवी को साथ ले जाने को कहा क्यूंकी यहाँ अभी ख़तरा था.

सवी विजय के साथ हॉस्पिटल चली गयी और सारा रास्ता यही सोचती रही कि जो हुआ क्यूँ हुआ, उसका उसकी जिंदगी से क्या मतलब था, इस सबका उसकी आनेवाली जिंदगी में क्या प्रभाव पड़ने वाला था. एक बात की उसे दिल्ली तसल्ली हुई के उसे विजय की नही बनना पड़ा. सच्चे प्यार में वाकई में ताक़त होती है, ये उसने आज महसूस कर लिया था और उसका प्यार अब सुनील के लिए और भी दृढ़ हो गया था. चाहे जान चली जाए, अब सुनील का साथ कभी नही छोड़ेगी और ना ही उसकी जिंदगी में कोई उथल पुथल होने देगी. प्यार एक सागर है, बस उसमें गोते लगाते रहो और प्यार बिखेरते रहो. उसकी आँखों के सामने सागर की हँसती हुई छवि आ गयी और सवी के चेहरे पे भीनी भीनी मुस्कान तैर गयी.
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07-20-2019, 10:01 PM,
RE: Hindi Kamuk Kahani वो शाम कुछ अजीब थी
सुनील सवी और विजय के जाने के बाद जब उस कमरे में घुसा तो वहाँ शोले भड़क रहे थे, विकास एक तरफ सर झुकाए खड़ा था और अगी की आकृति पूर्णतया लाल सुर्ख थी ऐसी जैसे अभी उसकी आकृति से अगी के शोले निकलें हों जिनमें समर की आत्मा झूलुस रही थी और मुक्ति द्वार की तरफ प्रस्थान कर रही थी. वो मुक्ति द्वार अगी ने उसे दिया था अन्यथा ना जाने कितने जन्मों तक वो पटल नगरी में रहता.

अगी की काया धीरे धीरे शांत होने लगी और जाने से पहले वो सुनील के चारों तरफ घूमी और सुनील को कोई शक्ति देती हुई चली गयी, जिसकी शायद सुनील को भविश्य में ज़रूरत पड़ने वाली थी.

विकास को अपनी मुक्ति के लिए अभी इंतजार करना था, वो अगी के साथ जुड़ लिया और सुनील एक ठंडी साँस छोड़ता हुआ हॉस्पिटल की तरफ बढ़ चला.

जिंदगी का एक कड़वा अध्याय पूरा हो गया था, सुनील को अब सुनेल और मिनी की चिंता होने लगी.

सुनील जब हॉस्पिटल पहुँचा तो सुनेल को होश आ चुका था और वो दर्द से कराह रहा था.

सुनील जब सुनेल से मिला तो सुनेल के चेहरे पे दर्द के भाव थे जो जिस्मानी दर्द के नही कुछ और ही ब्यान कर रहे थे.

सुनील : भाई तूने कुछ नही खोया, तेरे लिए सब रिश्ते वही हैं जो तू चाहता है जिनसे तू मिलना चाहता था, हां मेरे रिश्ते बदल गये, क्यूँ बदले कभी फ़ुर्सत में बताउन्गा, और मेरे लिए भी इस रास्ते पे चलना आसान नही था. जिस दर्द के सागर को मैने लाँघा है वो मैं और सूमी ही जानते हैं, तेरे लिए सूमी तेरी वो माँ है जिससे तू बचपन में बिछड़ गया था. अब जल्दी ठीक हो जा तेरी माँ तेरा इंतजार कर रही है.

सुनेल ने कुछ बोलना चाहा पर दर्द ने ज़ुबान का साथ नही दिया और उसकी आँखों से आँसू टपक पड़े.

तभी विजय अंदर आया.

विजय : अब ये दोनो ख़तरे से बाहर हैं, मिनी को कभी भी होश आ जाएगा. तुम घर जाओ मैं यहाँ देख लूँगा, घर पे सुमन जी बहुत परेशान हो रही होंगी.

विजय की बात अभी ख़तम ही नही हुई थी कि कमरे में राजेश और कविता आ गये, कविता दौड़ के सुनील के गले लग गयी, बड़े गंदे हो, बिना मिले जाओगे.

कविता सुनील से गले लग अपने शिकवे कर रही थी.

विजय : बहू छोड़ उसे अभी उसे जाने दे फिर आएगा, और तेरा दूसरा भाई भी तो यहाँ है.

तब कविता की नज़र सुनेल पे पड़ी तो पलकें झपकाना भूल गयी, उसने सुनेल के बारे में सुना था पर कभी मिली नही थी.
कभी वो सुनील को देखती और कभी सुनेल को.

सुनील : अरे चल बाहर इसे अभी आराम करने दो, मिलती रहना, और मैं जल्द वापस आउन्गा, जब सुनेल ठीक हो जाएगा तो सब एक साथ छुट्टी मनाने चलेंगे.

सब बाहर आ गये, और सुनेल आँखें बंद कर सोचने लगा अभी कितने दिन इस बिस्तर पे रहना पड़ेगा कब वो तसल्ली से अपनी माँ और बहन से मिलेगा. कविता का सुनील को भाई कहना भी उसे अजीब लगा था क्यूंकी वो कविता के बारे में नही जानता था.

एक पूरा इतिहास था जिसे उसे जानना था, जिसके बारे में उसे कोई इल्म नही था, अब वक़्त उसे कितना बताता है और कब बताता है, ये तो वक़्त ही जानता है.

सुनेल को धीरे धीरे नींद ने घेर लिया और क्यूंकी कार तो स्वाहा हो चुकी थी सुनील सूमी को फोन करने के बाद, फ्लाइट से घर की तरफ चल दिया, रास्ते भर सवी अपनी आने वाली जिंदगी के सपने बुनने लगी.


सुनील सवी को लेकर सीधा घर पहुँचता है और सूमी और सोनल उसके साथ लिपट जाती हैं, अब शर्म नाम की चीज़ ख़तम हो चुकी थी क्यूंकी घर में रहने वाली चारों औरतें उसकी बीवी ही थी, फिर एक दूसरे से क्या शरमाना, और सुनील की जुदाई वो दर्द भरे ख़यालात , सबने सूमी और सोनल को जैसे तोड़ ही डाला था, दोनो सुनील से ऐसे लिपटी जैसे अब कभी अलग नही होंगी और उसके जिस्म के अंदर ही समा जाएँगी.

कुछ देर बाद.

रूबी : अरे अब तो छोड़ो कुछ देर इन्हें आराम तो करने दो, और आज तो सवी दीदी की सुहागरात होगी, जो मुकम्मल ना हो सकी पहले.

सूमी तो सुनील को छोड़ देती है पर सोनल नही और सबके सामने सुनील को स्मूच करने लगती है, सुनील भी उसे अपनी बाँहों में कस लेता है, सोनल के साथ उसे एक अजीब सा सकुन मिलता था.

सूमी : अच्छा सुनो अब सब लोग, अब हम यहाँ नही रहेंगे, या तो हम ये देश छोड़ देंगे या वहाँ जा के रहेंगे जहाँ हमे कोई ना जानता हो, पैसे की कोई कमी तो है नही और सब डॉक्टर हैं तो अच्छी कमाई फिर भी हो जाएगी, क्यूँ ना केरला के किसी बीच पे अच्छा सा घर खरीद के वहीं रहें.

सवी की आँखों के सामने कोचीन के मनमोहक नज़ारे घूमने लगे जिनका वो कभी लुत्फ़ नही उठा पाई थी. लेकिन अगर बिल्कुल ही सकुन की जगह और प्रकृति के बिल्कुल पास देखनी हो तो कन्याकुमारी से बढ़िया कोई जगह ना थी, जहाँ तीन समुद्रों के मिलाप को देखा जा सकता था, कितनी शांति होगी वहाँ पे, जहाँ विवेकानंद रॉक है.

सवी के मुँह से निकल ही गया देश छोड़ने से अच्छा क्यूँ ना कन्याकुमारी चलें, बीच के पास कोई घर और फिशिंग फार्म हाउस लेलेंगे मज़ा आएगा.

सोनल एक दम सुनील से अलग हुई, 'अरे वह ये करी ना पते की बात'

सुनील : सब्र बाबा सब्र, पहले सुनेल को ठीक तो होने दो.

सूमी/सोनल एक साथ तो जब तक वो ठीक होता है हम मुंबई रहेंगे, अब यहाँ नही रहना.


सुनील अच्छा यार जो कहोगी वही होगा अब कुछ खिला दो बड़ी भूख लगी है.

