Antarvasna kahani नजर का खोट
04-27-2019, 12:33 PM,
#21
RE: Antarvasna kahani नजर का खोट
वो बस मुस्कुरा दी और खाना बनाने लगी मैं उसके पास चूल्हे की दूसरी तरफ बैठ गया 



वो- क्या देख रहा है 



मैं- तुझे 



वो- क्यों 



मैं- बस ऐसे ही 



वो- ऐसे ही मत देख 



मैं- एक बात पुछु 



वो- नहीं मैंने पहले ही मना किया था तुझे 



मैं- मैं बस इतना पूछना चाहता था की तूने चेहरे पे दुपट्टा क्यों डाला था वहा पे 



वो- बस यु ही

मैं- सो जाऊ थोड़ी देर 

वो- रोटी खाके सोना 

मैं- थोडा थक गया हु पता है मेरे घर में मेरी कोई इज्जत नहीं है बस मेरी भाभी है मुझे समझती है बाकि बस एक नौकर जैसा हु मैं 

वो- पर तेरे अपने तेरे पास तो है ना 

मैं- काश मैं ऐसा कह सकता 

वो- कुंदन जो है ठीक है पर तूने मेरे दिल पर बोझ कर दिया है 

मैं-कैसा बोझ 

वो- मुझे फिकर हो रही है अगर तुझे कुछ हो गया तो 

मैं- हो भी जाये तो क्या हुआ हम कौन से तुम्हारे अपने है राह का पत्थर समझ कर भूल जाना 

वो- अब ऐसा मत बोल

मैं- क्या फर्क पड़ता है पूजा छोड़ इन सब बातो को ला रोटी डाल थाली में भूख लगी है जोरो से 

वो- हां, बाबा 

उसके हाथो में सच जादू सा ही था पूरी पांच रोटिया खा चूका था पर फिर भी मन नहीं भरा था बाहर सावन ने जैसे आज कसम ही खा ली थी की सारा पानी का भंडार आज ही खाली करके मानेगा खाने- पीने के बाद अं बस सो जाना चाहता था पर मेरी मज़बूरी थी की कपडे मेरे गीले थे और उनको पहने पहने मैं सोता कैसे 

और कपडे ना उतारता तो तबियत ख़राब होनी थी पक्की तो मैंने सोचा की बरामदे में अलाव जला कर बैठ जाता हु उससे गर्मी भी मिलेगी और पूजा के आगे शर्मिंदा भी नहीं होना पड़ेगा बाकि नींद का क्या तो मैंने आग जला ली और उसके पास बैठ गया थोड़ी देर में वो आई 

पूजा- अरे यहाँ अलाव क्यों जलाया सोना नहीं है क्या 

मैंने उसी अपनी मज़बूरी बताई 

वो- बस इतनी सी बात एक काम कर कपडे उतार के सीधा कम्बल में घुस जा फिर मैं तेरे कपडे सूखने के लिए डाल दूंगी तब तक तू तौलिया से काम चला 

मैं- रहने दे 

वो- क्या रहने दे वैसे ही भीगा हुआ है और ठण्ड लगी तो बुखार हो जाना है पर पहले ये गरम दूध पी ले 

मैंने गिलास अपने हाथ में लिया और बोला- पर पूजा 

वो- पर वर कुछ नहीं मैं भी थोडा थक सी गयी हु आज तो बस बिस्तर पकड़ना चाहती हु 

तो फिर दूध पीने के बाद मैंने कपडे उसको दिए और तौलिए में ही बिस्तर में घुस गया उसने अपनी चारपाई मेरे पास ही बिछा ली और किवाड़ कर दिया बंद गर्म कम्बल बदन को बहुत सुकून दे रहा था ऊपर से थकन तो पता नहीं कब नींद आ गयी रात को पता नहीं क्या समय हुआ था पेशाब की वजह से मेरी आँख खुली तो मैंने देखा की पूजा अपनी चारपाई पर नहीं थी 

कम्बल लपेटे मैं बाहर आया तो मेह अभी भी बरस रहा था मैंने देखा दूर दूर तक बरसात के शोर के अलावा अगर कुछ था तो बस अँधेरा घना अँधेरा मैं मूत कर आया तो देखा वो बिस्तर पर थी मैं सोचा पानी- पेशाब गयी होगी तो मैं भी फिर सो गया सुबह उठने में थोड़ी दे सी हो गयी थी तो देखा की दूसरी चारपाई पर मेरे कपडे रखे थे एकदम सूखे मैं पहन कर बाहर आया 

बरसात थम गयी थी पर हर जगह कीच हो रखा था मैंने पूजा को देखा पर वो थी नहीं और ना उसके पशु तो मैंने सोचा की वो चराने या उनको पानी पिलाने गयी होगी मैं क नजर घडी पर डाली 9 से ऊपर हो रहे थे कुछ देर उसका इंतजार किया और जब वो नहीं आई तो मैं अपनी साइकिल लेके गाँव की तरफ हो लिया आधे घंटे बाद मैं अपने कमरे में जा रहा था की मैंने माँ सा और भाभी की बाते सुनी 

माँ- जस्सी, चार साल हो गए तेरे ब्याह को पर अभी तक पोते का मुह नहीं देख पाई हु मैं माना की तेरा पति फौजी है पर फौजियों के भी औलादे तो होती हैं ना 

भाभी- माँ, जब भी वो आते है हम कोशिश करते है 

माँ- तो फिर होता क्यों नहीं देख मेरी बात सुन ले कान खोल कर तू भी और आने दे इन्दर को मैं उसको भी समझती हु मुझे जल्दी से जल्दी खुशखबरी चाहिए 

भाभी- जी माँ 

तभी माँ की नजर मुझ पर पड़ी तो उन्होंने ताना मारा- आ गए लाटसाहब अगर आवारगी से फुर्सत मिल गयी हो तो जरा भैंसों के लिए खल की बोरिया ले आना याद से और कुछ घर के काम है वो भी आज के आज ही निपटा देना 

मैं- जी माँ सा 

मैं- भाभी भूख लगी है मेरा खाना चौबारे में ही ले आओ ना 

माँ- काम कुछ होता नहीं भूख दिन में चार टाइम लगती है साहब को अरे हमारी नहीं तो खाने की ही इज्जत करो जितना खाते हो उतना काम तो किया करो 

माँ की बाते सुनके मन खट्टा हो गया 

मैं- भाभी रहने दो पेट भर गया मैं काम निपटा के आता हु 

माँ- नखरे देखो तो सही दो बात नहीं सुनेंगे अरे इतना ही नखरा है तो दो पैसे कमा के दिखा पहले पेट भर गया 

मैंने अपना माथा पीट लिया यार जब घर वाले ऐसे है तो दुश्मन बाहर ढूंढने की क्या जरुरत है सोचते सोचते मैं घर से बाहर निकल गया तो चंदा चाची घर के बाहर ही थी 

मैं- क्या बात है चाची दुरी सी बना ली 

वो- कहा रे, तू ही रमता जोगी बना फिर रहा है कल रात कहा था 

मैं- रात की जाने दो कहो तो वो काम दिन में कर दू 

चाची – चुप बदमाश 

मैं- ठीक है रात को मिलते है फिर 

वो- आज मैं कुवे पर ना जाउंगी 

मैं- कोई बात न मैं छत से आ जाऊंगा पर अभी भी हो सकता है आप कहो तो 

वो- नहीं तेरी माँ आने वाली है अभी लाल मिर्चे पीसनी है आज 

मैं- रात को तैयार रहना 

ये कहकर मैंने चाची को आँख मारी और फिर आगे बढ़ गया करीब दो घंटे बाद मैं सारे काम जो की गैर जरुरी थे वो निपटा कर आया तो माँ सा घर पर नहीं थी भाभी मेरे कमरे में ही थी गाने सुन रही थी 
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04-27-2019, 12:34 PM,
#22
RE: Antarvasna kahani नजर का खोट
भाभी- आ गये मैं खाना लाती हु 

मैं- रहने दो भाभी अड्डे पे चाय समोसा खाकर आया हु 

वो- ये बढ़िया है खैर 

मैं- वो सब जाने दो पर य बताओ माँ क्या बोल रही थी आपको 

और भाभी के चेहरे पर हवाइया उड़ने लगी

भाभी- की बाते हो रही थी बस ऐसे ही रोजमर्रा की 



मैं- मैंने सब सुन लिया था भाभी वैसे तो ये आपका निजी मामला है पर मुझे माँ की बातो का बुरा लगा 



वो- मुझे कुछ काम याद आ गया मैं बाद में मिलती हु 



भाभी बाहर चली गयी पता नहीं क्यों मैंने उनको रोका नहीं तो बस गाने सुनते सुनते कब आँख लग गयी पता नहीं चला फिर मैं जब उठा तो बाहर हल्का हल्का अँधेरा हो रहा था मैंने हाथ मुह धोया और निचे गया तो बैठक में गाँव के कुछ लोग और बैठे थे माहौल कुछ गंभीर सा था मैंने सबको रामरमी की और वापिस अन्दर आ गया मैंने भाभी से पूछा तो पता चला की जयसिंह गढ़ से कारिन्दा संदेसा दे गया था की लाल मंदिर पर अगली अमावस को चुनोती स्वीकार हुई है 



चूँकि ये चुनौती बस इन दोनों गाँवो के लोग ही दे सकते थे और देव गढ़ की और से कौन चुनोती दे आया वो भी बिना राणाजी को बताये ये चर्चा जरुर हुई होगी मैं सोच रहा था की राणाजी को बता दू या नहीं वैसे देखा जाए तो बताना बहुत जरुरी था क्योंकि जल्दी ही उनको पता चल ही जाना था मुझे डर भी था की पता नहीं वो क्या करेंगे जब उनको पता चलेगा की उनके अपने बेटे ने ये काम किया है 



काफी सोच कर मैंने निर्णय लिया की सुबह होते ही मैं उन्हें अवश्य बता दूंगा वैसे भी अब चुनोती से पीछे कदम तो नहीं उठा सकता मैं , अपने पलंग पर बैठे मैं बस लाल मंदिर की चुनोती के उन किस्सों के बारे में सोचने लगा जो गाँव में मैंने बड़े बुजुर्गो से सुने थे की कैसे कैसे लोग थे वो जिन्होंने ये बीड़ा उठाया था और अगली अमावस को मैं भी उन लोगो में शामिल हो जाने वाला था अगर जीता तो 



लोगो की नजर में यहाँ दांव पर जीवन लगता था परन्तु मैंने यहाँ पर कोई दांव नहीं लगाया था सच तो ये था की मुझ फ़क़ीर के पास था ही क्या जो मैं दांव पे लगाता मेरे लिए ये चुनोती थी सम्मान की पूजा के सम्मान की मना कोई लाख दबंग हो पर मजलूमों का भी सम्मान होता है हर इन्सान को इस खुली हवा में साँस लेने की आजादी हो चाहे वो जुम्मन हो या पूजा सब अपने ही तो है फिर किस पर ये दबंगई और किस पर ये जोर 



और जोर भी कैसा अपने अहंकार का , खैर बड़ी ख़ामोशी से मैंने अपना खाना खाया भाभी से बात करना चाहता था पर वो व्यस्त थी तो हमने भी बस चादर ओढली ख़ामोशी की और कर दिया खुद को हवाले अपनी अधूरी हसरतो के , वो हसरते जो असल में क्या थी मैं नहीं जानता था जैसे एक अधूरापन सा ,दिल में अचानक से उठ गयी एक टीस जैसे की इस पूरी दुनिया से बगावत कर जाऊ कभी कभी तो लगता था की बस सर ही फोड़ लू पत्थरों से आखिर ये कैसा सूनापन था मुझमे जो मुझे तमाम लोगो से अलग कर देता था 



पता नहीं कब घर की चहल पहल ख़ामोशी में तब्दील हो गयी सब लोग सो चुके थे मैंने अपने कमरे की बत्ती बुझाई और एक बार जायजा लिया उसके बाद मैं छत की दूसरी तरफ गया और दिवार चढ़ क चाची की छत पर चढ़ गया वहा से लटक के जैसे तैसे उतरा और फिर निचे चला गया पुरे घर में अँधेरा था बस एक ही कमरे में बत्ती जल रही थी तो मैं उधर ही गया और जाके देखा तो बस 
देखता ही रह गया चाची क्या लग रही थी जी किया की अभी अपने आगोश में भर लू पर उसने मुझे बैठने का इशारा किया और बोली- कुंदन तूने एक बात सुनी 



मैं- क्या चाची 



वो- लाल मंदिर की चुनोती स्वीकार हुई है अब बरसो बाद पता नहीं माता के मन में क्या आई अब न जाने किसकी बलि लेगी मैंने सुना अपने गाँव का कोई गया था चुनोती देने पता नहीं कौन है वो बदनसीब जिसने मौत को गले लगाने की सोची क्योंकि हार-जीत तो एक की मौत के बाद ही होगी मैं तो दुआ कर रही हु की राणाजी इस प्रथा को ही बंद कर दे 



मैं- मैं चाची अब चुनौती दी है तो अब तो संग्राम होकर ही रहेगा 



वो- तुझे नहीं पता कुंदन तूने कभी देखि नहीं पर मैंने देखा है वो विध्वंस पल पल दिल घबराता है कलेजे का साथ छोड़ देती है धड़कने लोग चीखते है चिल्लाते है कुछ बेहोश हो जाते है दो लोग गिरते है उठते है खून बरसता है और किसी एक को प्राण त्यागने पड़ते है 



मैं- मैंने सुना बारह साल से किसी ने लाल मंदिर की चुनोती ना दी अगर दी तो सामने वाले ने स्वीकार ना की 



चाची- हा सही सुना तूने मेरे तो हाथ पैर ही ठन्डे हो गए ये खबर सुनकर पता नहीं उस बदनसीब के घर वालो पर क्या बीतेगी जब ये बिजली उन पर टूटेगी 



मैं- चाची एक बात कहू 



वो- हां 



मैं- चाची मैंने दी है ये चुनौती 



................................................................................... चाची का मुह खुला का खुला रह गया और कमरे में कुछ पलो के लिए गहरा सन्नाटा छा गया 



और फिर “तड़क तड़क ” चाची के दो चार तमाचे खीच कर मेरे चेहरे के भूगोल पर पड़े 
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04-27-2019, 12:34 PM,
#23
RE: Antarvasna kahani नजर का खोट
“कमीने इतनी भी क्या जल्दी है तुझको मरने की ” चाची ने रोते हुए मुझे अपने सीने से लगा लिया और रोने लगी मैंने बड़ी मुश्किल से उसको चुप कर वाया बहुत देर तक वो मुझे गालिया बकते हुए रोती रही मैं सुनता रहा फिर वो बोली- क्यों किया तूने ऐसा जो आग ठंडी पड़ गयी थी क्यों सुलगा आया उसे तू बावले ये क्या कर आया तू कुंदन तुझे कुछ हो गया तो हम तो जीते जी ही मर जायेंगे रे 



मैं- मुझपर विश्वास रख चाची तेरे कुंदन को कुछ नहीं होगा 



चाची- पर ऐसा कौन सा पहाड़ टूट पड़ा था जो तूने लाल मंदिर की चुनौती ही उठा ली 



मैं- चाची मैं ये नहीं बता सकता मेरी मज़बूरी है 



चाची- परिवार से बड़ी मज़बूरी 



मैं- ऐसा ही समझ लो 



चाची उठी अपने दुसरे कपडे पहने और मेरा हाथ पकड़ कर बोली- तू आ मेर साथ 



मैं कुछ कह नहीं पाया और वो मुझे खींचते हुए मेरे घर ले आई और चीख चीख कर सबको इकठ्ठा कर लिया 



माँ- क्या हुआ चंदा क्यों घर सर पर उठा रखा है वो भी रात को 



चाची- जीजी पूछिए तो सही अपने लाल से क्या काण्ड करके आया है .................
सब लोगो की नजर बस मुझे ही घुर रही थी मेरा दिल बहुत तेजी से कांप रहा था मेरी माँ की नजरे ऊपर से निचे तक मुझे जैसे तराश रही थी की बेटा इतनी रात को क्या कर आया पर राणाजी एक दम शांत खड़े थे जैसे की किसी नदी के किनारे पर ठहरा हुआ पानी पर ये जो सन्नाटा सा छा गया था ये बहुत जानलेवा था 



माँ- चंदा बोल तो सही क्या कर आया ये 



चाची- मैं क्या बोलू जीजी अप ही सुन लो इसके मुह से 



“कुंदन तुम्हारी चाची सा क्या कह रही है हम सुनना चाहेंगे ” राणाजी ने बहुत शांत स्वर में अपनी बात कही थी पर फिर भी उनका प्रत्येक शब्द विस्फोट से कम नहीं था 



मैं- वो ......... वो लाल मंदिर की चुनोती मैं उठाई है 



ये सुनते ही माँ सा को जैसे चक्कर सा आ गया वो धम्म से ही आँगन में गिर पड़ी चाची और भाभी दौड़ी उनको सँभालने की मैं भी दुआ पर मेरा हाथ पकड कर रोक लिया मुझे राणाजी ने माँ सा को उनके कमरे में ल जाया गया और आनन फानन में वैध जी को बुलाया गया उन्होंने बताया की घबराने की बात नहीं है पर उनका जी बैठ गया है तो थोडा ध्यान रखे 



राणाजी आंगन में ही बैठ गए कुर्सी डाल के मैं पास खड़ा रहा अन्दर माँ का हाल बुरा था बार बार वो बस रोये जा रही थी कलेजा मेरा भी फाटे जा रहा था पर मुह से बोल नहीं निकल रहे थे रात धीरे धीरे कट रही थी पर उसका वो सन्नाटा मुझे और डरा रहा पिताजी ने मुंशी जी को बुलाया और कुछ ही देर में आँखे मलते हुए वो राणाजी के सामने खड़े थे 



राणाजी- मुंशी जी आप अभी शहर जाइये और पहले तार से ठाकुर इन्दर सिंह को खबर कीजिये की जितनी जल्दी हो छुट्टी लेकर घर आये और ये भी इत्तिला दीजिये की ठाकुर हुकम सिंह के आदेश की तुरंत पालना हो तार के साथ उसकी बटालियन में फ़ोन भी कीजिये 



मुंशी- जी हुकुम 



और वो तभी दो आदमियों के साथ सहर के लिए निकल गया 



राणाजी- समय क्या हुआ है 




मैं- सुबह के तीन बजे है सरकार 



राणाजी- कुंदन जीप चालू करो हम आते है 



मैंने बाहर आके जीप चालू की दरअसल मैं थोडा सा हैरान सा हो गया था राणाजी के रवैये को लेकर उन्होंने अभी तक मुझे कुछ भी नहीं कहा था बल्कि भैया को बुलाने के लिए मुनीम जी को शहर भेज दिया था खैर करीब पन्द्रह मिनट बाद जब वो हवेली से बाहर आये तो मैंने राणाजी को नहीं बल्कि किसी और को ही देखा हाथो में ना उनकी छड़ी थी ना आँखों पर वो सुनहरी फ्रेम वाली ऐनक ना हमेशा की तरह चमचमाते हुए सफ़ेद कपडे बल्कि एक बेहद पुराना सा कुरता और धोती पांवो में जुतिया जिन्हें शायद बरसो से नहीं पहना गया था 



मैं जीप में ड्राईवर सीट पर बैठ ही रहा था की उन्होंने मना किया और खुद बोले- मैं चलाता हु 
मैं पास बैठ गया और जीप गाँव की गलियों से होते हुए गाँव के बाहर जाते कच्छे रास्तो पर दौड़ने लगी मेरे जीवन में मैंने पहली बार उन्हें अपनी पसंदीदा फोर्ड गाड़ी के आलावा आज कोई दूसरी गाड़ी चलाते देखा था बार बार मैं सामने सडक और फिर राणाजी के चेहरे की और देखता जीप जिस रस्ते पर जा रही थी उस पर मैं बस एक हद तक ही गया था हम दोनों के बीच बेहद गहरी ख़ामोशी थी जिसे कोई भी अपनी तरफ से तोड़ने की कोशिश नहीं कर रहा था 



करीब पौने घंटे या घंटे भर बाद गाड़ी का इंजन बंद हों से मैं अपने ख्यालो से बाहर आया मोसम में थोड़ी ठण्ड से थी मैं कुछ कांपने सा लगा और फिर राणाजी के पीछे पीछे चल पड़ा करीब दस मिनट हम पैदल चले और फिर उस अंधरे में मैंने जो देखा बस देखता ही रह गया मेरे सामने एक मैदान सा था जैसे कोई अखाडा हो जहा थोड़ी थोड़ी दूर मशाले जल रही थी 



राणाजी आगे बढ़ने लगे तो मैं भी पीछे चल दिया कुछ बेशक ये मैदान सा था पर अब बहुत झाडिया और कांटे दार पेड़ से थे तो रस्ता बनाते हुए चलना पड़ रहा था जैसे ही हमने वो पार किया सामने एक बावड़ी सी थी जो सुखी पड़ी थी और उसके ठीक सामने से गुजरती वो सीढिया जो ऊपर पहाड़ी पर जा रही थी मैंने देखा ऊपर भी कुछ मशाले जल रही थी उनकी रौशनी जुगनुओ की तरह टिमटिमा रही थी 



राणाजी- ये लाल मंदिर है बेटे 



“बेटे, ” सुनकर दिल को बेहद सुकून सा पंहुचा वर्ना ऐसा लगता था की मुद्दते ही बीत गयी थी अपने पिता के मुह से य शब्द सुने हुए 



मैंने हाथ जोड़ कर उस भूमि को प्रणाम किया और फिर राणाजी के चरणों में धोक दी 



वो- कुंदन मैं ये नहीं पूछूँगा की तुमने ये बीड़ा अपने कंधो पर क्यों उठाया क्योकी तुम्हारी रगों म जो खून उबाल मार रहा है मुझे पता नहीं क्यों सूझ गया था की तुम ये दुस्साहसी अवश्य करोगे मैंने जब भी तुम्हारी इन नीली आँखों में देखा हमेशा मुझे वो दिखा जो मैं शायद नहीं देखना चाहता था बेटे


देखो अपने आस पास इस जगह को तुम्हे यहाँ पर गहरा सन्नाटा सुनाई दे रहा होगा पर मुझे यहाँ वो शोर सुनाई दे रहा है वो चीख-पुकार सुनाई दे रही है जो मेरे इन बूढ़े कानो के पर्दों को फाड़ रही है ऐसे ना देखो बेटे यहाँ कोई ठाकुर नहीं कोई सरपंच नहीं तुम्हारे सामने बैठा है तो बस एक बुढा बाप जो अपने कांपते घुटनों और इन निरीह आँखों से अपने अतीत को तुममे देख रहा है 
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04-27-2019, 12:34 PM,
#24
RE: Antarvasna kahani नजर का खोट
वक़्त पता नहीं कब इतनी जल्दी बीत जाता है पता नहीं चल पता अभी कल की ही तो बात लगती है जब तुम मेरी ऊँगली पकड़ कर चलना सीख रहे थे और आज बेटा इतना बड़ा हो गया वो थोडा सा सरक कर मरे पास आये और बस हौले हौले मेरे बालो पर आना हाथ फेरने लगे आज मैंने पहली बार आने पिता को महसूस किया था आज राणाजी के हाथो में एक नरमी सी थी और आवाज बेहद सर्द जैसे कही दूर इ आ रही हो 