रूबी : आप फ्रेश हो जाओ मैं अभी लेके आई,

सुनील सोनल और सूमी के साथ कमरे में चला गया. सवी भी फ्रेश होने चली गयी.

फ्रेश होने के बाद सबने खाना खाया.
सुनील ने फिर विजय को फोन किया और हॉस्पिटल के पास एक घर किराए पे लेने को कहा. विजय का घर बहुत बड़ा था, वो एक दम बिदक गया किराए की बात सुन, और बहुत नाराज़ हुआ. सुनील और सूमी ने उसे समझाने की कोशिश करी कि बेटी का मामला है उसकी ससुराल में कैसे ...तब कविता ने विजय से फोन लिया और सुनील को खूब खरी खोटी सुनाई तब कहीं जा कर सुनील माना और फिर दो दिन बाद मुंबई का प्रोग्राम फिक्स हो गया.

खाना खाने के बाद सुनील चुप चाप कमरे में जा कर लेट गया और इधर रूबी खुशी से सवी के कमरे को सजाने में लगी थी कि सवी ने उसे रोक दिया.

सवी : ना रूबी ये सब मत कर, अभी उनका मूड ठीक नही है और ऐसे में...

रूबी : उफ्फ या तुम भी, तुम्हारा हक़ है अब तो

सवी : हक़ ज़बरदस्ती नही लिया जाता पगली, जब प्यार हो जाता है तो जिस्म की शुदा इतनी नही रहती, वो वक़्त भी आ जाएगा, अभी वो बाहुत परेशान होंगे उन्हें इस वक़्त सूमी या सोनल की ही ज़रूरत होगी, ऐसे में मैं अपना हक़ जताऊ ये ठीक नही, प्यार को बहने दो, उसे कभी बाँधने की कोशिश मत करना. जितना तुम प्यार को आज़ादी दोगे उतना ही वो खुद तुम्हारे पास आएगा.

रूबी : ओह गॉड! यहाँ तो सभी फिलॉसफर बन गये हैं. ठीक है करो देर और मुझे भी तडपाओ.

सवी : ओह हो तो असल बात ये है, बन्नो को बड़ी जल्दी है अपने साजन की बाँहों में जाने की.

रूबी : क्यूँ नही होनी चाहिए क्या, कसम से नींद गायब हो चुकी है, आँखें बंद करती हूँ तो वही नज़र आते हैं, और और और...

सवी : और ( सवी अपनी आँखें मटकाती हुई पूछती है)

रूबी : धत्त बड़ी बेशर्म हो गयी हो ( चेहरे पे गुलाबी पन छा गया और दिल की धड़कन बढ़ गयी)

सवी : होता है बन्नो, जब सुहागरात के दिन नज़दीक आते हैं तो दिल में बस साजन की छवि ही रहती है.

रूबी : हाई आपको तो सुहागरात का एक्सपीरियेन्स भी है, बताओ ना क्या क्या होता है....

सवी : अच्छा जैसे तूने तो कभी कुछ किया ही नही जैसे.

रूबी का चेहरा उतर गया और वही पुरानी टीस जो रमण से उसे मिली थी मुँह खोल के फिर खड़ी हो गयी, उसकी आँखों में नमी आ गयी....

रूबी : काश काश वो सुहागरात ही होती पर पर वो तो...
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07-20-2019, 10:01 PM,
RE: Hindi Kamuk Kahani वो शाम कुछ अजीब थी
सवी को अपनी ग़लती का अहसास हो गया अंजाने में उसने रूबी के घाव हरे कर दिए थे.

सवी : उफ्फ सॉरी जान बस ऐसे ही मुँह से निकल गया भूल गयी थी कि तेरी माँ भी हूँ, नये रिश्ते ने कुछ ज़्यादा ही मुँह फाड़ दिया मेरा.

सवी रूबी को गले लगा उसे चूमने लगी और बार बार माफी माँगने लगी.

रूबी : अतीत का दर्द पीछा नही छोड़ता कभी ना कभी चोट कर ही देता है.

सवी : भूल जा उसे बुरा सपना समझ अब तो तेरी नयी जिंदगी शुरू होनेवाली है, सुनील तुझे बहुत खुश रखेगा.

रूबी : इसी आस पे तो जिंदा हूँ, वरना कब का जिंदगी से दामन छुड़ा लिया होता.

सवी : ना मेरी जान ऐसा नही बोलते, मुस्कुरा दे अब, वरना मैं खुद को कभी माफ़ नही कर पाउन्गि.

रूबी हँसने की कोशिश करती है लेकिन उसकी रुलाई निकल पड़ती है.

वहाँ कमरे में बिस्तर पे लेटे सुनील को कुछ अजीब सा महसूस होता है, ऐसा लगता है जैसे कुछ ग़लत हुआ है. वो उठ के बैठ जाता है.

सोनल : क्या हुआ?

सुनील : ह्म्म कुछ नही , बस कुछ अजीब सा फील हुआ था.

सोनल : मैं कहने ही वाली थी, आप सवी के पास जाओ, इस वक़्त उसे आपकी ज़्यादा ज़रूरत है.

सूमी : हां ये ठीक कह रही है, बेचारी ने अभी कितना भुगता है, उसे इस वक़्त तुम्हारे साथ की सकत ज़रूरत है. बस एक बार रूबी की भी तुमसे शादी हो जाए तो फिर एक बड़ा ही कमरा बनवाएँगे जिसमे हम सब एक साथ सो सकें आराम से.

सुनील हैरानी से सूमी को देखने लगा.

सूमी : अरे हैरान होने की क्या बात है, सब बीवियाँ क्या एक कमरे में नही रह सकती.

सुनील : आराम से सोचना क्या कहा अभी तुमने, खुद ही माना कर दोगि.

सोनल : अभी तो आप जाइए इस विषय पे बाद में बात करेंगे.

सूमी : हां जी जाइए पर कल आप मेरे साथ रहेंगे रात को.

सुनील : एक ही कमरे में सो जाएँगे ना हॉल में बिस्तर लगवा लेंगे कोई परेशानी भी नही होगी

इतना कह सुनील मुस्काता हुआ कमरे से निकल सवी के कमरे की तरफ बढ़ गया, दरवाजा खुला ही था और उसे रूबी नज़र आ गयी जिसे सवी संतावना और प्यार देती हुई बार बार माफी माँग रही थी.

सुनील : क्या हुआ?

सवी : जी वो बस मैं ही पागल हूँ इसके जखम हारे कर दिए अंजाने में.



सुनील के मन में अब सारे सवाल जवाब ख़तम हो चुके थे. सवी के साथ जो हादसा हुआ जिसमे प्रोफ़ेसर. की जान तक चली गयी, उसने जिंदगी के मतलब ही बदल डाले थे. आज तक वो मर्यादा की दीवारों से लड़ता रहा था, पर आज एक सबक सीख गया था, किस्मत में जो होना है वो हो कर रहता है, इंसान चाहे कितनी कोशिश कर ले, वो होनी को नही टाल सकता, आज सुनील के दिमाग़ में वो दिन गूंजने लगे, जब पहली बार सवी ने एक साली होने के नाते - साली आधी घरवाली की बात करी थी, उसके दिमाग़ में रूबी का वो प्यार गूंजने लगा जिसने कभी कोई आशा नही करी बस दिल ही दिल में प्यार करती रही, जिसके लिए सवी की खुशी ज़्यादा ज़रूरी थी.

दिमाग़ की सभी परतें खुल चुकी थी, अब जिंदगी को आगे बढ़ाना था, जो होना है उससे क्या लड़ना.
सुनील ने आगे बाद दोनो को अपनी बाँहों में समेट लिया. ' बस अब तुम दोनो मेरी हो, मेरी ज़िम्मेदारी हो.'

दोनो सुनील से ऐसे चिपकी जैसे अभी उसके बदन में समा जाएँगी.

सुनील दोनो के गालों पे चुंबन बरसाने लगा जो एक मरहम की तरहा दोनो की रूह को सकुन पहुचाने लगी.

सवी ने इस बात की परवाह ना करते हुए कि रूबी साथ चिपकी पड़ी है अपने पलकें गिरा अपने होंठ सुनील के आगे कर दिए और सुनील ने भी उसकी इच्छा का मान करते हुए अपने होंठ सवी के होंठों से जोड़ दिए.
रूबी सुनील से चिपकी उसकी छाती पे हाथ फेरती हुई अपना चेहरा उसकी छाती से रगड़ने लगी.