कुंदन ये बावड़ी जहा हम बैठे है बल्कि ये पूरी जगह मुझसे बहुत जुडी है मेरा बचपन यहाँ बीता जवानी यहाँ बीती मैं यहाँ पहली बार तुम्हारे दादा जी के साथ आया था और फिर यही का होकर रह गया पता नहीं कितनी यादे जुडी है यहासे उन्होंने कुछ पल साँस लिया और फिर अपनी आँखों को साफ़ सा किया बेटे ये जो बावड़ी है ना इसकी खुदाई हमने अपने हाथो से की थी 



शायद तुम्हे हमारी बाते समझ नहीं आ रही पर हमे लगा की एक पिता को उसके बेटे को कुछ बाते अवश्य बतानी चाहिए बल्कि हम तुम्हारे आभारी है की तुम्हारी वजह से हमारे अन्दर का वो पिता आज साँस ले पाया जो शायद झूठी चोधर में कही दब सा गया था 



राणाजी की आवाज थोड़ी बाहरी सी होने लगी थी कांप सी रही थी तभी ऊपर किसी ने घंटा बजाय जो इशारा था की सुबह का पहला पहर शुरू हो गया है और राणाजी उठ गए उसी के साथ

मैं बस उनको खुद से दूर जाते देखते रहा जबतक की वो उस घंटे तक ना पहुच गए जो ऊपर जाती सीढियों के पास उस बड़े से पेड़ के निचे लगा था तन्न्न तन्न्न की आवाज दूर दूर तक गूंजने लगी कुल सात बार उन्होंने उसे बजाया और फिर वापिस मेरे पास आगये मैं समझने की कोशिश कर रहा था की आखिर वो क्या रहा है और वो मुझे लाल मंदिर क्यों लेके आये है उन्होंने मुझे इशारा किया तो मैं दौड़ कर गया 

वो- कुंदन ये जो मैदान सा देख रहे हो माथे से लगाओ इसकी मिट्ठी इसमें सच्चे इंसानों का खून है उनकी वीरता की गाथा महसूस होगी तुम्हे 

मैंने उस मिटटी को गले से लगाया कुछ गरम सी लगी वो पिताजी की बातो से लग रहा था की लाल मंदिर की चुनौती को हमेशा से ही शौर्य और गर्व वीरता से जोड़ा गया था पर ना मैं योधा था ना मैं वीर और न मुझे शौक था इस परंपरा को आगे बढ़ने का मुझे मतलब था पूजा के सम्मान की जिसे छीन ने की कोशिश अंगार ने की थी जो काम मैं उस दिन पूजा की कसम से ना कर पाया था वो मैं इस चुनौती से कर सकता था ऐया मुझे विश्वाश था 

राणाजी – बेटे ज्यादा मेरे पास कहने को है नहीं तुम थोड़े में ही समझना दुनिया के और लोगो की तरह मेरी भी अब एक ही आस है की मुझ बूढ़े की अर्थी उसके बेटो के कंधे पर जाए , मैं नहीं चाहता की मैं अपने बेटे को कंधा दू तो मेरी इतनी लाज रखना तुम 
ये कह कर राणाजी ने मेरे आगे अपने हाथ जोड़ दिए सच में ही थोड़े में बहुत कुछ कह गए थे वो मैंने जिंदगी में पहली बार उस दिन उनकी आँखों में नमी देखि जिस इन्सान का हर शब्द क आदेश होता था आज वो मेरे सामने हाथ जोड़े खड़ा था मैं तो शर्म से ही मर गया मैंने बस अपने पिता के पाँव पकड़ लिए 

तभी किसी के आने ही आहात हुई तो हमारा ध्यान उस और गया एक पुजारी सा आदमी चला आ रहा था 

पुजारी- वीरो के वीर ठाकुर हुकम सिंह जी सात बार घंटा बजते ही मैं समझ गया था की आज सरकार खुद यहाँ आ पहुचे है तो आज माता की याद आ ही गयी 

राणाजी- माता को तो पल पल याद किया है पर बस नफरत सी हो गयी थी यहाँ से पुजारी जी 

वो- मैं समझता हु राणाजी 

राणाजी- बाकि मेरे आने का कारण तो आप समझ ही गए होंगे 

पुजारी- निसंदेह, परन्तु मैं चकित हु की ठीक बारह साल बाद आखिर ऐसी क्या वजह हो गयी जबकि आपने स्वयं कहा था की अब कोई चुनौती नहीं होगी न कोई देगा ना कोई स्वीकार करेगा 

राणाजी- कदापि हम नहीं आते परन्तु परिस्तिथि इस प्रकार हो गयी की हमारे संज्ञान के बिना चुनोती दी गयी और स्वीकार हुई अब स्वीकार चुनौती को पलट सके इतना साहस हममे नहीं 

पुजारी- कौन है वो वीर देवगढ़ की तरफ से 

राणाजी- ये हमारा छोटा बेटा ठाकुर कुंदन सिंह 

पुजारी ने हैरानी से मेरी तरफ देखा और बोले- राणाजी गलत किया ये तो अनर्थ अहि और फिर अभी इसकी उम्र ही क्या है बाकि माता की मर्जी 

राणाजी- पुजारी जी , आप जयसिंह गढ़ वालो के पास मुनादी करवाइए 

पुजारी- उसकी आवश्यकता नहीं ठाकुर जगन सिंह कल आ चुके है यहाँ 

बातो बातो में पता नहीं चला की भोर का सूरज दस्तक देने लगा था चारो और हल्का हल्का दिन निकलने लगा था रौशनी सी होने लगी थी और तभी मेरी नजर उसी मैदान के बीचो बीच एक स्तम्भ पर पड़ी जो शायद चार- पञ्च फूट ऊँचा होगा कभी सफ़ेद रहा होगा पर अब काई लगी थी और उसके बीच में धंसी थी एक तलवार 

मैं- वो क्या है 

पुजारी- अपने पिताजी से पूछो 

मैंने राणाजी की तरफ नजर की तो वो बोले- ये विजेता की तलवार है हर बार जितने वाला अपनी तलवार यही छोड़ जाता है ताकि उसकी विरासत कोई और संभाले 

मैं- पर ये किसकी है 

पुजारी कुछ बोलने ही वाला था तो पिताजी बोले- छोड़ो इन बातो को हम जरा माता के चरणों में शीश नवाज के आते है तुम आस पास नजर डाल लो और ज्यादा दूर जाना नहीं 

पिताजी के जाते ही मैं उस स्तम्भ के पास गया और उसको देखने लगा खून के कुछ धब्ब आज भी उस पर और उस तलवार पर भी खून सुखा हुआ था तभी मुझे वहा पर कुछ निचे एक तलवार और दिखी 

मैं- पुजारी जी दो दो विजेता 

वो- नहीं ये निचे वाली तलवार विजेता की है और ऊपर वाली हारने वाले की 

मैं- हारने वाले की 

वो- कुनदन हां उस हारने वाले की जो हारकर भी अमर है और विजेता भी दरअसल उस दिन विजेता तो बस एक था पर हार हुई थी मित्रता की दो तन एक मन हार गए थे उस दिन सच कहू तो कभी कभी यकीन नहीं होता खैर, सब समय का दोष है 

मैं – मैं कुछ समझा नहीं पुजारी जी 

वो- समझना ही क्या बस नियति है जैसे तुमने चुना उन्होंने भी चुना था 

मैं- ये विजेता की तलवार किसकी है 

वो- ठाकुर हुकुम सिंह जी की तुम्हारे पिता की 

जैसे ही पुजारी के मुह से वो शब्द निकले मेरे पैरो के नीची से जमीन ही निकल गयी बारह साल पहले मेरे पिता ने चुनौती जीती थी पता नहीं वो मेर लिए गर्व का क्षण था या आश्चर्य का पता नहीं कैसे कैसे जज्बात उमड़ आये मेरे मन में 

मैं- और ये दूसरी तलवार किसकी है 


“है एक सच्चे इन्सान की जो आज भी मुझमे जिन्दा है ” राणाजी ने हमारी तरफ आते हुए कहा
राणाजी- पुजारी जी आवश्यक तैयारिया जल्दी से करवाइए क्योंकि बरसात का महिना है ऊपर से अमावस के भी कुछ दिन है हम कुछ आदमी भेज देते है आपकी सहायता हेतु बाकि आप हमे सूचित करते रहे 



फिर उनहोंने मुझे लिया और वापिस चलने लगे 
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04-27-2019, 12:34 PM,
#25
RE: Antarvasna kahani नजर का खोट
कपडे ज्यादा ही गंदे हो जाते थे तो सोचा की कुछ कपड़े पूजा के घर रख देता हु लाकर हां यही सही रहेगा उसके बाद पहुच गया सीधा उसके घर हाथ मुह धोया और लेट गया खाट पर कुछ देर बाद वो चाय ले आई 

मैं- पूजा तू आएगी लाल मंदिर 

वो- नहीं मेरा जी घबराता है 

मैं- किसलिए 

वो- मैं पहले ही नाराज हु तुझे इस मामले में अब और गुस्सा मत दिला 

मैं- तू आएगी ना 

वो- कहा ना नहीं 

मैं- भरोसा नहीं मुझ पर 

वो- खुद से ज्यादा भरोसा है पर डर भी लगता है 

मैं- डर किसलिए 

वो- कही तुझे कुछ हो गया तो 

मैं- जब तू मेरे साथ है तो भला क्या हो सकता है मुझे 

वो- चाय पि ठंडी हो रही है 

उसकी निहारते हुए मैंने अपनी चाय ख़तम की 

मैं- और बता 

वो- कुछ नहीं बाकि सब तुझे पता ही है 

मैं- कहा पता है तू बताती भी नहीं कुछ 

वो- समय आएगा जब सब बता दूंगी 

मैं- और समय कब आएगा 

वो- उसकी मर्ज़ी जब आये तब आये चल अब तू जा मुझे नहाना है 

मैं- तो नहाले मैं क्या मना कर रहा हु 

वो- तो जा फिर 

मैं- ना थोड़ी थकान हो रही है कुछ देर लेट जाता हु 

वो- कुंदन तंग क्यों करता है 

मैं- मेरा भी नहाने का मन है 

वो- जा पहले तू नाहा ले 

मैं- साथ नहाएगी 

वो- चपल उतारू क्या 

मैं- उतार ले 

वो- शैतान कही के अब जा भी मुझे नहाना है 

मैं उठा और पूजा के पास गया 

मैं- मुझसे कैसा पर्दा 

वो- कहा है पर्दा 

मैं- तो जाने को क्यों कह रही हो कही तुम ये तो नहीं सोच रही की कुंदन तुम्हे नहाती को देख लेगा

वो- देख लेगा तो क्या होगा 

मैं- फिर जाने को क्यों बोल रही 

वो- बस ऐसे ही 

मैं- तो थोडा प्यार से बोल हम तो जिन्दगी से चले जाए 

“श्ह्ह्हह्ह्ह्हह्ह फिर ऐसा ना बोलना ” उसने मेरे होंठो पर ऊँगली रखते हुए कहा 

मैं- तो फिर क्यों ये पर्दा 

वो- मेरा जिस्स्म देखना चाहता है तू 

मैं- नहीं तेरी रूह को महसूस करना चाहता हु जिस्म का क्या माटी है एक दिन रख हो जाए 

वो और मैं क दुसरे के बेहद नजदीक खड़े थे उसकी सांसे हलकी सी भारी हो चली थी और कुछ ऐसा ही हाल मेरा था 

वो- कुंदन क्या चाहता है तू 

मैं- यही की तू नहाले कितनी बदबू आ रही है तुझसे 

वो- हटबदमाश चल जा अब 

हस्ते हुए मैं उसके घर से बाहर आया और उसने किवाड़ बंद किया मैं गाव की तरफ हो लिया शाम होने में थोडा टाइम था गाँव थोड़ी दूर ही रह गया था की रस्ते में मुझे वो ही छजे वाली दिखी अपनी सहेली के साथ उसने भी मुझे दूर से आते हुए देख लिया था तो उसने अपनी सहेली से कुछ कहा वो आगे हो गयी मैं भी साइकिल से उतर लिया 

वो तो सीधा ही मुझ पर चढ़ गयी – क्या जरुरत थी आपको ऐसा करने की , फ़िल्मी हीरो हो क्या आप 

मैं- क्या हुआ बताओ तो सही 

वो- देखिये कितने मासूम बन रहे है जैसे कुछ पता नहीं हो क्या सारे गाँव में आपकी ही बात हो रही है आखिर क्या जरुरत थी , हमारा तो दिल ही बैठ गया जबसे ये मनहूस खबर सुनी 

मैं- और दिल क्यों बैठ गया आपका 

वो- आपको कुछ हो गया तो या खुदा माफ़ी तौबा तौबा 

मैं- जब आपकी दुआए साथ है तो मुझे भला क्या होगा सरकार 

वो मुस्कुरा पड़ी पर फिर से गुस्सा होते हुए बोली- आप वापिस आयेंगे ना 

मैं- आपको ज्यादा पता इस बारे में 

वो- कल पीर साहब की मजार पे आपका इंतजार करुँगी दोपहर को 

मैं- पक्का आऊंगा 

वो- अभी जल्दी है जाती हु 

मैंने अपना सर हिलाया इससे मिलके साला दिल बड़ी तेजी से धड़क जाता था मेरा कही ना कही अब दिल कहता था कुंदन तू अकेला नहीं है तेरे भी अपने है जो थाम लेंगे तुझे जब भी तू गिरेगा घर आया तो सीधा माँ सा के पास गया भाभी और चाची वही थी 

माँ- कहा गया था 

मैं- जमीन पर 

वो- आ बैठ पास मेरे 

मैं बैठ गया 

वो- मैं नाराज हु तुमसे 

मैं सर निचे करके बैठ गया 

माँ- जस्सी चंदा तुम रसोई में जाओ मुझे इससे कुछ जरुरी बात करनी है 

जल्दी ही कमरे में बस हम दोनों थे

माँ- मैं नहीं जानती और न ही पूछूंगी की तूने ऐसा क्यों किया क्योंकि मैं जानती हु तेरी रगों में भी राणाजी का खून जोर मार रहा है पर इतना जरुर कहूँगी की मुझे मेरा बेटा वापिस चाहिए क्योंकि ये जिन्दगी मैंने जी है नो महीने मैंने तकलीफ उठाई है ताकि तू जी सके और मैं तुझसे अपनी वो ही जिन्दगी वापिस मांग रही हु , चाहे धरती- असमान एक करना पर मुझे मेरी जिंदगी चाहिए 

मैं- माँ सा, कुंदन वापिस आएगा लाल मंदिर से 

वो- बारह साल पहले तेरे पिता लाल मंदिर गए थे पर वहा से राणाजी वापिस आये हुकुम सिंह जी नहीं कुंदन तू अभी उस चीज़ से दूर है इसलिए नहीं समझता पर हम ने इस घर ने उस दर्द को महसूस किया है जब तेरे बापू सा जीत के आये तो पूरा गाँव खुश था ढोल नगाड़े बज रहे थे पर वो खुश नहीं थे वजह ना मैंने कभी पूछी ना उन्होंने बताई पर उसके बाद वो सिमट गए अपने आप में फिर कभी उन्होंने वो मनहूस चौनोती नहीं होने दी अपर हाय रे तक़दीर आज उनका ही बेटा ........... 

मैं- आप आराम करे वर्ना तबियत फिर ख़राब हो जाएगी 

वो- ह्हुम्म्म जस्सी को भेज जरा 

मैं रसोई में गया और भाभी से कहा की माँ बुला रही है और फिर चाची की तरफ मुखातिब हुआ
चाची- कहा था पुरे दिन से 

मैं- जमीन पे गया था वो भी तो करना है मुझे 

वो- इतने में भी कैसे कर लेता है 

मैं- कहो तो आपको प्यार भी कर लू कल मौका दिया नहीं आपने 

वो- मेरी तो जान जल रही है और तू मजाक कर रहा है 

मैंने चाची के गालो पर एक पप्पी ली और बोला चाची जबसे आपके साथ किया है सुलग रहा हु फिरसे करने को और अप हो के दुरी बनाये हुई हो ये भी क्या बात हुई 

वो- और जो तूने परेशान किया 

मैं- अब कर लेने दो क्या पता फिर रहे न रहे 

चाची- मैं थप्पड़ मारूंगी जो ऐसे फिर बोला पता नहीं क्या मजा आता है तुझे हम सब का जी जलाने में 

तभी भाभी आ गयी और बोली- चाची माँ सा ने कहा है की आज राणाजी घर पर नहीं है तो मैं उनके साथ उनके कमरे में सो जाऊ और आप यही कुंदन के साथ रहना क्या पता रात को तबियत बिगड़ गयी तो आप यही के यही संभाल लेंगी और तू भी घर ही रहेगा आज 

मैं- जी भाभी 

मैं तो खुश हो गया था की चाची पूरी रात मेरे कमरे में दबा के चोदुंगा आज जब चाची भाभी के साथ वापिस जा रही थी मैंने धीरे से उसकी गांड सहला दी पर उसने पलट कर नहीं देखा मैं अपने कमरे में चला शाम कब रात में बदल गयी पता नहीं चला 
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04-27-2019, 12:34 PM,
#26
RE: Antarvasna kahani नजर का खोट
फिर मुंशी जी आ गए उन्होंने कहा की तार भी कर दिया और टेलीफोन पर भी बात हो गयी जल्दी ही छोटे ठाकुर आ रहे है तो मुझे भी एक तसल्ली हुई और भाभी के चेहरे पर भी मुस्कान थी तो मैंने इशारो से उन्हें छेड दिया तो वो गुस्सा करने लगी पर वो गुस्सा प्यार भरा था खैर धीरे धीरे घर की बत्तिया बुझने लगी मैं चाची के घर ताला लगा ही आया था और फिर चाची मेरे कमरे में आई दरवाजा बंद किया 

मैं- सब सो गए 

वो- हाँ 

मैंने चाची को अपनी बाहों में भर लिया और सीधा उसके होंठो को चूमने लगा 


वो- दो मिनट रुक तो सही 

मैं- ना अब नहीं रुकुंगा आज पूरी रात आपको बस प्यार करूँगा 

और चाची की गांड को सलवार के ऊपर से ही दबाते हुए उसके रस से भरे होंठो को चूमने लगा चाची भी मेरा साथ देने लगी उसके होंठ खुलते गए और हमारी जीभ आपस में टकराने लगी उफफ्फ्फ्फ़ चाची बी तरह से मुझ से लिपट गयी और दीवानो की तरह चूमा-चाटी करने लगे हम बहुत देर तक बस होंठो की प्यास बुझाते रहे फिर मैंने उसके कपडे उतारे और कच्छी ब्रा में ही उसको पलंग पर पटक दिया और खुद भी नंगा हो गया 

चाची की निगाह मेरे खड़े लंड पर ही थी मैं चाची के ऊपर लेट गया और उसको फिर से चूमने लगा वो अपना हाथ निचे ले गयी और लंड को मुट्ठी में भर लिया चाची के गरम हाथ को लंड पर महसूस करके मजा आ गया मैंने उसकी ब्रा को उतार दी और एक चूची को भीचते हुए दूसरी को मुह में ले लिया चाची बिस्तर पर तड़पने लगी मस्ती के मारे 

जल्दी ही मैंने उसकी दोनों चुचियो को पि पि कर लाल कर दिया और चाची भी मेरे लंड को अपनी चूत पर कच्छी के उपर से ही घिस रही थी कमरे में जैसे तुफान सा आ गया था 

मैं अपना मुह चाची के कान के पास ले गया और धीरे से बोला- पूरी रात चोदुंगा तुझे आज 

चाची- चोद ले 

मैं- कच्छी उतार दे 

चाची ने अपनी गांड को थोडा सा ऊपर उठाया और फिर अपने उस आखिरी वस्त्र को भी उतार दिया कुछ देर होंठो को चूमने के बाद मैंने चाची की टांगो को चौड़ी की और अपने होंठो को उसकी चूत पर लगा दिया वो ही मदहोश करने वाली खुशबु मुझे पागल बहुत पागल कर गयी “पुच ” मैंने जैसे ही चूत की खाल को चूमा चाची का बदन हिलने लगा वो धीरे धीरे आह आह करते हुए अपने पैर पटकने लगी 

मैंने अपनी दो ऊँगली चूत में घुसा दिया उर अन्दर बाहर करने लगा तो चाची की चूत और ज्यादा रस छोड़ने लगी जिसे मैं धीरे धीरे पीने लगा चाची की चूत का दाना बहुत नमकीन था जब मेरी खुरदरी जीभ उस पर रगड़ देती तो चाची की जैसे जान ही निकल जाती अब मैंने अपनी उंगलिया बाहर निकाल ली और चाची की चूत के अंदरूनी लाल हिस्से में अपनी जीभ को बार बार अन्दर- बाहर करने लगा चाची तो जैसे मस्ती के सातवे आसमान पर पहुच गयी थी 

बार बार अपनी गांड को ऊपर निचे करते हुए वो चूत चुसाई का भरपूर मजा ले रही थी और मैं भी ये ही कोशिश कर रहा था की जितना हो सके उसकी चूत से वो मादक रस बाहर निकाल सकू वैसे भी चाची की चूत हद से ज्यादा रसीली थी और बहुत समय से बिना चुदी होने के कारण उसकी खूबसूरती और ज्यादा बढ़ गयी थी और फिर उसने खुद को सजाया संभाला ही कुछ इस तरह से था 
अगले कुछ मिनट मैं बस चाची की चूत के रस को चाटता रहा पता नहीं कब वो अपने स्खलन की और बढ़ने लगी थी उसने अपनी टांगो को मेरे सर के आजू- बाजु लपेट लिया और अपना पूरा दवाब बनाते हुए झड़ने लगी चूत से टपकते उस सफ़ेद पानी को मैंने अपने गले में उतार लिया और फिर धम्म से वो बिस्तर पर पड़ गयी 

पर हम तो अभी बाकि थे मैंने अपने लंड पर थूक लगाया और चाची की चूत से लगाके उसको धक्का मारा चाची अभी अभी झड़ी थी लंड के लिए तैयार नहीं थी पर अपना रुक पाना और मुशिकल था तो वो कराहती रही और मैंने लंड को जड तक अनदर कर दिया और चाची की टांगो को अपने कंधो पर रख कर उसे चोदने लगा वो धीरे धीरे अपनी झूलती चुचियो को दबाते हुए चुदाई का मजा लेने लगी 

मेरा लंड हर धक्के पर चाची की चूत की गहराइयों में जा रहा था जिसे वो महसूस करके मस्ता रही थी कमरे में थप थप की आवाज आ रही थी पर चाची और मैं अपने जिस्म की आग को बुझाने में हद से ज्यादा डूब जाना चाहते थे अब मैंने चाची के पैर अपने कंधो से उतारे और निचे करने चोदने लगा चाची सी सी करते हुए मेरे लंड को ले रही थी 

आपस में जिस्मो की रगड़ाई का मजा लेते हुए हम दोनों अपनी अपनी मंजिल की और बढ़ रहे थे वो तो एक बार पहले ही झड़ गयी थी तो उसको बहुत ज्यादा मजा आ रहा था मैंने अपने दांत चाची के गालो पर पर गड़ाने लगा पल पल मैं उसको बस पा लेना चाहता था अपनी आत्मा भरने तक और शायद वो भी ऐसा ही चाहती थी चाची का जिस्म एक बार फिर झटके खाते हुए झड़ने लगा था और अपना भी काम बस होने को ही था तो मैंने अपने लंड को बाहर खीचा और उसके पेट पर आपना वीर्य गिरा दिया 