कुछ देर बाद सुनील दोनो से अलग हुआ.

सुनील : पॅकिंग कर लो, शायद हम लोग कल ही शिफ्ट करें.

सवी : कहाँ शिफ्ट हो रहे हो.

सुनील : कुछ दिन तो मुंबई ही रहेंगे ताकि सुनेल और मिनी को देख सकें फिर जैसा तुम सब लोग फ़ैसला करो, अपना देश छोड़ के जाने का दिल नही करता सोच रहा हूँ या तो समुद्र की लहरों के पास या फिर पर्वतों की गोद में जहाँ सकुन हो दूर दूर तक प्रकृति की गोद हो.

सवी : कुछ समय तक तो थी है पर बच्चों की पढ़ाई भी तो देखनी है, कहीं इतनी दूर मत जाने का सोच लेना कि फिर से शिफ्ट करने की नौबत आए.

सब लफडों में सुनील ये तो भूल सा ही गया था, एक हुक सी उठ गयी बाप के दिल में, आँखें बंद कर सागर को याद करने लगा.

सवी उसकी परेशानी समझ गयी.

सवी : जैसा तुम चाहो, वक़्त सब ठीक कर देगा. ऐसा क्यूँ नही करते, छुट्टियाँ पहाड़ों पे और बाकी समय समुद्र के पास.

सुनील : सब मिल के डिसाइड कर लेंगे.

रूबी : मैं चलती हूँ.

सुनील ने रूबी को अपनी बाँहों में खींच लिया और उसके होंठों पे अपने होंठ चिपका दिए.

रूबी सुनील की बाँहों में कसमसाने लगी, सवी के सामने उसे शरम आ रही थी और सुनील उसकी यही शरम ख़तम करना चाहता था.

ज़्यादा देर नही लगी रूबी को सुनील की बाँहों में पिघलने में, जिस्म का तापमान बढ़ने लगा और वो सुनील से चिपकती चली गयी.
दोनो को देख सवी को कुछ अजीब लगा, उसकी बेटी उसके सामने ही चुंबन में खोई हुई थी, फिर सवी को झटका लगा सुनील तो दोनो का पति है.

क्या ये सही होगा माँ को बेटी के सामने और बेटी को माँ के सामने यूँ प्यार करना. सवी के दिमाग़ में उलझने शुरू हो गयी. क्या ये सही होगा कि माँ और बेटी एक ही इंसान को प्यार करें एक के साथ ही हमबिस्तर हो जाएँ.

सवी के अंदर बची मर्यादा अपना सर उठाने लगी.

सुनील सब देख रहा था, यही दीवार उसे ख़तम करनी थी, क्यूंकी कल उसकी चार बीवियाँ अगर अलग अलग वक़्त माँगने लग गयी तो उसका बॅंड बजना निश्चित था, वहीं दूसरी तरफ वो खुद सोच में पड़ गया था, क्या चार को वो संभाल पाएगा, कहीं वो को ग़लत रास्ता तो नही ले रहा, सूमी और सोनल तो मरते दम कुछ ग़लत नही करेंगी, पर सवी और रूबी, ये कहीं ग़लत रास्ते पे चल पड़ी तो, ये सोच के ही वो हिल गया और उसका और रूबी का चुंबन टूट गया.

सुनील के चेहरे के भाव बदल चुके थे, जिन्हें रूबी ने महसूस कर लिया, सवी तो अपने सवालों में उलझी हुई थी.

रूबी : क्या सोचने लगे आप, यही ना की 4 बीवियाँ आपस में लड़ पड़ी तो क्या होगा.

सुनील हैरानी से रूबी को देखने लगा, उसने ख्वाब में भी नही सोचा था कि रूबी ये सब सोचेगी.

रूबी : ऐसे क्या देख रहे हैं, जो मैने कहा सच है ना. क्या कभी सूमी और सोनल दी में झगड़ा हुआ? फिर आप ये कैसे सोचने लग गये कि हमारे साथ जुड़ने से झगड़े होंगे. नही कोई झगड़ा नही होगा और इसकी एक खांस वजह है. अगर हम 4 अलग अलग घराने से होती तो जाहिर था कि हर कोई अपना हक़ ज़्यादा जताता, लाज़िमी झगड़े होते. पर हम तो एक ही परिवार की कड़ियाँ हैं जो एक सुत्र में पिरोइ जा रही हैं, फिर झगड़ा कैसा. आप बेफिक्र रहिए, हम लोगो का प्यार आपस में और मजबूत होगा, झगड़े की तो कोई गुंजाइश ही नही.
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07-20-2019, 10:01 PM,
RE: Hindi Kamuk Kahani वो शाम कुछ अजीब थी
सुनील के दिमाग़ में जितने सवाल उठ रहे थे वो पल में धराशायी हो गये. रूबी की परिपक्व सोच ने सुनील को और आतम्बल दे दिया. उसके चेहरे पे मुस्कान दौड़ गयी और रूबी का चेहरा भी खिल उठा, रूबी की बात सुन सवी भी यथार्थ में वापस आ गयी और उसकी दुविधाएँ भी जैसे दूर हो गयी थी. रिश्ते बदल चुके थे चाहे उनकी बुनियाद अब भी बाकी थी, यही बुनियाद इन्हें और भी करीब लाएगी, सवी के चेहरे पे भी मुस्कान आ गयी.

सवी : आप जा के दीदी के पा सो जाइए, उन्हें आपकी ज़्यादा ज़रूरत है.

सुनील ने दोनो को चूमा और सूमी के पास चला गया. सोनल सो चुकी थी, पर सूमी जाग रही थी, जैसे वो जानती थी कि सुनील आएगा.

सुनील उसकी बगल में लेट गया और उसे अपनी बाँहों में भर लिया.

सूमी उसके होंठों से अपने होंठ रगड़ते हुए बोली, 'सुनो हमे मुंबई छोड़ के तुम सवी और रूबी के साथ मालदीव चले जाओ, वहीं शादी भी रजिस्टर करवा लेना.और अच्छी तरहा हनिमून मना के वापस आना.'


सुनील : लेकिन सुनेल ....

सूमी : उसके लिए हम सब हैं ना, तुम जाओ मुझे कुछ वक़्त उसका साथ मिल जाएगा, उसे सब समझा दूँगी, ताकि उसके दिमाग़ में जो गुत्थियाँ हैं वो सुलझ जाए.

सुनील : ह्म्म शायद तुम ठीक ही कह रही हो. तो कल सुबह ज़रूरी पॅकिंग कर लेना शाम की फ्लाइट से चलते हैं.

दोनो एक दूसरे की बाँहों में सिमट के सो गये.

अगले दिन, सभी ज़रूरी समान के साथ विजय के घर मुंबई पहुँच गये. विजय और आरती ने दिल खोल के सबका स्वागत किया.
राजेश और कविता भी पीछे नही रहे , कविता तो बस बच्चों के साथ चिपक सी गयी.

सुनील एक बार सुनेल और मिनी से हॉस्पिटल में मिला और फिर वो सवी और रूबी को ले मालदीव के लिए निकल गया.
उसके जाते ही आरती के मन में जो आस का एक दिया अब भी जल रहा था वो भुज गया. सब होनी का खेल था जिसके आगे कोई कुछ नही कर सकता था.

सुनील वगेरह जब मालदीव पहुँचे तो रात हो चुकी थी और लगातार सफ़र की वजह से तीनो थक भी गये थे, सुनील ने इस बार एक दूसरा होटेल ही बुक किया था पर वो भी 5* लग्षुरी और वॉटर बंग्लॉ था, सवी और रूबी तो बंगलो पहुँच खिल गयी थी, उनके लिए तो ये दिन में जैसे ख्वाब देखना था.

इस बार भी सुनील ने दो बेडरूम वाला वॉटर बंग्लॉ बुक किया था, जिसका अपना स्विम्मिंग पूल भी था.

अगले दिन, जब तीनो उठे तो ब्रेकफास्ट के बाद सुनील ने दोनो को शॉपिंग पे चलने के लिए कहा पर रूबी ने मना कर दिया, कि वो बाद में जाएगी, आज तो वो अपनी देख रेख में सवी की सुहाग्सेज सजवाना चाहती थी, सवी के गाल लाल सुर्ख हो गये जब रूबी ने एक दम ये बात बोली, सुनील दूसरी तरफ मुँह कर मुस्कुराने लगा था.
खैर ये दोनो शॉपिंग के लिए निकल गये और रूबी ने अपने सामने अपनी देख रेख में बंग्लॉ को सजवाया.