आपस में जिस्मो की रगड़ाई का मजा लेते हुए हम दोनों अपनी अपनी मंजिल की और बढ़ रहे थे वो तो एक बार पहले ही झड़ गयी थी तो उसको बहुत ज्यादा मजा आ रहा था मैंने अपने दांत चाची के गालो पर पर गड़ाने लगा पल पल मैं उसको बस पा लेना चाहता था अपनी आत्मा भरने तक और शायद वो भी ऐसा ही चाहती थी चाची का जिस्म एक बार फिर झटके खाते हुए झड़ने लगा था और अपना भी काम बस होने को ही था तो मैंने अपने लंड को बाहर खीचा और उसके पेट पर आपना वीर्य गिरा दिया

चाची ने मेरे वीर्य को साफ़ किया और मैं बगल में लेट गया चाची के पैर पर अपना पैर रख के वो भी मुझसे लिपटने लगी एक जोरदार चुम्बन के बाद हमने चादर ओढ़ ली और बात करने लगे 

मैं- कितनी गरम है तू मेरी जान 

वो- चाची से सीधे जान 

मैंने एक ऊँगली उसकी चूत में दे दी और बोला- जान नहीं है क्या 

वो- अब तू कुछ भी कहले 

मैं- सच में चाची माल है तू तेरी लेने में बहुत मजा आता है एक आग है तेरे अन्दर 

ये कहकर मैंने चूत से ऊँगली निकाली और चाची को बोला- मुह खोल देख चख कर तेरी चूत का पानी कितना मस्त है 

वो- छि गंदे 

मैंने वो ऊँगली चाची के होंठो पर फेरी थोडा रस उसके होंठो पर लगाया और फिर उसके होंठो पर जीभ फेरने लगा 

मैं- देख कितना मस्त पानी है तेरा 

चाची का चेहरा लाल होने लगा मेरी ये गन्दी बाते सुनकर उसने धीरे से मेरे लंड को पकड़ लिया 

मैं- आज पूरी रात चुदेगी ना 

वो कुछ ना बोली 

मैं- बता ना 

वो- हां 

मैं- ऐसे नहीं कह चुदुंगी 

वो- चुदुंगी 

मैं- ये हुई ना बात चल अब घोड़ी बन और अपनी मस्तानी गांड दिखा मुझे 

शर्माती हुई चाची घोड़ी बन गयी और मैं बस उसकी गांड को देखने लगा उफ़ कितने प्यारे चुतड थे उसके जैसे कोई धेरी हो मखमल की मैं आहिसता आहिस्ता से चाची के चूतडो पर हाथ फिराता रहा बीच बीच में मेरी उंगलियों ने चाची की गांड के भूरे छेद को भी छुआ तो चाची की गांड तेजी से हिलने लगी मैंने धीरे से गांड के छेद को चूम लिया और बोला- चाची तेरी गांड बहुत ही सुन्दर और प्यारी है जी करता है इसको भी चूमता रहू 

चाची- किसी ने रोका है क्या तुझे ये बाण तेरा है जैसे चाहे प्यार कर मेरे राजा 
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04-27-2019, 12:34 PM,
#27
RE: Antarvasna kahani नजर का खोट
उसकी ये बात सुनते ही मेरा जोश बढ़ गया मैंने दो उंगलिया चूत में डाल दी और चाची की गांड के छेद पर अपने होंठ रख कर चूमने लगा चाची के दोनों छेदों में हलचल होने से उसके बदन में भी तूफ़ान आने लगा उसके पैर कांपने लगे और गांड बुरी तरह से हिलने लगी मेरी जीभ तेज तेज उस छेद को चूम रही थी जैसे उसमे घुस जाना चाहती थी बहुत देर तक मैं ऐसा ही करता रहा इधर मेरे लंड में तेज ऐंठन होने लगी थी 

मैं- चूतडो में डालू आज 

वो- अभी नहीं यहाँ नहीं मेरे घर या कुवे प मौका दूंगी तुझे 

मैंने अपने सुपाडे को पीछे से चूत पर लगाया और अन्दर धकेलने लगा तो चाची ने आहे भरते हुए अपनी गांड को पीछे कर लिया और एक बार फिर से हमारी चुदाई शुरू हो गयी चूतडो से लेकर उसकी पीठ और कंधो तक को सहलाते हुए मेरा लंड उसकी चूत में आतंक मचाये हुए था और जब मेरे हाथ उसकी चुचियो तक पहुचे तो कसम से मजा ही आ गया उसने अपने अगले हिस्से को थोडा सा उठा लिया जिस से मुझे चूची दबाने में सहूलियत होने लगी 

कुछ देर ऐसे ही चोदने के बाद मैंने उसे फर्श पर उतार लिया और खड़े खड़े ही पीछे से उसको चोदना चालू किया मेरे हाथ उसकी चुचियो को कस कस के दबा रहे थे और होंठो उसकी गर्दन गालो पर अपना कमाल दिखा रहे थे हम दोनों धीमे धीमे सिस्कारिया भरते हुए चुदाई का दूसरा दौर खेल रहे थे चाची ने अपने हाथ पास रखी टेबल पर टिका लिए और गांड को पीछे उभार कर चुदाई करवाने लगी 

मैं अब तेज तेज धक्के लगाने लगा था और वो भी मेरा पूरा साथ दे रही थी करीब आधे घंटे तक ये दौर चला उसके बाद एक बार फिर मैंने अपना पानी उसकी गांड पर गिरा दिया और बिस्तर पर पड़कर अपनी सांसे दुरुस्त करने लगा चाची ने मेरा वीर्य साफ किया और सलवार पहनने लगी 

मैं- क्या हुआ 

वो- पेशाब करने जा रही हु और जीजी को भी देख आऊ 

उसने कपडे दुरुस्त किये और बाहर चली गयी मैंने भी चादर लपेटी और बाहर आ गया छत के कोने में ही मैने पेशाब किया करीब दस मिनट बाद वो भी आ गयी 

मैं- क्या हुआ 

वो- सब सही है सो रहे है 

मैंने कुण्डी लगाई और तब तक वो कपडे उतार चुकी थी एक बार फिर हमारे नंगे जिस्म चादर में घुस चुके थे 

वो- बाहर ठण्ड है 

मैं- गर्मी दे दू 

वो- गर्मी तो लुंगी ही 

मैं- चाची एक बात कहू 

वो- बोल 

मैं- मैं चाहता हु की तू खुल के चुद मुझसे मतलब तेरी आग दिखा मुझे जला दे तेरी चूत की गर्मी में जैसे मैं तेरे होंठो को चूसता हु वैसे ही तू कर मेरे लंड पर बैठे तो जोश हो तुझमे 

चाची- ठीक है तेरी ये इच्छा भी पूरी करुँगी पर आज नहीं अभी सो जा वर्ना सुबह उठ नहीं पाएंगे 

मैं- एक बार और तो करने दे 

वो- नहीं फिर उठ नहीं पाऊँगी अभी ऐसे ही चिपट जा मुझसे मेरी बाहों में सो जा 

मैंने भी ज्यादा जोर नहीं दिया चाची के बदन से छेड़खानी करते हुए पता नहीं कब नींद आ गयी सुबह जाने से पहले चाची ने मुझे कपडे पहनने को कहा और फिर मैं कपडे पहन कर दुबारा सो गया पर नसीब में नींद कहा जल्दी ही भाभी ने झिंझोड़ दिया मैंने डूबती आँखों से देखा वो चाय लिए खड़ी थी तभी मेरा ध्यान मेरे लंड पर गया जो पूरी तरह से मेरे कच्छे में तना हुआ था और चादर में तम्बू सा बनाये हुए थे 


भाभी की नजर भी उस पर पड़ी वो बस मुस्कुरा पड़ी और बोली- चाय टेबल पर राखी है पी लेना और बाहर जाने लगी मैं उसकी मटकती गांड को देखने लगा नहाने के बाद दोपहर तक मैं माँ सा के कमरे में ही रहा फिर मुझे याद आया की दोपहर बाद मुझे पीर साहब की मजार पर उस से मिलना है तो मैंने अपनी साइकिल उठाई और हो लिया उस रस्ते पर जो शायद मेरी मंजिल का था

दोपहर का समय था तो इका दुक्का लोग ही थे और फिर जल्दी ही आइने अपने सपनो की रानी का दीदार किया चेहरे को दुपट्टे में छुपाये वो मेरे पास आई और बोली यहाँ से थोड़ी दूर जंगल की तरफ एक बरगद का पेड़ है वहा मिलिए तो मैंने सर हिला दिया बाबा के आगे सर झुकाके मैं मिश्री खाता हुआ उसके बताये पेड़ के पास आ गया बहुत सही जगह चुनी थी उसने मिलने के लिए 

आँखों ने आँखों को अपने अंदाज में सलाम किया और इस्तकबाल किया और हम वही बैठ गए 

वो- जानते है जबसे हमे मालूम हुआ हमारा चैन खो गया 

मैं- वो क्यों भला 

वो- इसी का जवाब तो आपसे लेने आये है 

मैं- मेरे पास कहा इसका जवाब 

वो- जब चैन आपने चुराया तो जवाब भी आप ही दे 

मैं- मैंने सोचा आपने मेरा चैन चुराया 

वो- हमारी ऐसी फितरत नहीं हम तो हक़ से ले लेते है ये चुराने में वो बात कहा 

और वो हस पड़ी मैं भी हस दिया कितनी बेबाकी कितनी मासूमियत 

मैं- और जो मैं बेचैन हु मुझमे जो ये तन्हाई इसका दोष मैं किसको दू 

वो- मैं क्या जानू कोई मर्ज़ है तो हकीम साहब को मिले दवा दारू करवाए 

मैं- और जब कातिल सामने हो तो कहा जाये 

मेरी बात सुनते ही उसके चेहरे का रंग उड़ गया और वो हसने लगी 

फिर उसने अपने झोले से एक ताबीज लिया और मुझे देते हुए बोली- आपके लिए दुआ मांगी आज इसे बाँध लीजिये आपकी रक्षा करेगा 

मैं- आप ही बाँध दो ना 

वो मुस्कुराई और फिर बोली- धागा नहीं है मेरे पास 

हाय रे ये मासूमियत 

मैं- तो पढाई के अलावा आप क्या करती है 

वो- कुछ नहीं घर के काम और कभी कभी गाने सुन लिया करती हु दिल करता है तो यहाँ आ जाती हु यहाँ जो शांति मिलती है तो रूह को अच्छा लगता है 


मैं- वो तो है 

वो- आप बताइए 

मैं- कुछ नहीं पढाई के बाद घर के काम करता हु बापूसा की जमीन संभालता हु और आप ही की तरह गाने सुन लेता हु 

वो- जुम्मन काका के लिए आपने पंचायत से बगावत कर ली हमने सुना 

मैं- जाने दो ना क्या रखा इन बातो में 

वो- आप सच में गरीबो के मसीहा है 

मैं- आपको ऐसा लगता बाकि सब तो नालायक बोलते 

वो- किसी दुसरे के लिए कौन इतना करता है रब्ब का बंदा और कहा मिलेगा आपके अलावा 

मैं- इतनी भी तारीफ ना कीजिये कुछ कालापन भी है मुझमे 

वो- हम सभी में कुछ ना कुछ कमी तो होती ना इसीलिए तो इन्सान है 

उसकी बातो में जो सादगी थी सीधे दिल में उतरती थी बहुत अच्छा लग रहा था उसके साथ बाते करके जैसे की बस... अब मैं कहू तो क्या कहू 

मैं- अब कब मिलोगी 

वो- जब आप कहोगे 

मैं- तो फिर जाओ ही नहीं 

वो- जाना तो होगा ना पर इतना कह सकती हु की जल्दी ही मुलाकात होगी 

मैं- कब , अब चैन नहीं मिलेगा 

वो- तो आ जाना रास्ता आपको पता मंजिल आपको पता किसने रोका है 

मैं- पक्का 

वो- हां वैसे परसों शाम आपके खेतो की तरफ जाउंगी तो ........... वो बस मुस्कुरा दी 

अब ये छोटी छोटी मुलाकाते ही हो सकती थी तो इसी से सब्र कर लिया कभी उसको जाते हुए देखते कभी उस ताबीज को जो वो हाथ में दे गयी थी उसके जाने के बाद भी पता नहीं कितनी देर बाद मैं वही पर रुका रहा हर चीज़ पता नहीं क्यों बड़ी प्यारी प्यारी लग रही थी 

खैर, कब तक रुकते वहा घर आये तो देखा राणाजी की गाड़ी बाहर ही खड़ी थी मैं अन्दर आया घर में अजीब सी शांति थी मैं माँ के कमरे में गया तो एक डॉक्टर भी था 

राणाजी- सहर से बड़े डॉक्टर बाबु को बुलवाया है इनका कहना है की तुम्हारी माँ सा को बड़ा सदमा लगा है उनका विशेष ख्याल रखना होगा वर्ना लकवा भी मार सकता है हमने व्यवस्था की है की एक नर्स सदा इनके पास रहे और डॉक्टर साहब से भी अनुरोध किया है की हर तीसरे दिन आकार इन्हें देख ले 
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04-27-2019, 12:35 PM,
#28
RE: Antarvasna kahani नजर का खोट
मेरा तो दिमाग ही घूम गया ये सुनकर आँखों से दो बूंद पानी निकल कर कब निचे गिर गया पता ही नहीं चला मैं वहा से बाहर आकर बैठ गया और खुद को कोसने लगा ये जो भी हो रहा था इसका जिम्मेदार मैं ही तो था इस मोड़ पर मुझे अपनों का ही तो साथ सबसे जरुरी था और अपने ही इस हाल में थे मेरी वजह से तभी किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा मैंने देखा भाभी थी 

वो- नाश्ता लगा दू 

मैं- नहीं भाभी 

वो- क्या हुआ दुःख हो रहा है पहले कभी सोचा नहीं ना पर कोई बात नहीं जिंदगी में कभी ना कभी तो ये सब सीखना ही था 

मैं- ताना मत मारो भाभी 

वो- ताना नहीं मार रही सचाई बता रही हु अगर अपनी नजरो से ठाकुर होने के अहंकार का चश्मा हटा कर देखोगे तो तुम्हे एक बुढा बाप एक लाचार माँ जो बिस्तर पर पड़ी है और के आधी विधवा भाभी दिखेगी, ऐसे क्या देख रहे हो फौजी की घरवाली आधी विधवा ही हो होती है और ऊपर से ठाकुरों की बहु 

भाभी की वो हंसी- मेरे कलेजे पर चोट कर गयी 

वो- कुंदन तुम्हारे भाई जब भी यहाँ से अपनी ड्यूटी पर जाते है हमेशा मुझ से कह कर जाते है की इसका ध्यान रखना भाभी बन कर नहीं इसकी मा बनकर इसे देवर नहीं बेटा समझना मेरा भाई थोडा कम अकाल है नादाँ है पर दिल का साफ है और तुमने भी मुझे हमेशा भाभी नहीं भाभी माँ समझा छोटी से छोटी बात बताई पर कुंदन कभी कभी हमसे कुछ ऐसा हो जाता है की वो सबकी जिंदगी पर असर डालता है 

मैं- भाभी आपकी हर बात आपका हर उलाहना सर माथे पर पर मैं मजबूर हु ऐसा नहीं की ये सब मैंने किसी दवाब में चुना है पर शायद यही नियति चाहती थी मैं भी अन्दर ही अंदर घुट रहा हु जब मैंने राणाजी के कांपते हाथो को देखा जब आपके दिल की कांपती धडकनों को सुना पर भाभी अगर मैं ठाकुर कुंदन नहीं होता तो भी मैं ये ही करता 

भाभी- मैं जानती हु और अब तू मेरी सुन जिसके लिए तू ये कर रहा है मैं उस से मिलना चाहती हु 

मैं- भाभी आप बात को घुमा फिरा कर यही क्यों ले आती है 

वो- क्योकी मैं देखना चाहती हु की वो कौन है जिसने तुम्हे इतना बदल दिया है हम भी तो देखे की किसका जादू तुम पर इतना चढ़ गया है
भाभी- आप समझती क्यों नहीं 

वो- तुम समझाते भी तो नहीं हो मेरी बात पर गौर करो वर्ना जिस दिन ठकुराईन जसप्रीत का हुकम होगा टाल ना पाओगे ध्यान रखना 

भाभी अपनी बात कह कर चल पड़ी और एक बार फिर से मेरी निगाह उसकी गांड पर जम गयी उसके बाद मैं चाची के पास गया 

मैं- कुवे पर चलोगी आज 

वो- नहीं 

मैं- तो यहाँ ही करोगी 

वो- कुंदन मेरी बात सुन तुझे एक बहुत बड़ी चुनौती को पार करना है तू अपनी उर्जा इस खेल में मत बर्बाद कर ना मैं कही भागी जा रही हु जिस दिन तू जितके आएगा पूरी रात तेरी मनचाही करुँगी जो वादा मैंने कल किया था खुद को तेरी बाहों में छोड़ दूंगी पर अभी तू बस इसी बात पे ध्यान रख राणाजी से बात कर उनसे सीख की कैसे तू पार पा सके वहा पर 

मैं- एक बार तो दे दो 

वो- तेरी यही बात बहुत बुरी लगती है तू हर बात को बस मजाक में उडा देता है मैं क्या तेरी दुश्मन हु क्या तू मेरा कुछ नहीं लगता अब तू सुन राणाजी के पास जा और मदद मांग अमावस की रात को समय ही कितना बचा है तयारी कर मेरा इतना तो मान रखेगा गा ना या नहीं रखेगा 

मैं- ऐसा क्यों सोच लिया चाची आपकी कही हर बात हुकम है मेरे लिए 
कुछ वक़्त चाची के साथ बिताने के बाद मैं वापिस घर आ गया और राणाजी को कहा- हुकुम, चाची ने कहा है की आपसे कुछ मदद लू ताकि मैं वो चुनौती पार कर सकू 

राणाजी- बेटे,अपने मन को मजबूत रखना और माता पे छोड़ देना अगर तुम सच्च हो तो वो तुम्हारा साथ देगी तुम्हारा ध्येय पूरा करेगी यदि तुम चाहते हो की मैं तलवारबाजी में तुम्हारी मदद करू तो बारह साल हो गये इन हाथो ने तलवार नहीं उठाई कोशिश करना की तुम्हरे बाद ये चुनौती और कोई कभी न उठा सके यही तुम्हारी असली जीत होगी अगर तुम्हारा सामर्थ्य सच्चा है तो कुछ ऐसा करना की ये परंपरा ही ख़तम हो सके जो काम तुमहरा ये बाप नहीं कर पाया तुम करना यही आशीर्वाद है यही कामना है 

“ये कोई आम मुकाबला नहीं ये प्रश्न है जीवन और मृत्यु का तो समा-दम-दंड भेद आमने वाला हर पैंतरा चाहे वो सही हो या गलत हो आजमाएगा यहाँ अगर कुछ है तो अपनी साँसों की डोर को समेटे रखना ”

मैं- परन्तु आपने वहा जीत हासिल की थी 

वो- वो मामला अलग था जिसको जानना तुम्हारे लिए आवश्यक नहीं और वैसे भी गड़े मुर्दे नहीं उखाड़ने चाहिए हमने तुम्हरे लिए अलग खुराक का प्रबंध किया है तुम आज से वो ही आहार लेना शुरू करोगे समय कम है परन्तु जितना भी है अभ्यास करो और भरोसा रखो जब वहा जाओगे तो केवल इतना याद रखना की आखिर किस लिए तुमने ये बीड़ा उठाया था क्या है तुम्हारा लक्ष्य, अपने लक्ष्य को आँखों के सामने रखना 

बड़ी देर मैं उनके साथ ही रहा फिर आकर अपने कमरे में बैठ गया सोचा डेक चला लू पर फिर जाने दिया चाची आज भी मेरे कमरे में ही थी पर दूसरी खाट पर उसकी बात भी सही थी उसने मुझसे ज्यादा दुनिया देखि थी रात को कब नींद आई कुछ पता नहीं चला आँखे खुली तो हलकी हलकी बारिश हो रही थी सोचा बरसात रुकते ही मैं पूजा से मिलने जाऊंगा 

तभी भाभी मेरे कमरे में आ गयी और बोली- तो क्या सोचा तुमने 

मैं- किस बारे में भाभी 

वो- जाने दो तुमसे बात करना ही बेकार है 

मैं- भाभी मुझे अमावस तक का समय उधार दो 

वो- वैसे मुझे किसी और विषय में भी तुमसे कुछ सवाल पूछने है पर चलो वो भी मैं अब अमावस के बाद ही करुँगी 

मैं- आभार आपका 

भाभी ने एक बेहद गहरी नजर मुझ पर डाली और बोली- खाने में क्या बनाऊ तुम्हारे लिए आज 

मैं- राणाजी ने कहा है की उन्होंने मरे लिए खाने का अलग से इंतजाम किया है वैसे भाभी आपको पता है की लाल मंदिर में ऐसा क्या हुआ था की जिसके बाद बापूसा ने कभी फिर तलवार नहीं उठाई 

वो- कुंदन, वो बारह साल पहले की बाते है भला मुझे कुछ कैसे पता होगा हाँ पर इतना जरुर जानती हु की उसके बाद वो कभी लाल मंदिर नहीं गए अगर तुम्हे इसके बारे में पता करना है तो खुद पूछ क्यों नहीं लेते उनसे 

मैं- उन्होंने टाल दिया इस सवाल को 

वो- तो बेहतर है की तुम भी टाल दो वैसे उम्मींद है तुम्हारे भैया आज दोपहर या शाम तक आ जायेंगे तो उनसे पूछना वो जरुर बता देंगे 

मैं- ओह अब समझा तभी चेहरे पर ये नूर और ये मुस्कान है 

वो- थपड लगाऊ क्या 

मैं- चाहे पीट लो पर ख़ुशी टपक रही है चेहरे से 

वो- तंग मत कर कुंदन वर्ना मैं जाती हु 

मैं- अब क्या इतना भी हक़ नहीं 

वो- क्या बोला तूने 

तब मुझे ध्यान आया मैं वो बाते बोल गया जो अक्सर मैं और पूजा करते थे 

मैं- कुछ नहीं भाभी 

वो- चल तू बैठ मैं आती हु 

मैं भी भाभी के पीछे ही निकल लिया थोड़ी देर माँ के पास बैठा उनकी तबियत पहले से बेहतर लग रही थी फिर चाची ने कहा की कुछ सामान लादे तो मैं बनिए की दुकान तक गया गाँव में हर कोइ बस मेरी ही बात कर रहा था लोग घुर रहे थे तो अजीब सा लगा करीब घंटे भर बाद मैं आया और फिर खाना खाके चल दिया पूजा के घर की और जब तक वहा पहुचा बूंदा बंदी भी रुक चुकी थी 
उसके घर पर ताला नहीं लगा था पर वो दिखी नहीं तो मैंने अपना झोला जिसमे मेरे कुछ जोड़ी कपडे थे वहा रखा और इंतजार करने लगा आधा घंटा बीत गया पर वो ना आई तो मैंने सोचा की जमीन पर चलता हु बाद में मिल लूँगा अब उसका क्या पता किस तरफ निकल गयी हो 

साइकिल को जोर जोर से पैडल मारते हुए करीब दस मिनट बाद मैं उस जमीन के टुकड़े पर पंहुचा तो देखा की पूजा वही पर थी घूम रही थी चारो और पता नहीं क्या कर रही थी पर जब मैं उसके पास गया तो मुझे जैस यकीन ही नहीं हुआ
मुझको अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ मैं उसके पास गया और बस उसको अपने गले से लगा लिया और जब तक जी न भरा उसको छोड़ा नहीं 