जब सुनील और सवी वापस पहुँचे उस वक़्त रूबी पूल में मचलती हुई शॅंपेन के घूँट लगा रही थी और दूर तक फैले समुद्र को निहार रही थी.





रूबी को पूल में मचलता देख सुनील को सोनल के साथ बिताए पल याद आ गये, होंठों पे मुस्कान लिए उसने शॉपिंग बॅग्स वहीं हाल में पटके और कपड़े उतार अंडरवेर में पूल में कूद गया, रूबी जिसका ध्यान समुद्र की तरफ था एक दम चोन्कि और चीख पड़ी.

सुनील ने उसे अपने बाँहों में ले लिया 'अरे अरे मैं हूँ'

रूबी का दिल जोरों से धड़क रहा था.

'हाई राम कितने गंदे हो, मेरी तो जान निकाल दी'

'शॅंपेन अकेले नही पी जाती जानेमन' सुनील ने उसके हाथ से जाम ले लिया और एक घूँट में खाली कर दिया.

रूबी : आह छोड़ो बहुत काम करना है, आपकी दुल्हन को सजाना भी तो है.

सुनील : दुल्हन तो दोनो ही हैं तुम भी सज जाओ( बोलते हुए सुनील ने आँख मार दी)

रूबी : छी बेशर्म, आज की रात सवी के नाम है आपकी मेरे तो नज़दीक भी ना आना.

सुनील ने उसकी गर्दन पे अपनी ज़ुबान फेरी ' सच में यही चाहती हो'

रूबी : प्लीज़ क्यूँ मेरी हालत बिगड़ रहे हो.

सुनील : तुम भी रेडी हो जाओ, मैं कुछ नही सुनूँगा.

तभी वहाँ होटेल से दो ब्यूटीशियन पहुँच गयी थी सवी को तयार करने.

सुनील : दो और बुलवा लो, सारा समान बॅग्स में है मैं अभी कुछ देर में आता हूँ.

रूबी भौचक्की सी सुनील को देखती रह गयी और सवी को दोनो लड़कियाँ अंदर ले गयी. सवी ने ही उन्हें कह दो लड़कियाँ और बुलवा ली.

सुनील ने कपड़े पहने और वो बोट से होटेल की लॉबी की तरफ चला गया, अगले दिन उसने रिजिस्ट्रार के ऑफीस में सवी के साथ शादी की रिजिस्ट्री का जुगाड़ किया और काफ़ी देर तक वो सूमी और सोनल से बात करता रहा, सोनल उसे बात बात पे छेड़ रही थी और सुनील दोनो को मालदीव आने की दुहाई दे रहा था. दोनो ने ही सॉफ मना कर दिया , ये हनिमून सवी और रूबी का था इसमें वो नही आएँगी , अगली छुट्टी सभी साथ मिलके बिताएँगे.

सुनील ने सुनेल और मिनी की भी खैर खबर ली और जब वो अपने बंग्लॉ वापस पहुँचा तो चारों लड़कियाँ तभी बाहर निकली थी, सुनील ने दोनो को देखा तो पलकें झपकाना भूल गया.

'कैसी हसीन आज बहारों की रात है, एक चाँद आसमान पे है दो मेरे साथ हैं' अपने आप ही सुनील के मुँह से ये अल्फ़ाज़ निकल गये, आँखें थी कि हुस्न को पिए ही जा रही थी, अजीब सी मुश्किल थी एक शोला थी और एक शबनम, शोला उमँगो का जवरभाटा उन्फान ला रही थी और शब नाम नशे के आलम में पहुँचा रही थी. किसके पहलू में पहले जाए ये नोबत आ जाएगी ये तो उसने ख्वाब में भी नही सोचा था.

उसकी दुवीधा को भाँप रूबी ही बोली, 'आपके हुकुम का मान रख लिया' मैं चली दूसरे कमरे में ये रात सवी की है प्लीज़ और कुछ मत बोलना.

सुनील जैसे ख्वाबों की दुनिया से ज़मीन पे आ गिरा. जहाँ सवी में सूमी की परछाई थी वहीं रूबी में सोनल का पुट था.

'हाई वो कतल भी करते हैं और हाथ में तलवार भी नही, कहाँ चली मेरी जान' सुनील ने जाती हुई रूबी का पल्लू पकड़ लिया.

रूबी लरजती हुई सुनील की बाँहों में सिमट गयी और सवी पलकें झुकाए सुहाग्सेज पे बैठी धड़कते दिल से आनेवाले पलों का इंतजार कर रही थी.

सुनील ने रूबी की गर्दन पे अपने होंठ रख दिए तो रूबी तड़प सी गयी अपनी सुहाग रात के लिए उसने बहुत कल्पनाए कर रखी थी, बहुत से सपने सॅंजो के रखे थे, उसे यूँ लगा जैसे उसके सारे सपने आज धूल में मिल जाएँगे.

रूबी : आह ! सिसकते हुए बोली 'प्लीज़ कुछ मांगू आज आपसे'

सुनील उसकी गर्दन पे अपनी ज़ुबान रगड़ते हुए बोला ' तुम्हें पूछने की ज़रूरत कब्से पड़ गयी, दिल खोल के बोलो'

रूबी कुछ पल सोचती रही कि बोले या ना बोले, कहीं सुनील नाराज़ ना हो जाए, फिर हिम्मत कर बोल ही बैठी...

'प्लीज़ आज की रात सिर्फ़ सवी के नाम कर दो ना' रूबी ये ना बोल पाई कि वो अपनी सुहागरात अपने साजन के साथ अकेले मानना चाहती थी लेकिन सुनील उसका इशारा समझ गया.

सुनील उससे अलग हुआ उसका चेहरा अपने हाथों में थाम उसे देखने लगा.

रूबी ने अपनी पलकें झुका ली लेकिन उन पलकों के झुकने से पहले रूबी की आँखों ने सुनील को उसकी आँखों में बसे सपनों से रूबरू करवा दिया, उन आँखों में एक इल्तीज़ा थी, एक आस थी, एक पुकार थी, एक तड़प थी.

सुनील : जो तुम चाहती हो वैसा ही होगा, मैं खुद को तुम पर थोपना नही चाहता.

तड़प के रह गयी रूबी उसकी पलकें यूँ उठी जैसे कमरे में भूचाल आ गया हो....'ये ये...आप...आप ...' आँसू टपक पड़े रूबी के.


सुनील : पगली मैं तो बस इतना ही कह रहा था जैसे तुम चाहो, क्या सोचने लग गयी.

सुनील ने रूबी के आँसू चाट लिए, उसके कानों में सूमी की वो आवाज़ घूम गयी - सुहागरात लड़की के अपने ख़ास पॅलो की ख़ान होती है उसमें वो बटवारा बर्दाश्त नही कर पाती चाहे मुँह से कुछ ना कहे.

सुनील : जाओ तुम दूसरे कमरे में जा के सो जाओ, वैसे दिल तो नही चाहता कि तुम दूर जाओ, पर तुम्हारी इच्छा का मैं आदर करता हूँ.

रूबी ने नज़रों ही नज़रों में पूछा, नाराज़ तो नही हो ना.

सुनील ने भी नज़रों से ही जवाब दिया यहाँ प्यार ही प्यार है और किसी बात का तो स्थान ही नही फिर कैसी नाराज़गी और कैसा शिकवा.

रूबी को अपनी उपर नाज़ होने लगा, उसने ग़लत फ़ैसला नही लिया था, उसकी जिंदगी की नाव को कोई किनारे लगा सकता था तो बस सुनील. वो सुनील जो सोनल का दिल जीत गया था, वो सुनील, जिसे सागर ने सूमी की जिंदगी में अपना स्थान दिया, उस सुनील से बेहतर और कॉन हो सकता है, कभी कभी उसे सवी पे गुस्सा आता था कि क्यूँ वो सुनील के पीछे पड़ी है, पर आज सब कुछ शीशे की तरहा सॉफ हो गया, सवी ने सुनील के साथ अपनी बाकी जिंदगी बिताने का जो फ़ैसला लिया था वो ग़लत नही था. ये तो किस्मत का खेल था जिसने माँ और बेटी दोनो को एक ही इंसान से प्यार करवा दिया, अब उससे क्या गिला.
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07-20-2019, 10:01 PM,
RE: Hindi Kamuk Kahani वो शाम कुछ अजीब थी
रूबी सुनील के कदमों में झुक गयी.

'अरे अरे पगली ये क्या कर रही है, तेरी जगह कदमों में नही दिल में है' सुनील ने उसे उठा गले से लगा लिया.'

रूबी ने सुनील के माथे का चुंबन लिया और फट से कमरे से बाहर निकली और दरवाजा बंद कर दिया और दरवाजे से सट के अपनी साँसे संभालने लगी, दूर सामने गगन पे चाँद उसे चिड़ा रहा था, पगली दुनिया की सबसे बड़ी पेम लीला का भागीदार बनने की जगह बाहर निकल आई, मैं तो मज़े ले ले के देखूँगा.

'जा जा जो तू देखेगा वो मुझे तेरे अक्स में झलकता हुआ दिखेगा, फिर पूछूंगी, तेरा ध्यान अपनी चाँदनी के साथ रहता है या प्रेम लीलाओ की तरफ'

'अरे तुम क्या जानो, मैं तो स्तंभ हूँ यादगार का, जब भी दोनो आज के बाद मुझे देखेंगे, उन्हें आज की रात याद आएगी, कल तुम्हारी बारी है ना, कल बात करेंगे, अब ज़रा मुझे अपनी किरणों में प्रेम रस को समेटने दो' चाँद रूबी को ये अहसास दिलाता हुआ धीरे धीरे उस और सरकने लगा की सवी और सुनील के कमरे की खिड़की के एक दम सामने आ जाए.

रूबी का चेहरा शर्म से लाल पड़ गया और दूसरे कमरे में भाग बिस्तर पे गिर लंबी लंबी साँसे लेने लगी.

रूबी के जाते ही , सुनील वहीं बिस्तर के पास पड़े सोफे पे बैठ गया.

सामने टेबल पे शॅंपेन की बॉटल बर्फ में लगी पड़ी थी, सुनील के दिमाग़ में सूमी और सोनल का अक्स उभरने लगा, उसने सर झटका और दिमाग़ एक दम खाली कर सवी से बोला ' तो साली जी आख़िर जीत ही गयी, सीधा बीवी बन गयी क्यूँ'

'साली तो उसी दिन हार गयी थी, जब तुमने ठुकरा दिया था, ये तो मेरी किस्मत अच्छी थी जो बीवी बनने का सोभाग्य मिल गया, बस अब जिंदगी से कुछ और नही चाहिए, सब कुछ मिल गया तुम को पा कर'

'अच्छा जी'

चाँद सरकता हुआ इनकी खिड़की के सामने आ चुका था, शॅंपेन की बॉटल देख तो उसका मन भी ललचा गया, सोम रस और प्रेम रस का कॉकटेल, तोबा तोबा ये रात तो गदर मचा देगी तभी बादलों ने चाँद को घेर लिया और चाँद ऐसे खुंदक में आया के पूछो मत.

भूंभुनाते हुए चाँद ने बादलों के बीच का कमजोर हिस्सा ढूँढ लिया और अपने किरणें कुछ इस तरहा बादलों के बीच से समुद्र पे फेंकी कि पलट कर वो सुनील और सवी पे मंडराती हुई वापस उसी रास्ते से चाँद तक पहुँचने लगी.

'हूँ आए बड़े मुझे ढकने वाले - ये सुनील है इसकी रास लीला मैं कैसे छोड़ूं ....उम उम उम है अब शॅंपेन की बॉटल खुलेगी

सुनील तक जैसे चाँद की ख्वाइश पहुँच गयी थी उसने वाकई में शॅंपेन की बॉटल उठा ली.

'बेगम साहिबा ज़रा इधर तो आइए - अभी तो रात को जवान होने में बहुत वक़्त है कुछ ज़रा प्रकृति की नज़ाकत का भी मज़ा ले लिया जाए और ये सोम रस आपके हाथों की छुअन के लिए बेताब हो रहा है'

सवी ने सुनील को ऐसे घूरा जैसे कोई अजूबा देख लिया हो, उई माँ ये सुनील वही है क्या जो मर्यादा की लंबी छोड़ी दीवारों के पीछे छुपा रहता था.

'जानेमन ऐसे क्या देख रही हो मुझे नही वो देखो बादलों के साथ लूका छुपी करता हुआ चाँद कैसे तुम्हारे हुश्न के दीदार के लिए तड़प रहा है'

बिस्तर से उतर सवी पायल छनकाती हुई सुनील के सामने जा बैठी.

पलकें झुकी हुई थी, पर दिमाग़ एक तुलना करने लग गया, वो सुहागरात जो बरसों पहले समर के साथ बिताई थी और इस सुहागरात के आगाज़ का ही सोच सवी उन पलों को कोसने लगी जो उसने सुनील से दूर रह कर बिताए थे. ना चाहते हुए भी इंसान खांस कर औरत तुलना करने से बाज नही आती और सवी भी इसका शिकार हो गयी थी.

सुनील उठ के खड़ा हो गया और सवी के पास जा कर बैठ गया ' हज़ूर चेंज कर लो, ये भारी लहनगा कहीं कमर में लचक ना डाल दे'

सवी ने शायद सोचा था कि सुनील शायद सीधा हमला करेगा और उसके कपड़े कमरे में उतार के इधर उधर बिखरते जाएँगे, पर सुनील एक दम शांत था और कुछ मसखरी के मूड में था, वो माहॉल को हल्का बनाना चाहता था ताकि सवी के मन में जो भी सवाल उठ रहे हों वो शांत हो जाए.

हर गुज़रते पल के साथ सवी सुनील की कायल होती जा रही थी.

सवी ने धीरे धीरे सभी गहने उतारे जिनके बोझ तले जिस्म दुखने लगा था और उठ के वॉर्डरोब से एक नयी लाइनाये ले बाथरूम में घुस गयी,

इस बीच सुनील भी अपना नाइट सूट पहन चुका था. उसने जब सवी को देखा तो उसके मुँह से सीटी निकल गयी सोफे से उठा और धम्म से फिर गिर पड़ा जैसे वाकई में बेहोश हो गया. सवी घबरा गयी और भाग के सुनील के पास पहुँची.....सुनील ...सुनील वो बौखला के सुनील को हिलाने लगी और उसका नाम पुकारने लगी,

'कुछ पल आराम देने दो इन नज़रों को, तेरे हुस्न की लो में कहीं जल जाए' आँखें बंद किए ही सुनील बोला और सवी को यूँ लगा जैसे किसी ने उसे 360 डिग्री पूरा घुमा डाला हो.

'मेरी जान निकाल दी, ऐसे भी कोई करता है'

'यार मैं तो खुद को कोस रहा हूँ, इतना समय तुम से दूर क्यूँ रहा'

'और अब तंग कर रहे हो'

सुनील ने फट से आँखें खोली ' तोबा तोबा मेरी ये मज़ाल'

'जाओ नही बोलती आज भी रुला ही डाला' सवी उठ के उस दरवाजे पे खड़ी हो गयी जो बाहर बाल्कनी टाइप जगह पे खुलता था. उसकी आँखें नम पड़ चुकी थी. सुनील का यूँ इस तरहा बेहोशी का नाटक करना उससे बर्दाश्त ना हुआ.


सुनील उठ के उसके पास गया और पीछे से से उसके साथ सट गया.

'सॉरी जान, मैं तो मज़ाक कर रहा था.'

'तुम्हारा मज़ाक और यहाँ जान निकल गयी'

'ये जान तो अब मेरी है ऐसे कैसे निकल जाएगी' सुनील ने अपने होंठ सवी की गर्दन पे टिका दिए.

अहह सिसक पड़ी सवी, जैसे होंठ नही दो जलते हुए अंगारों ने उसे छू लिया हो.

'वो देखो चाँद भी कितना बेताब है तुम्हें देखने के लिए कैसे बादलो की ओट से निकल इधर झाँक रहा है'

सवी के गाल टमाटर की तरहा लाल सुर्ख हो गये, हुस्न अपनी तारीफ पे लजाए ना ये तो उसकी तासीर नही, फिर सवी कैसे छूटी रहती, कभी पलकें झुकती कभी थोड़ी उठा चाँद को देखती सवी को चाँद में जैसे सुनील का अक्स नज़र आ रहा था, ये वो अहसास था जिसे बोलों में बयान करना नामुमकिन होता है इसे सिर्फ़ औरत एक औरत ही महसूस कर सकती है और हर औरत इस अहसास को अपने ही अलग रंग में महसूस करती है, जाने कितने रंग है इस अहसास के, ये खुद रंग बनाने वाला भी आज तक नही जान पाया होगा.