वो- क्या जान ही लोगे अब छोड़ो ना 

मैं- पूजा पूजा ये कैसे किया 

वो- कहा था न भरोसा रख 

पूजा ने ट्रेक्टर से खेत में गोडी लगवा लगवा के उस काफी समतल करवा दिया था सारी पथरीली परत किनारे पर पड़ी थी मेरा दिल तो किया की चूम ही लू उसको जो किसी फ़रिश्ते की तरह मेरे जीवन में आई थी 

मैं- पूजा ट्रे बिना ये मुमकिन नहीं हो पाता 

वो- मैंने कुछ नहीं किया कुंदन वो कुवे की फिरनी शाम तक लग जाएगी वैसे तू कहा था दो दिन हुए तू आया नहीं 

मैं- कुछ कामो में उलझा था पर आज का दिन पूरा तेरे साथ 

मैंने कहा आ बैठ साइकिल पे 

वो- आगे 

मैं- हाँ आगे 

वो मुस्कुराती हुए आगे डंडे पर बैठ गयी और मैंने पैडल मारा मेरे पैर उसके चूतडो से टकराने लगे पर वो अपनी मस्ती में मस्त थी कभी घंटी बजाती तो कभी बात करती जल्दी ही हम उसके घर थे आज उसने घाघरा- चोली पहना हुआ था जिसमे बहुत ही मस्त लग रही थी वो 

मैं- आज बड़ी सुन्दर लग रही है तू 

वो- आज क्या मुझमे हीरे- मोती लगे दिख रहे है तुझको 

मैं- वो तो पता नहीं बस दिल को लगा तो बोल दिया 

वो- चल छोड़ और सुना नयी ताजा 

मैं- अपने तो वो ही किस्से वो ही फ़साने तू ही छेड़ कोई नया तराना 

वो- मैं कहू अपना हाल भी बस तेरे जैसा ही है बाकि सब तूझे पता तो है तू रुक मैं नाहा के आती हु फिर बाते करेंगे पूरा बदन मिटटी मिटटी हुआ पड़ा है 

मैं- उस दिन नहाना था तो भेज दिया आज नहाना है तो रोक रही है तेरा तू ही जाने 

वो- तू नहीं समझेगा मैं आती हु 

मैं- ठीक है 

वो नहाने चली गयी मैंने घर का मुख्य दरवाजा बंद किया और फिर कमरे में जाके खाट पर लेट गया वैसे भी यहाँ करने को कुछ खास था नहीं तो करीब आधे घंटे बाद वो नाहा कर आई उफ्फ्फ्फ़ क्या लग रही थी किसी क़यामत से कम नहीं उसके गीले बालो और चेहरे से टपकती वो पानी की बुँदे कसम से किसी को भी दीवाना बना दे 

मैं- चली जा पूजा वर्ना मैं होश खो बैठूँगा 

वो- होश उड़ गए क्या 

मैं- उड़ ही गए 

वो- हट गन्दी नजर वाले 

मैं- यार अब आँखे फोड़ लू क्या तारीफ करो तो मारा ना करू तो मर बता क्या करू 

वो- कुछ मत कर तू आती हु 

कुछ देर बाद वो आई और मेरे पास ही बैठ गयी 

मैं- आज सारी बिजलिया मुझ पर ही गिराने का इरादा है क्या 

वो- गिरा दू क्या तू कहे तो 

मैं- देख ले फिर ना कहना 

वो- क्या देखना क्या सुनना कुंदन जो है वो है 

मैं- पूजा दूर हो जा वर्ना मैं खुद पर काबू नहीं रख पाउँगा 

वो- दूर जाना भी कहा तुझसे और पास आना भी तो क्या 

मैं- पूजा 

उसके और मेरे होंठ बिलकुल करीब आ गए थे बस छूने भर की देर थी की वो अलग हो गयी और हस्ते हुए बोली- पागल कही के इतनी जल्दी हाथ नहीं आउंगी 

मैं- जानता हु प्यारी

वो- क्या खायेगा 

मैं- तुझे 

वो- वो तो मुमकिन नहीं 

मैं- तो फिर जाने दे और बता कितना खर्चा हुआ जमीन पे 

वो- रहने दे तेरा मेरा किसने बांटा 

मैं- फिर भी 

वो- बोला ना रहने दे 

मैं- जैसी तेरी मर्ज़ी थोड़ी ठण्ड लग रही है मैं तो सो रहा हु 

वो- मैं भी सोती हु 

मैं- आजा मेरे पास सो जा 

वो- ना दूसरी खाट पे सो जाउंगी 

मैं- बस 

वो- क्या 

मैं- आ जा ना

वो- तेरे इरादे ठीक नहीं लग रहे मुझे आज 

मैं- अपना मानती है तो आजा 

वो- आती हु 
Reply
04-27-2019, 12:35 PM,
#29
RE: Antarvasna kahani नजर का खोट
वो चुपके से मेरे पास आकार लेट गयी और एक चादर ने हम दोनों को ढक लिया मैंने उसके पेट पर हाथ रखा और उसको अपने से चिपका लिया उसके बाद फिर कुछ बात ना हुई और ना कुछ और बस लेटे लेटे ना जाने कब नींद आ गयी उसके बदन से गर्मी से मिली तो सुकून मिला दरअसल इन छोटी छोटी बातो स हम एक दुसरे के करीब आ रहे थे रिश्ता मजबूत होता जा रहा था 

जब मेरी आँख खुली तो चारो तरफ घुप्प अँधेरा था मैं बाहर आया तो पूजा खाना बना रही थी 

मैं- टाइम क्या हुआ 

वो- आठ बजे 

मैं- बाप रे देर हो गयी जाना होगा 

वो- खाना खाके जा 

मैं- अभी नहीं पूजा बल्कि मुझे बहुत पहले घर पहुच जाना चाहिए था अभी जाना होगा 

मैंने साइकिल उठाई और तेजी से पैडल मारते हुए घर की तरफ चल दिया आधा घंटा लग गया पहुचते पहुचते घर जाके देखा तो भाई आ गया था मैं सीधा दौड कर भाई के गले लग गया जैसे ज़माने भर की खुशिया आ गयी हो ऐसा लगा मुझे बहुत देर तक उसके गले लगा रहा 

फिर बातो का सिलसिला शुरू हो गया आज लग रहा था की हम भी घर में रहते है भाई के साथ ही खाना खाया फिर हम ऊपर आ गए 

भाई- ये क्या झमेला पाल दिया कुंदन 

मैं- भाई बस हो गया 

वो- हो नहीं गया तूने बिना सोचे समझे आ बैल मुझे मार वाली बात कर दी 

खैर- मैं आ गया हु मैं तेरी जगह ये बीड़ा उठा लूँगा 

मैं- नहीं भाई नहीं ये बात मेरी है ये मेरा कर्म है मैं ही करूँगा 

भाई- पर कुंदन 

मैं- भाई सा , थारा कुंदन पे विश्वास रखो आप 

अब भैया भी समझ गए थे की कुछ कहने सुनने का फायदा नहीं है तो वो भी चुप कर गए पर उनके चेहरे पर जो चिंता थी वो वैसे ही बरक़रार थी हालाँकि मुझे डर नहीं लग रहा था पर फिर भी अजीब सा लग रहा था की कैसे क्या होगा पर मेरे दिल में जो एक आग जल रही थी बस वो ही मेरी प्रेरणा थी और फिर पूजा का विस्वास भी था मेरे पास उसी के सहारे पार करजाना था इस मुश्किल को भी 

रात अपने शबाब पर आ रही थी धीरे धीरे सब अपने कमरों में बंद हो गए थे भाई आ गया था तो भाभी उसके साथ अपने कमरे में थी माँ के पास चाची थी और इन सब के बीच मैं बस चक्कर काट रहा था छत पर पता नहीं क्यों मेरी बेचैनी अचानक से बढ़ सी गयी थी जैसे की मुझे भी कोई साथी चाहिए था जिससे मैं जिसके गले लग सकू जिसकी बाहों में सुकून मिल सके मुझे 

मेरा दिल तो किया की पूजा के पास चल पडू फिर रात का सोच के रुक गया सर दर्द से फटा पड़ा था तो जैसे तैसे नींद का इंतजार किया पता नहीं कितनी देर सोया था मैं पर जब भैया ने जगाया तो तब भी अधेरा सा था 

वो- उठ और जल्दी बाहर आ 

मैं- क्या हुआ भाइ सा सों दो ना 

वो- बहुत सो लिया चल निचे आ 

कोसते हुए मैंने घडी को देखा चार भी नहीं बजे थे सुबह के पर जगा दिया गया था उनके साथ घर से बहर आया कुछ दूर चलने के बाद वो दौड़ने लगे और मुझे भी वैसा ही करने को कहा मैंने सोचा फौजी में क्या आ गया सुबह सुबह पर जब तक पुरे गाँव के तेन चार चक्कर न लगवा दिए उन्हें चैन नहीं आया जबकि मेरे घुटने जवाब दे गए पर वो नहीं रुके मैं बीच में रुक जाता तो डांट लगाते उसके बाद वो मुझे ऐसी जगह ले आये जहा मैं कभी नहीं आया था कभी ये अखाडा होता था पर पता नहीं कब से बंद पड़ा था 
उन्होंने उसे खोला अन्दर बुरा हाल था 

भैया- आजा दो दो हाथ करते है 

मैं- आपके साथ कैसे 

वो- अरे आ न मैं भी तो देखू मेरा भाई जवान हुआ या नहीं 

मैं- मेरी इतनी हिम्मत नहीं नहीं की आपका सामना करू 

वो- हाथो में चुडिया है क्या कुंदन जो घबरा रहा है 

मैं- जो समझना समझ लीजिये कुंदन अपने भाई का सामना नहीं करेगा 

वो- भाई का नहीं करेगा पर ठाकुर इंद्र का तो करेगा ना 

मैं- नहीं करेगा 

वो- ये हमारा हुकुम है 

मैं- तो फिर उठा कर पटक दीजिये मुझे पर मुझमे इतनी शक्ति नहीं की मैं अपने भाई का सामना कर सकू आपको चाहे मेरी बात का बुरा लगे पर भाई सा मेरे भी कुछ नियम है
भाई मेरे पास आया और बोला- मर्दों के कुछ नियम नहीं होते कुंदन और खासकर हम ठाकुरों के , हम अपने नियम खुद बनाते है हमारी तलवार प्यासी होती है रक्त की जिसकी प्यास बुझाना ही हमारा सबसे बड़ा नियम होता है और तू भी इस सच से भाग नहीं सकता फिर क्यों घबराता है मेरा सामना करने से आज मेरा सामना नहीं कर पा रहा कल चुनोती कैसे उठाएगा

मैं- अभी उसका मैंने सोचा नहीं है जब वो दिन आएगा देखेंगे चाहे वहा मेरी हार हो या जीत हो मेरा नसीब कम से कम मुझे चैन तो रहेगा की जो मैं करना चाहता था वो किया 

भाई-नसीब की बात कायर करते है कुंदन कर्मठ वो होता है जो करके दिखाए खैर तुझे करनी तो अपने मन की ही है तो वो ही कर हम भला कौन होते है 

मैं- भाई आप नाराज ना हो बस एक बार मेरी तरह से सोच के देखो आप मेरे साथ हो मेरे लिए बहुत है मैं बस आपके साथ रहना चाहता हु चलो इसी बहाने से कम से कम थोडा वक़्त आपके साथ गुजार पाउँगा पर बही मैं सच कहता हु की इस समय मैं इतने टुकडो में बंटा हुआ हु की मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा आपने सही कहा मुझे उस चुनौती की रत्ती भर भी फिकर नहीं है क्योंकि वो मेरे लिए कुछ नहीं मुझे फरक पड़ता है अपने लोगो स काश मेरे मन की बात मैं आपको बता सकता पर मैं भी एक साधारण इन्सान हु बेशक आप ठाकुर कुंदन सिंह को देख रहे है परन्तु मैं बस कुंदन हु जिसके पांवो में मज़बूरी की बेडिया है और सच कहू तो कोई मज़बूरी है नहीं बस नजरिये की बात है 