'इन लहरों को देखो कैसे उछल रही हैं जैसे अभी चाँद को छू कर उसे अपने अंदर समेट लेंगी'

'डॉक्टर साहिब, आप तो शायर भी हो !' सवी के मुँह से निकला.

'शायर होता हज़ूरे-आला तो जाने कितने कसीदो का उंवां कर डाल ता तुम्हारे बेमिसाल हुस्न की तबीर में, इस वक़्त तो बस एक पतंगा जलने को मचल रहा है और इस कायानात को बटोर गवाह रखना चाहता है' सुनील ने सवी के बालों को उसकी गर्दन से हटा अपने तपते हुए होंठ उसके लरजते हुए जिस्म से चिपका दिए.

राहत-ए-सकुन के तहत सवी की आँखें खुद ब खुद बंद हो गयी.

दूसरे कमरे में रूबी की आँखों से नीद गायब हो चुकी थी, बिस्तर पे करवटें बदल वो बार बार ये सोच रही थी, क्या कर रहे होंगे दोनो और उधर सोनल को बिस्तर पे लेटे यूँ महसूस हो रहा था जैसे अभी सुनील ने अपने होंठ से उसे चूम लिया हो, उसके अधरों पे मुस्कान आ गयी.
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07-20-2019, 10:02 PM,
RE: Hindi Kamuk Kahani वो शाम कुछ अजीब थी
यहाँ टेबल पे पड़ी शॅंपेन की बॉटल खुद से बात कर रही थी, इतनी तौहीन तो मेरी आज तक ना हुई, जितनी आज हो रही है, ओ मुझ को बनाने वाले ये तूने क्या कर डाला क्या वाक़्य में हुस्न मुझ से ज़्यादा नशीला है. बॉटल के बाहर फैली पानी की बूँदें शायद उस शॅंपेन के आँसू ही थे.

सवी से रहा ना गया, वो पलटी और सुनील के चेहरे को अपने हाथों में थाम अपने होंठ उसके हवाले कर दिए.

रति जब अपनी अदाओं पे उतर आए तो बेचारे काम की क्या बिसात उसके सामने, कुछ यही हाल ही सुनील का हुआ जब सवी ने अपने होंठ उसके होंठों से भीड़ा दिए, सुनील ने कस के सवी को थाम लिया और दोनो के बीच एक गहरा चुंबन शुरू हो गया, उछलती लहरों का कोलाहल रात को और भी मादक बना रहा था, दोनो दीन दुनिया भूल एक दूसरे में खो गये.

आज वाकई में सवी को रूहानी खुशी मिल रही थी, जिंदगी भर जिस प्यार के लिए तर्सि थी आज वो उसे नसीब हो गया था. और ये प्यार उसे दो शक्स का ता उम्र के लिए कर्ज़दार बना गया सूमी और सोनल, अगर वो दोनो सुनील को नही मानती तो ये पल उसकी जिंदगी में कभी नही आने वाला था.

कहते हैं कि उपरवाला इम्तिहान लेता है, पर इम्तिहान लेने की भी कभी एक हद हो जाती है और वो हदें आज पूरी हो गयी थी, सवी अपना वजूद भूल चुकी थी, वो बस अब सुनील की परछाई मात्र बन के रह गयी थी और उसकी बाँहों में पिघलती जा रही थी. स्मूच करते हुए पता भी ना चला के सुनील ने कब उसकी लाइनाये की डॉरी खूल दी जो सरक्ति हुई सवी के पैरों पे जा गिरी.


दोनो का चुंबन और भी गहरा होने लगा, यहाँ तक की साँसे थमने लगी पर दोनो एक दूसरे के होंठों का रस चुराते रहे. रूह चाहे कुछ और चाहे पर जिस्म सदा साथ नही दे पाता, आख़िर उखड़ती हुई सांस को संभालने के लिए दोनो को अलग होना ही पड़ा और और सवी सुनील की छाती से चेहरे को लगा अपनी साँसे दुरुस्त करने लगी.
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07-20-2019, 10:02 PM,
RE: Hindi Kamuk Kahani वो शाम कुछ अजीब थी
सुनील के मन में जाने क्या था, शायद वो इस रात को सवी के लिए कभी ना भूलने वाली एक सौगात बनाना चाहता था, रस्मो रिवाज़ की उसे कोई चिंता नही थी, वो दकिया नूसी हरकतें जो अक्सर सुहागरात में होती है उसका तो वैसे भी दोनो के लिए कोई माइने नही रहा था.

ना तो सवी पहली बार सुहागरात मना रही थी और ना ही सुनील. ये रात तो बस सुहाग रात का नक़ाब ओढ़े दो रूहों के मिलन की रात थी, ये रात प्यार करनेवाली उन आत्माओं को एक साथ अतम्सात करनेवाली रात थी, जो जिस्म से परे अपने ही आलोकिक रूप में इस रात का मज़ा लेंगी, जिस्म तो बस एक ज़रिया था इनके लिए.

सुनील की जब सांस संभली तो उसने सवी को गोद में उठा लिया और सवी ने अपनी बाँहें उसके गले में डाल दी सवी सोच रही थी कि वो अब बिस्तर पे ले जाएगा, पर सुनील के दिमाग़ में कुछ और ही खुराफात थी. उसने सवी को गोद में उठाए हुए शॅंपेन की बॉटल उठा ली और बाहर ले गया जहाँ पूल के पास पूल के गद्दे पड़े थे जिनपे टवल बिछे हुए थे.

पूल में पैर लटकाए सुनील सवी को गोद में लिए हुए वहीं बैठ गया. सवी कस के उसके साथ चिपक गयी कि कहीं पूल में ही ना गिर जाए.

सुनील ने तब शॅंपेन की बॉटल खोली जिसकी तेज आवाज़ अंदर दूसरे कमरे में करवटें बदलती रूबी तक भी चली गयी और वो बिस्तर पे पैर पताकने लगी, है काश इस वक़्त वो सुनील की बाँहों में होती, उसे कुछ खुद पे ही गुस्सा आनने लगा था, क्यूँ उसने सुनील को माना किया, अगर साथ होती तो आज वो भी अपने पिया के प्यार की बरसात में नहा रही होती, मुश्किल से उसने खुद को समझाया और आँखें बंद कर अपनी आने वाली रात के बारे में सोचने लगी.

यहाँ सुनील ने शॅंपेन की बॉटल सवी के होंठों से लगा दी जिसने छोटा सा घूँट ले लिया, तब सुनील ने एक लंबा घूँट भरा और कुछ निगल के अपने होंठ सवी के होंठों से लगा उसके मुँह में शॅंपेन उडेल दी.

शॅंपेन दोनो के मुँह में इधर से उधर होने लगी जैसे तलाश कर रही हो कुछ और दोनो की ज़ुबान एक दूसरे से मिल शॅंपेन के चटकारे लेती हुई जिस्मों के ताप को बढ़ाने लगी, जिस्मों के चारों तरफ चाय इनके जिस्मो से तपती हुई चाँदनी जब समुद्र के जल को छूती तो तड़प के वो उछल के इनके जिस्मों के करीब होने का प्रयास करता, कहते हैं कि नशा नशे को काटता है, पर यहाँ तो नशे को ही नशा चढ़ने लग गया, दोनो के मुँह में घूमती शॅंपेन घबरा गयी, खुद उसे इतना नशा चढ़ गया इनके प्रेम रस का जो दोनो की ज़ुबान बे बदसूर निकल रहा था कि बेचारी शॅंपेन पनाह माँगते हुए इनके उदर का रास्ता ढूँडने लगी और जब दोनो के उदर में समाई तो चैन की सांस लेते हुए बोली, दुबारा इनके पल्ले मत डालना.

बॉटल कब खाली हुई पता ना चला और दोनो के जिस्म से कपड़े उतरते चले गये, कुदरत भी इनकी रासलीला देख मस्ती में आ गयी, बदल गड़गड़ाने लगे और धीमी धीमी फुहार बरसने लगी, पानी की बूंदे इनको जिस्मो पे गिरती और फिसल जाती पर दोनो सब कुछ भूल एक दूसरे में खो चुके थे, सवी के लिए ये अहसास बिकुल नया था वो सुनील की बाँहों में यूँ सिमट रही थी जैसे हर नयी नवेली दुल्हन अपने दूल्हे की बाँहों में सिमट ती है.

सुनील के होंठ सवी के जिस्म के कोने कोने को छूने लगे और उन होंठों से निकल तो हुई गरम भाप सवी की उमंगों को उकसाने लगी, सवी सुनील को खुद पे खींचने लगी जैसे अभी इसी वक़्त उसका जिस्म और आत्मा सुनील में विलीन हो जाएँगे. ये रात वाकई में सवी की जिंदगी की वो रात साबित हो रही थी, जिसे वो ता उम्र ना भूलनेवाली थी.

वहीं गद्दे पे लिटा सुनील सवी के उन्नत उरोजो पे झुक गया और और जब सवी के निपल को अपने ज़ुबान से छुआ तो तड़प के सवी ने उसको अपने उरोज़ पे दबा डाला जैसे पूरा उरोज़ उसके मुँह में देना चाहती हो, जिस्म में काम तरंगें अपना खेल खेलने लगी और सवी का जिस्म उसके काबू से बाहर होने लगा, कामउत्तेजना ने दिमाग़ और दिल के संतुलन को नष्ट कर डाला, इस वक़्त कोई भी उन्हें देखता तो यही कहता काम और रति अपने वास्तविक रूप में आ चुके हैं, दो जिस्म दो सर्प की तरहा एक दूसरे से लिपट चुके थे.



अहह उम्म्म्ममम उफफफफफफफ्फ़ सवी की सिसकियाँ फ़िज़ाओं में घुलने लगी, जिसके असर से हवा भी तेज चलने लगी और बदल छाटने लगे, चाँद को अपना मनमोहक दीदार मिलने लगा , चाँदनी भी लरजने लगी, और सुनील कभी उसके एक निपल को चूस्ता तो कभी दूसरे को, जब सवी के निपल को अपने दाँतों में सुनील दबाता तो उस मीठे दर्द के अहसास से सवी की अंतरात्मा तक विभोर हो जाती. यही फरक होता है जब दो जिस्म प्यार करते हैं क्यूंकी ये अहसास वासना के मिलन से नही मिलता.

सुनील ने ज़ोर ज़ोर से सवी के उरोज़ को मसलना शुरू कर दिया, सवी अपनी टाँगें पटकती हुई उसे अपने उपर दबाने लगी, ये सिलसिला कुछ देर यूँ ही चलता रहा और सवी की चूत कुलबुलाती हुई लंड को पुकारने लगी, उसके जिस्म के पोर पोर में अनगिनत तरंगें लहराने लगी.

हर शादी शुदा जोड़ा सुहाग रात मनाता है, किसी को कुछ अनुभव होता है तो किसी को कुछ, अगर सोनल को ये पता चला कि सवी की सुहागरात प्रकृति की गोद में खुले आसमान के नीचे हुई, जाने उसपे क्या गुज़रेगी. इधर सुनील, सवी के दिलोदिमाग से उसके अतीत की सब कड़वी यादें अपने प्यार की फ़ुआर से निकाल फेंक रहा था. इतनी देर में तो विश्वामित्र भी डाँवाडोल हो जाता जितना समय सुनील खुद पे संयम रखते हुए सवी की नस नस में प्यार की अनमोल तरंगों को आजीवन के लिए समाहित कर रहा था.


'ओह सुनील ! कहाँ थे अब तक, मेरी रूह तक तुम्हारी गुलाम हो गयी आज तो' सवी इतना प्यार झेल ना पाई उसकी आँखों से आँसू टपकने लगे, जिस्म में उठ रही तरंगें उसे परेशान किए जा रही थी, ये अहसास तो उसे सागर के साथ भी ना मिला था. कैसे पाला था सूमी और सागर ने सुनील को, ये क्या क्या उसके अंदर समाहित कर दिया, औरत बस एक जिस्म नही होती, ये अहसास सवी को आज हो रहा था, संभोग क्रीड़ा में प्यार कितना सर्वोपरि होता है ये आज उसे समझ में आ रहा था. अगर सूमी ने उसे इस प्यार के रास्ते पे ना डाला होता तो आजीवन एक खोखली जिंदगी जी जिंदगी के असली रंग से पूर्णतया वंचित रह जाती, प्यार देने का नाम है लेने का नही, प्यार के सही माइने सवी की राग राग में समाते जा रहे थे.

'प्यार प्यार होता है सवी, इसमे कोई किसी का गुलाम नही होता, प्यार को बस प्यार ही समझो तो उसका रंग और निखार जाता है, इस दूर तक फैले समुद्रा की गहराई से भी ज़्यादा गहरा प्यार होता है, जिस्म तो बस एक ज़रिया बन के रह जाते हैं उस प्यार के कुछ अंश को भोगने के लिए, उसे समझने के लिए. प्यार रूह की गहराई से निकलता है, बिल्कुल उसी तरहा जैसे आत्मा का विनाश नही हो सकता प्यार का भी विनाश नही हो सकता, वो बस दब जाता है कहीं खो जाता है, उसे पहचानना पड़ता है, क्यूंकी वही तो उस बनानेवाले का असली रूप है.'

'मुझे अब कभी छोड़ना मत, मर जाउन्गि मैं, जिंदगी भर बस इसी प्यार को तरसती रही और मिली बस वासना.'

'छोड़ने के लिए तो शादी नही की पगली, भूल जा सब और खो जा प्यार में, पहचान उसे, रंग जा उसके रंग में, फिर कभी किसी दर्द का कोई अहसास नही होगा, क्यूंकी प्यार जलन,क्रोध सब से दूर रखता है, जो प्यार का हो गया, वो दर्द से मुक्त हो जाता है'

पल को सवी सोचने लगी क्या खा के पैदा किया था सूमी ने सुनील को, क्या परवरिश में इतनी शक्ति होती है जो खून के असर को भी ख़तम कर देती है, कहीं से भी तो कोई लक्षण ऐसा नही सुनील में जो ये बताता हो कि उसके अंदर समर का अंश है.
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07-20-2019, 10:02 PM,
RE: Hindi Kamuk Kahani वो शाम कुछ अजीब थी
सवी की पलकें बंद हो गयी और वो प्यार के सागर में गोते लगाने का प्रयास करने लगी जिसकी तरफ सुनील उसे धीरे धीरे ले जाने लगा. अगी ने यही तो शक्ति दी थी सुनील को वो जिसको दिल से प्यार करेगा, उसे प्यार का सही अर्थ समझ में आने लगेगा.

प्यार- प्यार- प्यार बस यही है असली जीवन का सार.

सुनील के हाथ सवी के जिस्म पे फिरने लगे. लरजती हुई सवी के हाथ सुनील की पीठ को सहलाने लगे, सुनील ने फिर अपना ध्यान फिर सवी के उरोज़ पे लगा दिया और एक निपल को ऐसे चूसने लगा जैसे अभी उनमें से दूध निकल आएगा. सवी का दिलो दिमाग़ अब सॉफ हो चुका था हर तरफ बस उसे प्यार ही प्यार दिखाई दे रहा था और महसूस हो रहा था, यही होता है आत्मिक मिलन जो इस वक़्त सवी और सुनील के बीच हो रहा था जिसका प्रमाण सूमी और सोनल को मिल रहा था, दोनो की आत्माएँ प्रसंचित हो गयी थी, एक शन्सय जो उनके दिमाग़ में था वो मिट गया था.

सुनील और सवी की आत्माओं के आतम्सात के साथ सूमी और सोनल की आत्माएँ भी मिल गयी थी, जो अहसास इस वक़्त सवी को हो रहा था वही अहसास इसी वक़्त सूमी और सोनल को भी हो रहा था.

आह उम्म्म ओह्ह्ह्ह उूउउम्म्म्मममाआआआ चारों और सवी की सिसकियों का साम्राज्ये स्थापित हो गया था, संगीत के सात सुरों की लाई में निकलती सिसकियों का आनंद समुद्र में पनपते जीव भी लेने लगे और बार बार सतह पे आते फिर गोता खाते और फिर सतह पे आ जाते.

वातावरण इतना कामुक हो गया के सामुद्री जीव भी इसके वार से बच ना पाए और उनमें भी प्रेम रस की बरसात होने लगी.

सवी के साँसे तेज होती चली गयी और जैसे ही सुनील की ज़ुबान सवी की नाभि में घुसी, सवी का जिस्म फुट भर उपर उछल पड़ा, अहह!!!!!! एक जोरदार सिसकी के साथ वो ढह गयी और उसकी चूत ने सारे बाँध खोल दिए, बिना लंड से मुलाकात किए बिना आज पहली बार सवी अपने चर्म को प्राप्त हुई थी, उसका जिस्म काँपने लगा और सुनील ने उसे अपने इस आनंद को आतम्सात करने दिया और सवी के चेहरे को निहारने लगा.