मेरे पास कहने को कुछ था नहीं मैं वहा से सीधा घर आया और फिर तैयार होकर जमीन की तरफ चला गया दिमाग में हजार तरह की बाते चल रही थी मैं घर वालो की बाते भी समझता था पर अब मैं कर भी क्या सकता था तो क्या फायदा बार बार उस बात को सोचके जमीन पर आकर मैंने चारो तरफ नजर दौड़ाई और फिर अपने कपडे उतार पर साइकिल पर रखे , फिर मैंने सोचा की इस पर कुछ और खुदाई करनी चाहिए ताकि जब दुबारा गोडी लगे तो फिर बस ये एक दम तैयार हो जाये 

तभी मैंने जुम्मन को अपनी और आते देखा तो दुआ सलाम हुई 

मैं- कहो काका कैसे आना हुआ इस और 

वो- बेटा खुद को रोक नहीं सका मेरी आत्मा तड़प सी रही थी तो रुका नहीं गया बताओ मैं किस काम आ सकता हु 

मैं- जमीन को तो संभाल लूँगा मैं काका पर क्या आप यहाँ एक झोपडी जैसा कुछ बना सकते है जिससे की मान लो बरसात आये या फिर रुकना पड़े तो काम आ जाई 

काका- बस इतनी सी बात तुम बस सामान मंगवा दो मैं कर दूंगा ये तो 

मैं- जो चाहिए आप खुद ले आओ पैसे जितने लगे मैं देख लूँगा पर थोडा जल्दी करके 

वो- बेटा, फिर भी दो- तीन दिन तो लगेंगे ही कम से कम और बीच में बारिश हुई तो ज्यादा समय भी लग सकता है 

मैं- जो भी करो जल्दी करो 

वो- ठीक है मैं अभी जाता हु और सामान लेकर आता हु 
Reply
04-27-2019, 12:35 PM,
#30
RE: Antarvasna kahani नजर का खोट
अब मुझे तो मदद की जरुरत थी ही चाहे वो कैसे भी आये कोई भी करे जितनी मदद हो उतनी अच्छी और फिर आगे आगे यहाँ कई कामो से रुकना पड़ता पानी देना , फ़ासल की देखभाल करना तो सर छुपाने के लिए छाया तो चाहिए ही होती मैंने कुवे को देखा फिरनी तो लग गयी थी पर समस्या थी की पानी को हाथो से खीचना पड़ता क्योंकि यहाँ और कोई व्यवस्था थी नहीं 

इसका भी कुछ ना कुछ जुगाड़ करना ही था अभी तो मानो बरसात थी तो धरती पी लेगी पर जब गेहू बोऊंगा तब तो दिक्कत होगी खैर कोई ना कोई रास्ता तो निकलेगा ही दोपहर बाद जुम्मन आया अपने साथ कुछ आदमी भी लाया और सामान भी 

मैं- काका आ गये 

वो- हां कुछ आदमी भी ले आया दुसरे गाँव से अब अपने यहाँ से तो कोई आता नहीं 

मैं- सही किया 

काका- मैंने सोचा है की निचे पत्थरों की चिनाई करेंगे और फिर ऊपर छप्पर बाँध देंगे 

मैं- बढ़िया 

वो- इससे मजबूत भी रहेगी और कच्चा काम भी नहीं रहेगा 

मैं- जैसा आपको ठीक लगे अभी मैं तो थोडा व्यस्त हु कुछ तैयारियों में तो आप ही थोडा देख लेना इधर 

वो- चिंता ना करे आप 

कुछ समय और बिताया उनके साथ फिर थोड़ी भूख सी भी लग आई थी तो सोचा पूजा के पास चलू पर उसके घर पर ताला लगा था आज वो जमीन की तरफ भी न आई कहा गयी सोचते सोचते मैं वापिस घर आया तो देखा की राणाजी और भाई कुछ बात कर रहे थे मुझे आता देखा तो चुप हो गए तो मैं समझ गया की मेरे बारे में ही बात हो रही होगी 

खैर वो और उसके बाद दो तीन दिन और ऐसे ही गुजर गए इस बीच न मैं पूजा से मिल सका न कुछ और कर सका बस घर पर ही रहा घर में एक अजीब सी चुप्पी छाई हुई थी मरघट सा सन्नाटा फैला हुआ था हर सदस्य के चेहरे पर एक पीलापन सा था माँ सा बस दिन रात बिस्तर पर ही पड़ी रहती थी उनकी सेहत तेजी से गिर रही थी मेरी हिम्मत नहीं होती थी की उनके पास जाऊ 

क्योंकि मैं ही ज़िम्मेदार था इन सब चीजों का मेरे भाई भाभी बहुत हिम्मत देते थे मुझे राणाजी ने जैसे खुद को कैद कर लिया था अपने कमरे में उस रात भी मेरा हाल पता नहीं कैसा था दिल पता नहीं क्यों घबरा सा रहा था कुछ भी ठीक नहीं लग रहा था आँखों में नींद ना आये ना दिल को करार आये उस पूरी रात एक पल को भी नींद नहीं आई बस सबके चेहरे आँखों के आगे घूमते रहे 

सुबह जब मैंने आईने में देखा तो आँखे कुछ लाल सी थी सूजी सी थी भाभी ने नाश्ता करने को कहा पर भूख नहीं थी तो मना किया और फिर साइकिल उठा कर चल दिया उस तरफ जहा कुछ सकूँ मिलने की उम्मीद थी मुझे

जब मैं उसके घर पंहुचा तो वो आंगन में ही कुछ कर रही थी उसने मुझे देखा और बोली- आ गयी मेरी याद 

मैं- ताने मत मार 

वो- चौथा दिन है आज आया क्यों नहीं पता है मेरा मन कितना घबरा रहा था 

मैं- पूजा बहुत थका हुआ हु पता नहीं मुझे क्या हो गया है सोचा की तुझे देख के कुछ चैन मिलेगा जली कटी फिर कभी बोल लेना 

वो मेरे पास आई और बोली- क्या हुआ 

मैं- पता नहीं बस तेरी बाँहों में सर रख कर सोने का जी कर रहा है पता नहीं क्यों सबसे भाग रहा हु तू ही पनाह दे दे 

पूजा ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे अन्दर कमरे में ले आई मैंने उसकी गोद में सर रखा और लेट गया वो मेरे सर को थपथपाने लगी बहुत आराम मिला मुझे कुछ देर हमारे बीच ख़ामोशी सी रही फिर मैंने पूछा- पूजा तू मेरे साथ है ना 

वो- मरते दम तक 

मैं- और अगर मैं मर गया तो 

वो- कुंदन ख़बरदार जो ऐसी मनहूस बात बोली 

मैं- बता ना 

वो- तुझ जिंदा रहना पड़ेगा बस मैंने कह दिया जब तू मेरी हर बात मानता है तो ये भी तुझे माननी ही होगी वर्ना मैं नाराज हो जाउंगी 

मैं- तू मुझसे कभी नाराज हो नहीं सकती 

वो- अगर तू ऐसी बाते करेगा तो मैं पक्का नाराज हो जाउंगी 

मैं- अच्छा बाबा नहीं करता आ मेरे पास लेट थोड़ी देर 

जैसे ही वो लेटी मैंने उसे अपनी बाहों में ले लिया उसके जिस्म की खुसबू मुझमे फैलने लगी मैं धीरे धीरे उसके पेट पर हाथ फेरने लगा

मैं- एक बात कहू 

वो- हू 

मैं- कैसे तू मेरी जिंदगी में चली आई इतने दिनों से कहा थी तू 

वो- यही बात मैं तुझसे भी पूछ सकती हु 

मैं- क्यों बार बार मेरे पैर तेरे दर पर आने को मचल जाते है 

वो- मैं क्या जानू 

मैं- तो कौन जाने 

वो- रब्ब जाने या तू जाने 

मैं- और मेरा रब्ब कौन है 

वो- तू जाने 

मैं- बातो में ना उलझा तुझे सब पता तो है 

वो- छोड़ इन बातो को बातो का क्या 

मैं- बातो को तो छोड़ दूंगा पर जो इस दिल दिमाग पर छा गया उसका क्या उसे कैसे छोडू 

वो- तेरा जो जी आये वो कर 

मैं- मेरा जी तो चाहता है की तेरी एक पप्पी ले लू 

वो- ले ले फिर 

मैं- सच में 

वो- अब तेरा जी कर रहा है तो जी को तसल्ली दे 

मैं- और तुझे 

वो- तू खुश तो मैं खुश 

पूजा ने मेरी तरफ करवट ली और मेरी आँखों में आँखे डालते हुए बोली- तुझे मेरे जिस्म की चाहत है क्या 

मैं- तुझे क्या लगता है 

वो- मैंने तुझसे पूछा है 

मैं- तुझे पहले भी बताया ना की तेरी रूह से वास्ता है मेरा इस जिस्म का क्या मोल अगर इसे पा भी लिया तो क्या पाया मैंने मजा तो जब आये जब तेरी रूह को अपना बना सकू इतना अपना की चोट मुझको लगे और आंसू तेरी आँख से गिरे 

वो- आशिकाना अंदाज में लग रहे हो ठाकुर साहब 

मैं- जो भी है तुमसे ही है और ठाकुर साहब कब से हो गया तेरे लिए, तेरे लिए तो वो ही अल्हड कुंदन हु और वो ही रहूँगा पर तुझे एक दिन जयसिंह गढ़ की हवेली की ठकुराईन जरुर बनाऊंगा जो तेरा हक़ है वो तेरे कदमो में जबतक ना डालूँगा चैन नहीं आएगा तब तक 

वो- कहा की बात कहा ले जा रहा है 

मैं-तू भी मेरी बाते भी मेरी 

वो- कुंदन मेरा जी घबराता है अमावस का दिन नजदीक आ रहा है 

मैं- भरोसा नहीं तुझे 

वो- अपने रब्ब से ज्यादा 

मैं- तो बस चाहे कुछ भी हो सबसे पहले तेरे पास ही लौट के आऊंगा आखिर मुझे अपनी कसम जो पूरी करनी है 

वो- कुंदन मैं नहीं आ पाऊँगी अखंड जोत जलानी है तेरे नाम की 

मैं- तू ही तो मेरी शक्ति है पूजा तू नहीं आयेगी तो मेरी हिम्मत टूट जाएगी 

वो- कुंदन मैं हमेशा तेरे साथ ही रहूंगी बल्कि तेरे साथ ही हु 

मैं- वो तो है 

मैंने उसे अपनी और खींचा वो मेरे पास और सरक आई इतना पास की दो जिस्म एक दुसरे से रगड़ खाने लगे हम दोनों एक दुसरे की आँखों में देख रहे थे कुछ खुमारी सी थी कुछ सुकून सा था उसने अपना चेहरा थोडा सा ऊपर किया और अपने होंठ मेरे होंठो पर रख दिए जैसे ढेर सारा शहद घोल दिया हो ऐसा लगा मुझे कुछ देर हम एक दुसरे को चुमते रहे फिर वो अलग हो गयी 

पूजा- आराम कर ले कुछ देर मैं खाना बना के आती हु 

वो बाहर चली गयी मैंने चादर ओढ़ ली और आँखों को मूंद लिया ऐसा लग रहा था की जैसे उसकी खुसबू मुझमे भर गयी थी करीब घंटे भर बाद हम दोनों ने साथ खाना खाया और फिर बाते करते रहे जब मैं चलने लगा तो उसने मुझे रोका 

वो- एक मिनट रुक जरा 

मैं- क्या हुआ अब 

वो- रुक तो सही 

पूजा ने मेरा हाथ पकड़ा और उस पर एक धागा सा बांधते हुए बोली- ये जाहरवीर जी का धागा है जब तक तू जीत ना जाये इसे अपने से अलग मत करियो ये तेरी रक्षा करेगा , कुंदन वापिस आना तू आएगा ना 

मैं- मेरा रक्षा कवच तो तू है तुझे छोडके कहा जाना मुझे चल अब जाने दे 
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