चारो तरफ से उफ्फन्ति हुई प्रेम रस की लहरों ने समुद्र में ज्वारभाटे को उत्पन्न कर दिया और इस सब से बेख़बर सवी ने अपने आनंद को सोख कर जब आँखें खोली तो सामने सुनील का चेहरा था वो उठ के सुनील से लिपट गयी और उसके चेहरे को बोसो से भर दिया.

होंठों को जब होंठों के रस का चस्का चढ़ जाए तो भला वो ज़्यादा देर तक दूर कैसे रहते, बोसे लेती हुई सवी कब सुनील के होंठों को पीने लगी ये दोनो को ही पता ना चला और सुनील भी उसके होंठों की मिठास में खो गया.


रात धीरे धीरे सरक रही थी चाँद साथ में सरकता हुआ अपनी नज़रें इन्पे गढ़ाए हुए था और भाव विभोर हो रहा था.

कभी सुनील सवी के उपर होता तो कभी सवी उसके उपर दोनो गुत्थम गुत्था होते चले गये, जिस्मो का तापमान इतना बढ़ा के बादल भी मजबूर हो गये बरसने को.

बारिश में भीगते दो बदन जितना ठंडी पानी के बूंदे उन्हें शीतलता प्रदान करने का प्रयास करती काम और रति उतनी ही उर्जा उनके अंदर भरते रहते, एक युद्ध सा छिड़ चुका था बारिश के प्रयास में और जिस्मों की ताप के बीच, कोई हारने को तयार नही था और प्रेम रस में भीगी दो आत्माएँ इन सब से परे अपने आनंद लोक में खोई हुई थी, जिस्म वही कर रहे थे जो आत्माएँ चाहती थी, एक अभूत पूर्व संगम की ओर अग्रसर.

'अब नही सहा जाता' सवी का जिस्म बार बार पुकार रहा था, उसके बदन के कंपन को सुनील भी महसूस कर रहा वक़्त आ चुका था. बारिश बहुत तेज हो गयी थी, काफ़ी देर से दोनो बारिश में भीग रहे थे, सवी कहीं रोमांच के चक्कर में बीमार ना पड़ जाए, ये सोच सुनील उस से अलग हुआ और उसे गोद में उठा कर कमरे में ले गया जहाँ सुहाग सेज इनका कब्से इंतजार कर रही थी.

सुनील ने सवी को बिस्तर पे लिटा दिया और बिस्तर पे फैली गुलाब की पट्टियाँ सवी के जिस्म से यूँ चिपकी के कभी अलग ना हों और सवी का जिस्म गुलाब की खुश्बू से तरबतर हो गया.

सुनील बाथरूम से तोलिये ले आया और खुद सवी के जिस्म को पोंछने लगा, कमरे में आते ही सवी को थोड़ी ठिठुरन सी हुई पर सुनील के द्वारा जिस्म को रगडे जाने से दूर हो गयी, बिस्तर काफ़ी गीला हो गया था पर अब किसे इस बात की परवाह थी, सुनील ने सवी के जिस्म को पोंछ के खुद के जिस्म को भी बारिश के पानी से मुक्त किया और मिनी फ्रिड्ज खोल एक स्कॉच का एक पाइंट नीट ही गटक गया जो गले को चीरती हुई पेट तक पहुँची और जिस्म में एक दम तेज गर्मी का तूफान सा आ गया.

खाली बॉटल फेंक सुनील सवी से चिपक गया और और सवी ने अपनी टाँगें फैला दी, सुनील का लंड सवी की चूत पे दस्तक देने लगा, जो काफ़ी गीली हो चुकी थी, पर सूमी की पहले कही गयी बात को याद कर सवी ने अस्ट्रिंजेंट का इस्तेमाल कर लिया था इसलिए उसकी चूत इतनी टाइट हो गयी थी, कि आसानी से सुनील का मोटा लंड उसमें नही समा सकता था.

चाहे सवी कुँवारी नही थी, पर वो भी सुनील को वही सुख देना चाहती थी जो सूमी ने दिया था, सुनील ने उसकी कमर को पकड़ ज़ोर का एक झटका लगाया और और सुनील का लंड सवी की चूत को फैलाता हुआ थोड़ा अंदर घुस गया, दर्द के मारे सवी की चीख निकल गयी, पर इस दर्द का उसे कब से इंतजार था. सुनील झुक के उसके होंठ चूसने लग गया और जब सवी के दर्द का अहसास थोड़ा कम हुआ तो सुनील ने ताबड तोड़ तीन चार तेज धक्के मारे और सवी की चीखों की परवाह ना करते हुए पूरा लंड अंदर घुसा दिया.

कुछ के लिए सुनील रुक गया और सवी के निपल चूसने लग गया, धीरे धीरे सवी का दर्द कम हुआ और सुनील के धक्के शुरू हो गये वो पल दूर नही रहा जब सवी भी ताल से ताल मिला अपनी गान्ड उपर उछालती हुई सुनील के धक्कों का जवाब देने लगी, कमरे में तुफ्फान बढ़ता चला गया, आधे घंटे की जोरदार चुदाई में सवी दो बार झाड़ गयी.

अहह उफफफफफफफ्फ़ अहह सवी की सिसकियाँ बदस्तूर जारी रही जिस्मों की थप थप और सवी की चूत से निकलती फॅक फॅक की आवाज़ें कमरे में गूंजने लगी, सुनील की स्पीड बढ़ती चली गयी और वो पल भी आया जब सवी एक जोरदार चीख के साथ झड़ती हुई सुनील से चिपक गयी और सुनील का लावा भी उसकी चूत को भरने लग गया.

दोनो के जिस्म पसीने से तरबतर हो चुके थे साँसे धोकनी से भी तेज चल रही थी. सुनील हांफता हुआ सवी पे गिर पड़ा और दोनो अपने आनंद को भोगते हुए धीरे धीरे नींद के आगोश में समा गये.

इंसान की हर हरक़त का प्रभाव प्रकृति पर पड़ता है, क्यूंकी वो खुद प्रकृति का एक हिस्सा है, पर ये बात इंसान भूल गया और प्रकृति को अलग नज़रिए से देखने लगा. खैर ऐसा क्यूँ हुआ इन सब पे ना जाते हुए चलते हैं देखने आगे क्या हुआ इस कहानी में.

समय अपनी रफ़्तार से चलता रहा और चाँद धीरे धीरे पृथ्वी के दूसरे हिस्से की तरफ सरकता रहा और सूरज बड़ी बेचैनी से सुनील और सवी पे अपनी किरणें डालने को तरस रहा था, प्रेम की सारी किरणों का अक्स केवल चाँद ही क्यूँ बनाता है, सूरज को इस बात से बड़ी नाराज़गी थी, क्यूंकी उसे बड़े कम मोके मिलते थे हद से हद अगर कुछ दिखता भी था तो वासना का तांडव नृत्य, प्रेम नृत्य और मिलन तो दिखता ही नही था, खाई वो समय भी आ गया, पो फट गयी, चिड़ियो ने चहचाहना शुरू कर दिया और सुरक के प्रकाश में बंगलो के चारों तरफ का सॉफ सामुद्री पानी अपनी रंगत दिखाने लगा.

सुनील की नींद पहले टूटी और अंगड़ाई लेते हुए उठा तो साथ में सवी बिल्कुल उसके साथ चिपकी हुई थी.

नींद में सवी और भी सुंदर लग रही थी, चेहरे पे एक चमक थी सकुन था, जैसे बहुत बड़ी चीज़ उसे मिल गयी हो, सुनील ने उसे नही उठाया और जब उठ के बिस्तर से खड़ा हुआ तो उसकी नज़रें सवी की चूत की तरफ चली गयी जिसके चारों तरफ खून जमा हुआ था और चूत के बीच में से निकलता उसका वीर्य भी सूख गया था. बिस्तर पे भी काफ़ी खून फैला हुआ था. यक़ीनन सवी को कल रात काफ़ी तकलीफ़ हुई थी. सुनील बाथरूम घुस गया फ्रेश हुआ और बाहर निकला तो उसके हाथ में पानी का मग था जिसमे गरम पानी था और एक तोलिया था. सुनील ने तोलिया गरम पानी में भिगोया और सवी की चूत की सिकाई करते हुए आसपास की जगह सॉफ करने लगा. चूत पे पानी की गर्माहट और रगड़ाई से सवी की नींद टूट गयी और सुनील को अपनी सफाई करते हुए देखा तो उसे काफ़ी शरम आई.
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